त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे प्राप्ते फले फलेच्छावान् पुनर्भूयात्कथं वद । यस्मान्नित्यं करोत्येव जनः सर्वः फलेहया ॥ ४० ॥ फलं तदेव सम्प्रोक्तं दुःखहानिः सुखञ्च वा । कर्त्तव्यशेषे नो दुःखनाशो वा सुखमेव वा ॥ ४१ ॥ कर्त्तव्यतैव दुःखानां परमं दुःखमुच्यते । तत्सत्त्वे तु कथन्ते स्तो दुःखाभावः सुखञ्च वा ॥ ४२ ॥ यथा दग्धाखिलाङ्गस्य पादे पाटीरलेपनम् । तथा कर्त्तव्यशेषस्य सुखलाभ इहोच्यते ॥ ४३ ॥ यथा शराविद्धहृदः परिष्वङ्गोऽप्सरोगणैः । तथा कर्त्तव्यशेषस्य सुखलाभ इहोच्यते ॥ ४४ ॥ यथा क्षयामयाविष्टनरस्य गीतसंस्तुतिः । तथा कर्त्तव्यशेषस्य सुखलाभ इहोच्यते ॥ ४५ ॥ यदि फल प्राप्त हो गया तो बताओ, वह पुनः फलकी इच्छावाला क्यों होता है ? तथापि सब लोग फलकी कामनासे कर्म करनेमें लगे ही रहते हैं ॥ ४० ॥ वास्तवमें फल तो उसीको कहा जाता है जिससे दुःखकी निवृत्ति और सुखकी प्राप्ति हो जाय । जबतक कर्म करना शेष है तबतक न तो दुःखकी निवृत्ति कही जा सकती है और न सुखकी प्राप्ति ॥ ४१ ॥ वास्तवमें कर्त्तव्यता ही सम्पूर्ण दुःखोंमें सबसे बड़ा दुःख कहा जाता है । जबतक वह बनी हुई है तबतक तुझे दुःखकी निवृत्ति और सुखकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? ॥ ४२ ॥ जिस प्रकार किसीका सारा शरीर झुलस जाय और उसके पैरपर चन्दनका लेप किया जाय, उसी प्रकार जिसका कर्त्तव्य शेष है उसे सुखकी प्राप्ति बताना है ॥ ४३ ॥ जैसे किसीका वक्षःस्थल बाणोंसे विदीर्ण हो गया हो और फिर अप्सराएँ उसका आलिंगन करें, वैसे ही जिसका कर्त्तव्य शेष है उसे सुखकी प्राप्ति बताना है ॥ ४४ ॥ अथवा जैसे कोई पुरुष क्षयरोगसे ग्रस्त हो और उसकी संगीत- द्वारा स्तुति की जाय, वैसे ही जिसका कर्त्तव्य शेष है उसे इस लोकमें सुखकी प्राप्ति बतलाना है ॥ ४५ ॥
प्रथमोऽध्यायः । ६ सुखिनस्ते हि लोकेषु ये कर्त्तव्यतया स्थिताः । पूर्णाशया महात्मानः सर्वदेहसुशीतलाः ॥ ४६ ॥ यदि कर्त्तव्यशेषेऽपि सुखं स्यात्केमचित्क्वचित् । शूलप्रोतेऽपि च नरे स्यात्सुखं गन्धमाल्यजम् ॥ ४७ ॥ अहो महच्चित्रमेतत् · कर्त्तव्यशतसङ्कुले । सुखमस्तीह यस्यार्थे करोत्येव सदा जनः ॥ ४८ ॥ अहो विचारमाहात्म्यं किं वदामि नृणामहम् । अनन्तकर्त्तव्यशैलाक्रान्ताः सौख्यं लभन्ति च ॥ ४९ ॥ तथा सौख्याय यतते सार्वभौमस्तु सर्वदा । तथैव यतते नित्यमपि भिक्षाटने रतः ॥ ५० ॥ पृथक् तौ प्राप्नुतः सौख्यं मन्येते कृतकृत्यताम् । तद्येन यान्ति सर्वेऽपि याम्यहं तानुक्रमात् ॥ ५१ ॥ वास्तवमें लोकमें सुखी तो वे ही हैं, जो कर्त्तव्यके बोझसे सर्वथा मुक्त होकर विराजमान हैं । वे पूर्णकाम होनेके कारण महात्मा हैं और उनके अन्तर्बाह्य सभी अंग शीतल होते हैं ॥ ४६ ॥ यदि कर्त्तव्यका भार रहते हुए भी किसीको कभी सुख होना सम्भव हो तो शूलीसे बिंध जानेपर भी मनुष्यको चन्दन और माला द्वारा सुख प्राप्त हो सकता है ॥ ४७ ॥ अहो ! यह बड़ी ही विचित्र बात है कि सैकड़ों कर्त्तव्योंके भारसे लदे होनेपर भी मनुष्य यह समझता है कि इसीमें सुख है और उसीके लिये सदा प्रयत्न भी करता रहता है ॥ ४८ ॥ मैं लोगोंके इस अविचारकी महिमा (!) कहाँतक कहूँ कि वे अनन्त कर्त्तव्यरूप पर्वतोंके भारसे दबे रहकर भी अपनेको सुखी मानते रहते हैं ॥ ४९ ॥ जिस प्रकार कोई सार्वभौम सम्राट् सर्वदा सुखप्राप्तिके लिये प्रयत्न करता है उसी प्रकार भिखारी भी निरन्तर सुख ही की खोजमें रहता है ॥ ५० ॥ और दोनोंको अलग-अलग सुख भी मिलते हैं, जिन्हें पाकर वे अपनेको कृत-कृत्य मानते हैं । तो क्या जिस क्रमसे सब लोग चल
१० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्ड अनालोच्य फलञ्चापि यथान्धोऽन्धानुगस्तथा । तदलं मेधयानेन भूयो गत्वा दयानिधिम् ॥ ५२ ॥ विजिज्ञासितजिज्ञास्यो विचिकित्साम्बुधेः परम् । पारं प्रपत्स्ये सुशुभं गुरुवाक्प्लवमाश्रितः ॥ ५३ ॥ इति व्यवस्य सहसा जामदग्न्यः शुभाशयः । प्रतस्थे तद्गिरिवराद् गुरुदर्शनकाङ्क्षया ॥ ५४ ॥ गन्धमादनशैलेन्द्रं प्राप्य शीघ्रमपश्यत । गुरुं पद्मासनासीनं भूभास्वन्तमिव स्थितम् ॥ ५५ ॥ प्रणाम पादपीठं पुरतो भुवि दण्डवत् । शिरसाऽपीडयत्पादपद्मं निजकराश्रितम् ॥ ५६ ॥ अथैवं प्रणतं रामं दत्तात्रेयः प्रसन्नधीः । आशीर्भिर्योजयामास समुत्थापयदादरात् ॥ ५७ ॥
रहे हैं उन्हींके समान परिणामपर कोई ध्यान न देकर अन्धेके पीछे चलनेवाले अन्धेके समान मैं भी उसीका अनुसरण करूँ? ॥५१-५२ पू०॥ अच्छा, अब इस अविचारको छोड़कर फिर दयाके भण्डार श्रीगुरुदेवके ही पास चलूँ और उनसे अपने जिज्ञास्य विषयकी जिज्ञासा करूँ। इस प्रकार गुरुवाक्यरूप नौकाका आश्रय लेकर मैं इस संशयसागरके उस पार पहुँच जाऊँगा, जो सब प्रकार मंगलमय है ॥ ५२ उ०-५३ ॥ ऐसा निश्चय कर विशुद्ध अन्तःकरणवाले परशुरामजी गुरुदेवके दर्शनोंकी लालसासे तत्काल उस महेन्द्र पर्वतसे चल पड़े ॥ ५४ ॥ वहाँसे शीघ्र ही गन्धमादन पर्वतपर पहुँचकर उन्होंने भूर्लोकके सूर्यके समान तेजस्वी गुरुदेवको पद्मासनसे विराजमान देखा ॥ ५५ ॥ उन्होंने गुरुदेवकी चरणपादुकाओंके सम्मुख पृथ्वीपर दण्डवत् प्रणाम किया और फिर अपने हाथोंमें उनके चरणकमलोंको लेकर उनपर सिर रखा ॥ ५६ ॥ परशुरामको इस प्रकार प्रणाम करते देखकर गुरु दत्तात्रेयका अन्तःकरण प्रसन्न हो गया, उन्होंने उन्हें आशीर्वाद दिया और फिर आदरपूर्वक उठाया ॥ ५७ ॥
प्रथमोऽध्यायः । ११ वत्सोत्तिष्ठ चिरादद्य त्वां पश्यामि समागतम् । ब्रूहि स्वात्मभवं वृत्तं निरामयतया स्थितम् ॥ ५८ ॥ अथोत्थाय गुरूक्त्या स गुर्वादिष्टाम्यविष्टरः । उपविश्य प्रसन्नात्मा बद्धाञ्जलिपुटोऽब्रवीत् ॥ ५९ ॥ श्रीगुरो ! करुणासिन्धो ! त्वत्कृपामृत आप्लुतः । कथं स परिभूयेत विधिसृष्टैरथामयैः ॥ ६० ॥ त्वत्कृपात्मामृतकरमण्डलान्तःस्थितन्तु माम् । सन्तापयेत्कथं व्याधिश्चण्डांशुरतिभीषणः ॥ ६१ ॥ आन्तरं बाह्यमपि ते कृपयानन्दितं मम । सदा स्थितं किन्तु भवत्पादाब्जवियुतिं विना ॥ ६२ ॥ नान्यद्रुजावहं किञ्चिदासीन्मे लेशतः क्वचित् । तद्भवच्चरणाम्भोजदर्शनादद्य वै पुनः ॥ ६३ ॥ सम्पूर्णता सदापन्ना सर्वथा श्रीगुरो ननु । तत् किञ्चिच्चिरसंवृतं हृदि मे परिवर्तते ॥ ६४ ॥ [ फिर कहने लगे-] 'बेटा ! उठो । आज बहुत काल पश्चात् भेंट हुई । अपना वृत्तान्त सुनाओ । स्वस्थ तो रहे ?' ॥ ५८ ॥ गुरुदेवके इस प्रकार कहनेपर परशुराम उठे और उनके बतलाये हुए आसनपर बैठकर प्रसन्न चित्तसे हाथ जोड़कर बोले ॥ ५९ ॥ 'करुणासागर गुरुदेव ! जो आपके कृपामृतमें डुबकी लगा चुका है वह विधाताके रचे रोगादिसे कैसे आक्रान्त हो सकता है ॥ ६० ॥ मैं तो आपके कृपामय चन्द्रमण्डलके भीतर स्थित हूँ। फिर व्याधिरूप अत्यन्त भीषण भास्कर मुझे कैसे सन्तप्त कर सकता ? ॥ ६१ ॥ मैं तो बाहर-भीतर सर्वदा आपकी कृपासे आनन्दित हूँ। आपके चरणकमलोंके वियोगके सिवा और किसी व्याधिका मुझे कभी कहीं लेशमात्र भी पता नहीं है। सो आज आपके चरणारविन्दों- का दर्शन करके वह कमी भी सब प्रकार पूरी हो गयी है। तथापि बहुत दिनोंसे एक बात मेरे हृदयमें खटकती रहती है ॥ ६२-६४ ॥
१२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्प्रष्टुं त्वाभिवाञ्छामि चिरसंशयितान्तरः । आज्ञप्तो भवताद्याहं पृच्छामि विचिकित्सितम् ॥ ६५ ॥ संश्रुत्यैवं भार्गवोक्तिं दत्तात्रेयो दयानिधिः । सम्प्रहृष्टमना राममूचे प्रीत्याथ भार्गवम् ॥ ६६ ॥ पृच्छ भार्गव यत्तेऽद्य प्रष्टव्यं चिरसम्भृतम् । तव भक्त्या प्रसन्नोऽस्मि प्रब्रवीमि तवेप्सितम् ॥ ६७ ॥ इति श्रीमदितिहासोत्तमे त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भार्गवप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः। उसके कारण चिरकालसे मेरा अन्तःकरण संशयापन्न रहता है, वह मैं आपसे पूछना चाहता हूँ। यदि आज्ञा हो तो आज आपसे अपनी शंका पूछूँ ॥ ६५ ॥ परशुरामका ऐसा कथन सुनकर दयानिधि दत्तात्रेयजीका हृदय आनन्दित हो गया और उन्होंने प्रसन्न होकर भृगुनन्दन परशुरामसे कहा ॥ ६६ ॥ 'भार्गव ! तुम्हारे चित्तमें चिरकालसे जो प्रश्न बसा हुआ है वह पूछो। मैं तुम्हारे भक्तिभावसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम जो चाहते हो वह मैं बताऊँगा' ॥ ६७ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ।
द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ प्रश्रयावनतो भूत्वा सम्प्रष्टुमुपचक्रमे । इत्याज्ञप्तो जामदग्न्यः प्रणम्याऽत्रिसुतं मुनिम् ॥ १ ॥ भगवन् गुरुनाथार्य सर्वज्ञ करुणानिधे ! पुरा मे नृपवंशेषु क्रोधः कारणतो ह्यभूत् ॥ २ ॥ तद्भूयो निहतं क्षात्रं सगर्भं सस्तनन्धयम् । मया त्रिःसप्तकृत्वो वै क्षत्रासृग्भरिते हृदे ॥ ३ ॥ सन्तर्पिताः पितृगणास्तुष्टा मद्भक्तिगौरवात् । मत्क्रोधं शामयामासुः शान्तः पित्राज्ञयाप्यहम् ॥ ४ ॥ सम्प्रत्ययोध्यामध्यास्ते यः श्रीरामो हरिः स्वयम् । क्रोधान्धस्तेन भूयोऽहं सङ्गतो वलदर्पितः ॥ ५ ॥ द्वितीय अध्याय ॥ २ ॥ परशुरामका प्रश्न, गुरुदेवका आश्वासन इस प्रकार आज्ञा मिलनेपर परशुरामजीने अत्रिनन्दन श्रीदत्तात्रेय मुनिको प्रणाम किया और अत्यन्त विनीत होकर पूछने लगे ॥ १ ॥ भगवन् ! आप मेरे गुरुदेव, स्वामी और पूज्य हैं । करुणानिधे ! आप सभी कुछ जानते हैं । बहुत दिनोंकी बात है; एक विशेष कारणसे मुझे क्षत्रिय वंशोंके प्रति क्रोध हुआ था ॥ २ ॥ अतः मैंने इक्कीस बारमें गर्भ और बच्चोंको भी न छोड़कर सम्पूर्ण क्षत्रियोंका संहार कर डाला था और उनके रक्तसे कुण्ड भर दिये थे ॥ ३ ॥ उस रक्तसे मैंने पितरोंका तर्पण किया । मेरे ऐसे भक्तिभावसे पितृगण प्रसन्न हुए और उन्होंने मेरे क्रोधको शान्त किया । इस प्रकार पितरोंकी आज्ञासे शान्त होनेपर भी [ जब मुझे मालूम हुआ कि ] अभी अयोध्यामें स्वयं भगवान् विष्णु रामरूपसे विराजमान हैं तो मैं बलके घमण्डसे क्रोधान्ध होकर उनसे जा भिड़ा ॥ ४-५ ॥
१४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तेन दर्पाद्भगवता च्यावितश्च पराजितः । जीवन्कथञ्चिन्निर्यातो ब्रह्मण्येनानुकम्पिना ॥ ६ ॥ अथ मामुपसम्प्राप्तो निर्वेदः परिभावितम् । ततोऽत्यन्तं पथि मया बहुधा परिदेवितम् ॥ ७ ॥ संवर्त्तमवधूतेन्द्रं मार्गेऽकस्मात्समासदम् । भस्मच्छन्नाग्निवद् गूढं कथञ्चिदविदन्तदा ॥ ८ ॥ सन्तप्त इव नीहारं तं सर्वाङ्गसुशीतलम् । सङ्गम्यैवातिशिशिरभावमासादयन्तदा ॥ ९ ॥ मया स्वस्थितिमापृष्टः प्राहामृतसुपेशलम् । सुसारपिण्डवत्सर्वं निष्कृष्य प्रत्यपादयत् ॥ १० ॥ नाहं तदशकं ग्रहीतुं रङ्को राज्ञीं यथा तथा । भूयः सम्प्रार्थितः सोऽथ भवन्तं मे विनिर्दिशत् ॥ ११ ॥ तब भगवान्ने मुझे परास्त करके उस दर्पसे नीचे गिराया। वे बड़े ब्राह्मणभक्त और दयालु थे, इसलिये किसी प्रकार जीवित छोड़ दिया ॥ ६ ॥ इस प्रकार परास्त होनेपर मुझे बड़ा वैराग्य हुआ और वहाँ से लौटते समय मार्गमें मैं बहुत खेद करता रहा ॥ ७ ॥ मार्गमें अकस्मात् अवधूतशिरोमणि संवर्तजीसे मेरी भेंट हो गयी। वे भस्मसे ढके अग्निके समान अपने स्वरूपको छिपाये हुए थे। अतः मैं बड़ी कठिनतासे उन्हें पहचान सका ॥ ८ ॥ जिस प्रकार घामसे तपे हुए पुरुषको कुहरा आ जानेसे बड़ी शान्ति मिलती है, उसी प्रकार उन सर्वाङ्गशीतल महापुरुषका समागम होनेसे मुझे उस समय बड़ी शान्ति मिली ॥ ९ ॥ मैंने जब उनकी स्थितिके विषयमें प्रश्न किया तो उन्होंने अमृतके समान बड़ा ही मधुर उत्तर दिया और सभी शास्त्रोंका सारसर्वस्व निकालकर तत्त्वका प्रतिपादन किया ॥ १० ॥ किन्तु जैसे महादरिद्री राजलक्ष्मीको ग्रहण नहीं कर पाता उसी प्रकार मैं उनकी बात समझ नहीं सका। जब मैंने उनसे पुनः प्रार्थना की तो उन्होंने आपके पास जानेका आदेश दिया ॥ ११ ॥
द्वितीयोऽध्यायः । १५ तद्भवचरणद्वन्द्वं तत आसादितं मया । अन्धो जनसमायोगमिवात्यन्तसुखावहम् ॥ १२ ॥ तन्मे न विदितं किञ्चित्संवर्त्तमुनिराह यत् । श्रुतं माहात्म्यमखिलं त्रिपुराभक्तिकारकम् ॥ १३ ॥ सा भवद्रूपिणी देवी हृदि नित्यं समाहिता । एवं मे वर्त्तमानस्य किं फलं समवाप्यते ॥ १४ ॥ भगवन् कृपया ब्रूहि यत्संवर्त्तः पुरावदत् । अविदित्वा च तन्नास्ति क्वचिच्च कृतकृत्यता ॥ १५ ॥ तदुक्तमविदित्वा तु यद्यच्च क्रियते मया । तद्वालक्रीडनमिव प्रतिभाति समन्ततः ॥ १६ ॥ पुरा मया हि बहुशः क्रतुभिर्दक्षिणोच्छ्रयैः । प्रभृतान्नगणैरिष्टा देवाः शक्रमुखा ननु ॥ १७ ॥ अतः मैं वहाँ से आपके चरणयुगलकी शरणमें आया हूँ, जैसे कोई [अकेला भटकता हुआ] अन्धा अत्यन्त सुखदायक जनसमाजमें आ जाय ॥ १२ ॥ मुझसे संवर्त्त मुनिने जो कुछ कहा वह मैंने कुछ भी नहीं समझा। आपके मुखारविन्दसे पहले मैंने भगवती त्रिपुरामें भक्तिभाव जागृत करनेवाला माहात्म्य पूरा सुना था ॥ १३ ॥ वह त्रिपुरादेवी साक्षात् आपका ही स्वरूप है। वह सर्वदा मेरे हृदयमें विराजमान है। इस स्थितिमें रहते हुए मुझे किस फलकी प्राप्ति होगी ॥ १४ ॥ इसके सिवा भगवन् ! संवर्त्तजीने मुझसे पहले जो बात कही थी, कृपया वह भी समझा दीजिये, क्योंकि उसे बिना समझे कभी कृतकृत्यता प्राप्त नहीं हो सकती ॥ १५ ॥ उनकी कही हुई बातको समझे बिना मैं जो कुछ भी करता हूँ वह मुझे सब प्रकार बच्चोंका खेल-सा जान पड़ता है ॥ १६ ॥ पूर्वकालमें मैंने यज्ञोंद्वारा इन्द्रादि देवताओंका पूजन किया था। उन यज्ञोंमें बड़ी-बड़ी दक्षिणाएँ दी थीं और खूब अन्नदान किया था ॥ १७ ॥
१६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तदल्पफलमेवेति श्रुतं संवर्त्तवक्त्रतः । मन्ये तदहमल्पं यद् दुःखमेवेति सर्वथा ॥ १८ ॥ असुखं नहि दुःखं स्याद् दुःखमल्पं सुखं स्मृतम् । यतः सुखात्यये दुःखं भवेद् गुरुतरं किल ॥ १९ ॥ नैतावदेव चैतस्मादधिकं चास्ति वैभवम् । मृत्यूपयोगो यद्भूयो न तन्न स्यात्कदाचन ॥ २० ॥ एवमेव भवेद्यन्मे क्रियते त्रिपुराविधौ । बालक्रोडेव मे भाति सर्वं तन्मानसं यतः ॥ २१ ॥ एतद्यदुक्तं भवता कर्तुं तस्यादितोऽन्यथा । नियतं चाप्यन्यथा तद्वचोभेदसमाश्रयात् ॥ २२ ॥ आलम्बभेदतश्चापि विविधं प्रतिपद्यते । कथमेतत्क्रतुसममसत्यफलसम्मितम् ॥ २३ ॥ किन्तु संवर्त्तजीके मुखसे सुना कि वे सब तो तुच्छ फल देनेवाले हैं। और जो तुच्छ होता है उसे तो मैं सर्वथा दुःखरूप ही मानता हूँ ॥ १८ ॥ वास्तवमें सुखका अभाव ही दुःख नहीं है, अल्प सुख भी दुःख ही माना जाता है; क्योंकि सुखका अन्त होनेपर भी बड़ा भारी दुःख होता है ॥ १९ ॥ इतना ही नहीं, इस कर्मकाण्डमें एक इससे भी बड़ा भय यह है कि अन्तमें मृत्यु होती है, और ऐसा कोई उपाय नहीं है जिससे वह न हो ॥ २० ॥ त्रिपुरादेवीकी उपासनामें मैं जो कुछ करता हूँ उससे भी ऐसा ही होता है। क्योंकि वह सब भी मानसिक व्यापार ही है, अतः मुझे तो बच्चोंका खेल-सा जान पड़ता है ॥ २१ ॥ आपने जिस विधिसे उपासना करनेको कहा था उस प्रकार भी की जा सकती है और अन्य प्रकार भी। [ कर्मानुष्ठानके समान ] विधिसे भी उसका अनुष्ठान हो सकता है और [ भावकी प्रधानतासे ] बिना विधिके भी; क्योंकि शास्त्रोंमें मतभेद है ही ॥ २२ ॥ इसके सिवा आलम्बन ( इष्टदेव ) के भेदसे भी उपासना अनेक प्रकारकी है। इस प्रकार असत्य फलवाली होनेसे यह यज्ञोंके समान ही क्यों नहीं है ? ॥ २३ ॥
द्वितीयोऽध्यायः । १७ अप्यसत्यात्मकं यस्मात् कथं सत्यसमं भवेत् । अथापि नित्यकर्त्तव्यमेतन्नास्यावधिः क्वचित् ॥ २४ ॥ लक्षितो मे स भगवन् संवर्त्तः सर्वशीतलः । कर्त्तव्यलेशविषमविषज्वालावनिर्गतः ॥ २५ ॥ हसन्निव लोकतन्त्रमभयं मार्गमाश्रितः । वने दावाग्निसङ्कीर्णे हिमाम्बुस्थगजोपमः ॥ २६ ॥ सर्वकर्त्तव्यवैकल्यामृतसंस्वादनन्दितः । कथमेतां दशां प्राप्तो यच्च मामाह तत्पुरा ॥ २७ ॥ सर्वमेतत् सुकृपया गुरो मे वक्तुमर्हसि । कर्त्तव्यकालभुजगनिगीर्णं मां विमोचय ॥ २८ ॥ इत्युक्त्वा चरणौ मूर्ध्ना गृहीत्वा दण्डवन्नतः । अथ दृष्ट्वा तथाभूतं भार्गवं मुक्तिभाजनम् ॥ २९ ॥ अतः [ कृतिसाध्य होनेके कारण ] असत्यरूप होनेपर भी यह सत्यके समान कैसे हो सकती है ? यदि कहो कि [ 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतꣳसमाः' इस श्रुतिवचन के अनुसार ] यह तो मनुष्यको नित्य करते ही रहना चाहिये, तब तो कभी इसकी समाप्ति ही नहीं होगी ॥ २४ ॥ किन्तु भगवान् संवर्त्त मुनि तो मुझे सब प्रकार शान्त प्रतीत होते थे । वे तो कर्त्तव्यकी लेशमात्र विषमविषमयी ज्वालासे भी मुक्त हो चुके थे ॥ २५ ॥ इस लोकव्यवहारको देखकर उन्हें मानो हँसी आती थी और वे भयशून्य मार्गपर आरूढ थे; जैसे दावाग्निसे व्याप्त वनमें कोई शीतल- जलमें खड़ा हुआ गजराज हो ॥ २६ ॥ वे सर्वकर्त्तव्यविमुक्ति रूप अमृतका आस्वादन करके परम आनन्दित जान पड़ते थे । ऐसी अवस्था उन्हें कैसे प्राप्त हुई, जिसका कि उस समय उन्होंने मुझसे भी वर्णन किया था ॥ २७ ॥ गुरुदेव ! कृपापूर्वक यह सब रहस्य मुझे बताइये । मुझे कर्त्तव्यरूप काले नागने डसा हुआ है, उससे आप मुझे छुड़ा लीजिये ॥ २८ ॥ ऐसा कहकर परशुरामने उनके दोनों चरणोंको सिरपर रखकर दण्डवत् प्रणाम किया । तब परशुरामकी ऐसी स्थिति और उन्हें मुक्तिका
१८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे दयमानस्वभावोऽथ दत्तो वक्तुमुपाक्रमत् । वत्स भार्गव धन्योऽसि यस्य ते बुद्धिरीदृशी ॥ ३० ॥ अब्धौ निमज्जतो नौकासम्प्राप्तिरिव सङ्गता । एतावदेव सुकृतिः क्रियाभिरुपसङ्गतः ॥ ३१ ॥ स्वात्मानमारोहयति पदे परमपावने । सा देवी त्रिपुरा सर्वहृदयाकाशरूपिणी ॥ ३२ ॥ अनन्यशरणं भक्तं प्रत्येवं रूपिणी द्रुतम् । हृदयान्तःपरिणता मोचयेन्मृत्युजालतः ॥ ३३ ॥ यावत् कर्त्तव्यवेतालान्न बिभेति दृढं नरः । न तावत् सुखमाप्नोति वेतालाविष्टवत् सदा ॥ ३४ ॥ नृणां कर्त्तव्यकालाहिसन्दष्टानां कथं शुभम् । करालगरलज्वालाक्रान्ताङ्गानामिव क्वचित् ॥ ३५ ॥ अधिकारी देखकर सहजदयालु भगवान् दत्तात्रेयने कहना आरम्भ किया—बेटा परशुराम ! तुम्हें ऐसी बुद्धि प्राप्त हुई, अतः तुम धन्य हो । यह ऐसी है जैसे किसी समुद्रमें डूबनेवालेको नौका मिल जाय ॥ २९-३१ पू० ॥ उपासना आदि क्रियाओंके द्वारा पुण्यवान् पुरुषको यही प्राप्त होता है कि वह अपने-आपको परमपवित्र पदमें आरूढ कर सकता है ॥ ३१ उ०-३२ पू० ॥ देवी त्रिपुरा सभीकी हृदयाकाशस्वरूपा है [—उसका यद्यपि कोई आकार नहीं है—] तथापि अपने अनन्यशरण भक्तके लिये वह तुरन्त मूर्त्तिमती हो जाती है और उसके अन्तःकरणमें आविर्भूत होकर वह उसे मृत्युके पाशसे मुक्त कर देती है ॥ ३२ उ०-३३ ॥ जबतक मनुष्यको इस कर्त्तव्यरूप पिशाचका भारी भय नहीं होता, तबतक उसे सुखकी प्राप्ति नहीं होती, वह भूताविष्ट व्यक्तिके समान विक्षिप्त रहता है ॥ ३४ ॥ भीषण विषकी ज्वालासे जिसके अंग-प्रत्यंगोंमें दाह हो रहा हो उस व्यक्तिके समान कर्त्तव्यरूप काले नागसे डसे हुए पुरुषका कल्याण भला कैसे हो सकता है ? ॥ ३५ ॥
