त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्प्रष्टुं त्वाभिवाञ्छामि चिरसंशयितान्तरः । आज्ञप्तो भवताद्याहं पृच्छामि विचिकित्सितम् ॥ ६५ ॥ संश्रुत्यैवं भार्गवोक्तिं दत्तात्रेयो दयानिधिः । सम्प्रहृष्टमना राममूचे प्रीत्याथ भार्गवम् ॥ ६६ ॥ पृच्छ भार्गव यत्तेऽद्य प्रष्टव्यं चिरसम्भृतम् । तव भक्त्या प्रसन्नोऽस्मि प्रब्रवीमि तवेप्सितम् ॥ ६७ ॥ इति श्रीमदितिहासोत्तमे त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भार्गवप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः। उसके कारण चिरकालसे मेरा अन्तःकरण संशयापन्न रहता है, वह मैं आपसे पूछना चाहता हूँ। यदि आज्ञा हो तो आज आपसे अपनी शंका पूछूँ ॥ ६५ ॥ परशुरामका ऐसा कथन सुनकर दयानिधि दत्तात्रेयजीका हृदय आनन्दित हो गया और उन्होंने प्रसन्न होकर भृगुनन्दन परशुरामसे कहा ॥ ६६ ॥ 'भार्गव ! तुम्हारे चित्तमें चिरकालसे जो प्रश्न बसा हुआ है वह पूछो। मैं तुम्हारे भक्तिभावसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम जो चाहते हो वह मैं बताऊँगा' ॥ ६७ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ।