भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 23

प्रथमोऽध्यायः । ६ सुखिनस्ते हि लोकेषु ये कर्त्तव्यतया स्थिताः । पूर्णाशया महात्मानः सर्वदेहसुशीतलाः ॥ ४६ ॥ यदि कर्त्तव्यशेषेऽपि सुखं स्यात्केमचित्क्वचित् । शूलप्रोतेऽपि च नरे स्यात्सुखं गन्धमाल्यजम् ॥ ४७ ॥ अहो महच्चित्रमेतत् · कर्त्तव्यशतसङ्कुले । सुखमस्तीह यस्यार्थे करोत्येव सदा जनः ॥ ४८ ॥ अहो विचारमाहात्म्यं किं वदामि नृणामहम् । अनन्तकर्त्तव्यशैलाक्रान्ताः सौख्यं लभन्ति च ॥ ४९ ॥ तथा सौख्याय यतते सार्वभौमस्तु सर्वदा । तथैव यतते नित्यमपि भिक्षाटने रतः ॥ ५० ॥ पृथक् तौ प्राप्नुतः सौख्यं मन्येते कृतकृत्यताम् । तद्येन यान्ति सर्वेऽपि याम्यहं तानुक्रमात् ॥ ५१ ॥ वास्तवमें लोकमें सुखी तो वे ही हैं, जो कर्त्तव्यके बोझसे सर्वथा मुक्त होकर विराजमान हैं । वे पूर्णकाम होनेके कारण महात्मा हैं और उनके अन्तर्बाह्य सभी अंग शीतल होते हैं ॥ ४६ ॥ यदि कर्त्तव्यका भार रहते हुए भी किसीको कभी सुख होना सम्भव हो तो शूलीसे बिंध जानेपर भी मनुष्यको चन्दन और माला द्वारा सुख प्राप्त हो सकता है ॥ ४७ ॥ अहो ! यह बड़ी ही विचित्र बात है कि सैकड़ों कर्त्तव्योंके भारसे लदे होनेपर भी मनुष्य यह समझता है कि इसीमें सुख है और उसीके लिये सदा प्रयत्न भी करता रहता है ॥ ४८ ॥ मैं लोगोंके इस अविचारकी महिमा (!) कहाँतक कहूँ कि वे अनन्त कर्त्तव्यरूप पर्वतोंके भारसे दबे रहकर भी अपनेको सुखी मानते रहते हैं ॥ ४९ ॥ जिस प्रकार कोई सार्वभौम सम्राट् सर्वदा सुखप्राप्तिके लिये प्रयत्न करता है उसी प्रकार भिखारी भी निरन्तर सुख ही की खोजमें रहता है ॥ ५० ॥ और दोनोंको अलग-अलग सुख भी मिलते हैं, जिन्हें पाकर वे अपनेको कृत-कृत्य मानते हैं । तो क्या जिस क्रमसे सब लोग चल