द्वितीयोऽध्यायः । १६ कर्त्तव्यविषसंसर्गमूर्च्छितं पश्य वै जगत् । अन्धीभूतं न जानाति क्रियां स्वस्य हितात्मिकाम् ॥ ३६ ॥ अन्यथा चेष्टते भूयो मोहमापद्यते पुनः । एवंविधो हि लोकोऽयं कर्त्तव्यविषमूर्च्छितः ॥ ३७ ॥ अनादिकालतो भीमे पच्यते विषसागरे । यथा हि केचित्पथिकाः प्राप्ता विन्ध्यं महानगम् ॥ ३८ ॥ क्षुधाभरसमाक्रान्ताः फलानि ददृशुर्वने । विषमुष्टिफलान्याशु तिन्दुकस्य फलेहया ॥ ३९ ॥ भक्षयामासुरत्यन्तक्षुधानष्टरसेन्द्रियाः । अथ ते तद्विषज्वालाज्वलिताङ्गाः सुपीडिताः ॥ ४० ॥ अन्धीभूता विचिन्वन्तस्तद्विषोष्णप्रशान्तये । अविदित्वा मुष्टिफलं तिन्दुकफलनिषेवणात् ॥ ४१ ॥ मत्वा ज्वालां निजे देहे धत्तूरफलमासदुः । भ्रान्त्या जम्बीरबुद्ध्या तत् सर्वैरासीह सुभक्षितम् ॥ ४२ ॥ देखो, यह सारा संसार कर्त्तव्यरूप विषके संसर्गसे मूर्च्छित होनेके कारण अन्धा हो रहा है, इसलिये इसे अपना हित करनेवाली क्रियाका पता नहीं लगता ॥ ३६ ॥ यह बार-बार उलटे ही कर्म करता है और पुनः पुनः मोहग्रस्त होता रहता है। कर्त्तव्यरूप विषसे मूर्च्छित यह लोक अनादिकालसे इसी प्रकार भीषण विषसमुद्रमें सन्तप्त हो रहा है ॥ ३७-३८ पू० ॥ [ यह बात ऐसी है जैसे—] कुछ यात्री पर्वतराज विन्ध्याचलपर जा पहुँचे। वे भूखसे अत्यन्त व्याकुल थे। वहां वे फल खोजने लगे, और काजूके फल समझकर कुचलाके फल खा गये। अत्यन्त क्षुधातुर होनेके कारण उनकी रसनेन्द्रिय शक्तिहीन हो गयी थी। [ अतः उनके स्वादकी ओर उनका ध्यान नहीं गया ] ॥ ३८ उ०-४० पू० ॥ अब कुचलाके विषकी ज्वालासे उनके अंग-अंगमें जलन होने लगी। उससे उन्हें बड़ी बेचैनी हुई। उन्हें यह तो पता था नहीं कि हमने कुचलाके फल खा लिये हैं, अतः अपने शरीर में उस ज्वालाको काजू खानेका ही परिणाम समझकर वे अन्धे-से होकर उसकी शान्तिके
२० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे उन्मत्ताश्च ततोऽभूवन् मार्गाद् भ्रष्टाश्च ते तदा । अन्धीभूयातिगहने पतन्तो निम्नभूमिषु ॥ ४३ ॥ कण्टकैःक्षतसर्वाङ्गा भग्नबाहूरुपादकाः । अधिक्षिपन्तश्चान्योऽन्यं कलहञ्चक्रुरुच्चकैः ॥ ४४ ॥ मुष्टिभिश्च शिलाभिश्च काष्ठैर्जघ्नुः परस्परम् । अथ ते दीर्णसर्वाङ्गाः पुरं कञ्चित् समासदुः ॥ ४५ ॥ निशीथे दैववशतः पुरद्वारमुपाययुः । पुरद्वाराधिपालैस्ते प्रतिरुद्धाः प्रवेशने ॥ ४६ ॥ देशकालानभिज्ञानात् कलहञ्चक्रुरुच्चकैः । अथ ते प्रहृता द्वारपालैरतितरां यदा ॥ ४७ ॥ तदा पलायनपरा बभूवुः परितस्तु ते । पतिताः परिखे केचिद् भक्षिता मकरादिभिः ॥ ४८ ॥
लिये खोज करने लगे तो उन्हें धतूरेके फल मिल गये । भ्रमवश उन सबने उन्हें नीबू समझकर खा लिया ॥ ४० उ०-४२ ॥ इससे वे और भी पागल हो गये और अपने मार्गसे भटककर उस घोर जंगलमें गड्ढोंमें गिरने-पड़ने लगे ॥ ४३ ॥ उनके सारे शरीरमें काँटे लग गये, हाथ-पैर और घुटने घायल हो गये तथा वे एक दूसरेको बुरा-भला कहकर आपसमें बड़ा कलह करने लगे ॥ ४४ ॥ होते-होते वे एक-दूसरेपर घूँसे, पत्थर और लकड़ियाँ चलाने लगे । इससे उनके सब अंग क्षत-विक्षत हो गये । अन्तमें वे किसी नगरके पास जा निकले ॥ ४५ ॥ दैववश वे आधी रातके समय नगरके द्वारपर पहुँचे । उस समय द्वारपालने उन्हें नगरमें प्रवेश करनेसे रोका ॥ ४६ ॥ उन्हें कुछ देश-कालका ज्ञान तो था ही नहीं, इसलिये वे उनके साथ भी झगड़ा करने लगे । अब तो द्वारपालों ने भी उनको खूब पीटा ॥ ४७ ॥ तब वे इधर-उधर भागने लगे । उनमेंसे कुछ तो नगरकी खाईमें गिर गये और वहाँ मकर आदि जलजन्तुओंने उन्हें खा लिया ॥ ४८ ॥
