भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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प्रथमोऽध्यायः । ११ वत्सोत्तिष्ठ चिरादद्य त्वां पश्यामि समागतम् । ब्रूहि स्वात्मभवं वृत्तं निरामयतया स्थितम् ॥ ५८ ॥ अथोत्थाय गुरूक्त्या स गुर्वादिष्टाम्यविष्टरः । उपविश्य प्रसन्नात्मा बद्धाञ्जलिपुटोऽब्रवीत् ॥ ५९ ॥ श्रीगुरो ! करुणासिन्धो ! त्वत्कृपामृत आप्लुतः । कथं स परिभूयेत विधिसृष्टैरथामयैः ॥ ६० ॥ त्वत्कृपात्मामृतकरमण्डलान्तःस्थितन्तु माम् । सन्तापयेत्कथं व्याधिश्चण्डांशुरतिभीषणः ॥ ६१ ॥ आन्तरं बाह्यमपि ते कृपयानन्दितं मम । सदा स्थितं किन्तु भवत्पादाब्जवियुतिं विना ॥ ६२ ॥ नान्यद्रुजावहं किञ्चिदासीन्मे लेशतः क्वचित् । तद्भवच्चरणाम्भोजदर्शनादद्य वै पुनः ॥ ६३ ॥ सम्पूर्णता सदापन्ना सर्वथा श्रीगुरो ननु । तत् किञ्चिच्चिरसंवृतं हृदि मे परिवर्तते ॥ ६४ ॥ [ फिर कहने लगे-] 'बेटा ! उठो । आज बहुत काल पश्चात् भेंट हुई । अपना वृत्तान्त सुनाओ । स्वस्थ तो रहे ?' ॥ ५८ ॥ गुरुदेवके इस प्रकार कहनेपर परशुराम उठे और उनके बतलाये हुए आसनपर बैठकर प्रसन्न चित्तसे हाथ जोड़कर बोले ॥ ५९ ॥ 'करुणासागर गुरुदेव ! जो आपके कृपामृतमें डुबकी लगा चुका है वह विधाताके रचे रोगादिसे कैसे आक्रान्त हो सकता है ॥ ६० ॥ मैं तो आपके कृपामय चन्द्रमण्डलके भीतर स्थित हूँ। फिर व्याधिरूप अत्यन्त भीषण भास्कर मुझे कैसे सन्तप्त कर सकता ? ॥ ६१ ॥ मैं तो बाहर-भीतर सर्वदा आपकी कृपासे आनन्दित हूँ। आपके चरणकमलोंके वियोगके सिवा और किसी व्याधिका मुझे कभी कहीं लेशमात्र भी पता नहीं है। सो आज आपके चरणारविन्दों- का दर्शन करके वह कमी भी सब प्रकार पूरी हो गयी है। तथापि बहुत दिनोंसे एक बात मेरे हृदयमें खटकती रहती है ॥ ६२-६४ ॥