भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 24

१० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्ड अनालोच्य फलञ्चापि यथान्धोऽन्धानुगस्तथा । तदलं मेधयानेन भूयो गत्वा दयानिधिम् ॥ ५२ ॥ विजिज्ञासितजिज्ञास्यो विचिकित्साम्बुधेः परम् । पारं प्रपत्स्ये सुशुभं गुरुवाक्प्लवमाश्रितः ॥ ५३ ॥ इति व्यवस्य सहसा जामदग्न्यः शुभाशयः । प्रतस्थे तद्गिरिवराद् गुरुदर्शनकाङ्क्षया ॥ ५४ ॥ गन्धमादनशैलेन्द्रं प्राप्य शीघ्रमपश्यत । गुरुं पद्मासनासीनं भूभास्वन्तमिव स्थितम् ॥ ५५ ॥ प्रणाम पादपीठं पुरतो भुवि दण्डवत् । शिरसाऽपीडयत्पादपद्मं निजकराश्रितम् ॥ ५६ ॥ अथैवं प्रणतं रामं दत्तात्रेयः प्रसन्नधीः । आशीर्भिर्योजयामास समुत्थापयदादरात् ॥ ५७ ॥


रहे हैं उन्हींके समान परिणामपर कोई ध्यान न देकर अन्धेके पीछे चलनेवाले अन्धेके समान मैं भी उसीका अनुसरण करूँ? ॥५१-५२ पू०॥ अच्छा, अब इस अविचारको छोड़कर फिर दयाके भण्डार श्रीगुरुदेवके ही पास चलूँ और उनसे अपने जिज्ञास्य विषयकी जिज्ञासा करूँ। इस प्रकार गुरुवाक्यरूप नौकाका आश्रय लेकर मैं इस संशयसागरके उस पार पहुँच जाऊँगा, जो सब प्रकार मंगलमय है ॥ ५२ उ०-५३ ॥ ऐसा निश्चय कर विशुद्ध अन्तःकरणवाले परशुरामजी गुरुदेवके दर्शनोंकी लालसासे तत्काल उस महेन्द्र पर्वतसे चल पड़े ॥ ५४ ॥ वहाँसे शीघ्र ही गन्धमादन पर्वतपर पहुँचकर उन्होंने भूर्लोकके सूर्यके समान तेजस्वी गुरुदेवको पद्मासनसे विराजमान देखा ॥ ५५ ॥ उन्होंने गुरुदेवकी चरणपादुकाओंके सम्मुख पृथ्वीपर दण्डवत् प्रणाम किया और फिर अपने हाथोंमें उनके चरणकमलोंको लेकर उनपर सिर रखा ॥ ५६ ॥ परशुरामको इस प्रकार प्रणाम करते देखकर गुरु दत्तात्रेयका अन्तःकरण प्रसन्न हो गया, उन्होंने उन्हें आशीर्वाद दिया और फिर आदरपूर्वक उठाया ॥ ५७ ॥