त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे प्राप्ते फले फलेच्छावान् पुनर्भूयात्कथं वद । यस्मान्नित्यं करोत्येव जनः सर्वः फलेहया ॥ ४० ॥ फलं तदेव सम्प्रोक्तं दुःखहानिः सुखञ्च वा । कर्त्तव्यशेषे नो दुःखनाशो वा सुखमेव वा ॥ ४१ ॥ कर्त्तव्यतैव दुःखानां परमं दुःखमुच्यते । तत्सत्त्वे तु कथन्ते स्तो दुःखाभावः सुखञ्च वा ॥ ४२ ॥ यथा दग्धाखिलाङ्गस्य पादे पाटीरलेपनम् । तथा कर्त्तव्यशेषस्य सुखलाभ इहोच्यते ॥ ४३ ॥ यथा शराविद्धहृदः परिष्वङ्गोऽप्सरोगणैः । तथा कर्त्तव्यशेषस्य सुखलाभ इहोच्यते ॥ ४४ ॥ यथा क्षयामयाविष्टनरस्य गीतसंस्तुतिः । तथा कर्त्तव्यशेषस्य सुखलाभ इहोच्यते ॥ ४५ ॥ यदि फल प्राप्त हो गया तो बताओ, वह पुनः फलकी इच्छावाला क्यों होता है ? तथापि सब लोग फलकी कामनासे कर्म करनेमें लगे ही रहते हैं ॥ ४० ॥ वास्तवमें फल तो उसीको कहा जाता है जिससे दुःखकी निवृत्ति और सुखकी प्राप्ति हो जाय । जबतक कर्म करना शेष है तबतक न तो दुःखकी निवृत्ति कही जा सकती है और न सुखकी प्राप्ति ॥ ४१ ॥ वास्तवमें कर्त्तव्यता ही सम्पूर्ण दुःखोंमें सबसे बड़ा दुःख कहा जाता है । जबतक वह बनी हुई है तबतक तुझे दुःखकी निवृत्ति और सुखकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? ॥ ४२ ॥ जिस प्रकार किसीका सारा शरीर झुलस जाय और उसके पैरपर चन्दनका लेप किया जाय, उसी प्रकार जिसका कर्त्तव्य शेष है उसे सुखकी प्राप्ति बताना है ॥ ४३ ॥ जैसे किसीका वक्षःस्थल बाणोंसे विदीर्ण हो गया हो और फिर अप्सराएँ उसका आलिंगन करें, वैसे ही जिसका कर्त्तव्य शेष है उसे सुखकी प्राप्ति बताना है ॥ ४४ ॥ अथवा जैसे कोई पुरुष क्षयरोगसे ग्रस्त हो और उसकी संगीत- द्वारा स्तुति की जाय, वैसे ही जिसका कर्त्तव्य शेष है उसे इस लोकमें सुखकी प्राप्ति बतलाना है ॥ ४५ ॥