द्वितीयोऽध्यायः । २१ केचित् खातेषु कूपेषु पतिताः प्राणमुत्सृजुः अपरे तैर्विनिहताः केचिज्जीवग्रहं गताः ॥ ४९ ॥ एवं जना हितेच्छाभिः कर्तव्यविषमूर्च्छिताः । अहो विनाशं यान्त्युच्चैर्मोहेनान्धीकृताः खलु ॥ ५० ॥ धन्योऽसि भार्गव त्वन्तु यस्मादभ्युदयं गतः । विचारः सर्वमूलं हि सोपानं प्रथमं भवेत् ॥ ५१ ॥ परश्रेयोमहासौधप्राप्तौ जानीहि सर्वथा । सुविचारमृते क्षेमप्राप्तिः कस्य कथम्भवेत् ॥ ५२ ॥ अविचारः परो मृत्युरविचारहता जनाः । विमृश्यकारी जयति सर्वत्राभीष्टसङ्गमात् ॥ ५३ ॥ अविचारहता दैत्या यातुधानाश्च सर्वशः । विचारपरमा देवाः सर्वतः सुखभागिनः ॥ ५४ ॥ कुछ ने गड्ढों और कुओंमें गिरकर प्राण त्याग दिये और कोई उनसे मार खाकर किसी प्रकार अपनी जान बचाकर भाग गये॥ ४९ ॥ इसी प्रकार संसारी लोग अपने कल्याणकी कामनासे कर्त्तव्यरूप विषको पीकर मूर्च्छित हो गये हैं और मोहसे अन्धे होकर उल्टे विनाशकी ओर ही जा रहे हैं ॥ ५० ॥ परशुराम ! तुम्हारे हृदयमें विचार उदय हुआ है, अतः तुम धन्य हो । विचार ही सबका मूल है और परमकल्याणरूप महत्पदकी प्राप्तिके लिये यही पहली सीढ़ी है—यह तुम निश्चय जानो । भला, सम्यक् विचारके बिना किसीको कल्याणकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ॥५१-५२॥ अविचार सबसे बड़ी मृत्यु है, सब लोग अविचारसे ही नष्ट हो रहे हैं । जो विचारपूर्वक चलता है वही सर्वत्र अपने इच्छित पदार्थ प्राप्त करके अन्तमें विजय ( सफलता ) प्राप्त करता है ॥ ५३ ॥ दैत्य और राक्षस अविचारके कारण ही सब प्रकार नष्ट होते हैं और देवता लोग विचारनिष्ठ होनेके कारण सब प्रकार सुखके अधिकारी होते हैं ॥ ५४ ॥
२२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे विचाराद्विष्णुमाश्रित्य जयन्ति प्रत्यरीन् सदा । विचारः सुखवृक्षस्य बीजमङ्कुरशक्तिकम् ॥ ५५ ॥ विराजते विचारेण पुरुषः सर्वतोऽधिकः । विचाराद्विधिरुत्कृष्टो विचारात्पूज्यते हरिः ॥ ५६ ॥ सर्वज्ञस्तु विचारेण शिव आसीन्महेश्वरः । अविचारान्मृगासक्तो रामो बुद्धिमतां वरः ॥ ५७ ॥ परमामापदं प्राप्तो विचारादथ वारिधिम् । बद्ध्वा लङ्कापुरीं रक्षोगणाकीर्णां समाक्रमत् ॥ ५८ ॥ अविचाराद्विधिरपि मूढो भूत्वाभिमानतः । शिरश्छेदं समगमदिति संस्तुतमेव ते ॥ ५९ ॥ महादेवोऽविचारेण वरं दत्वा सुराय वै । भस्मीभावात् स्वस्य भीतः पलायनपरोऽभवत् ॥ ६० ॥ वे विचारपूर्वक विष्णुभगवान्का आश्रय लेकर सर्वदा अपने शत्रुओंपर विजयी होते हैं। विचार ही सुखरूपी वृक्षका बीज है, इसीमें सुखका अंकुर फूटनेकी शक्ति है ॥ ५५ ॥ विचारके ही कारण मनुष्यकी सबसे अधिक शोभा होती है। विचारके कारण ही ब्रह्मा सबसे श्रेष्ठ माने जाते हैं और विचारसे ही विष्णुकी सर्वत्र पूजा होती है ॥ ५६ ॥ विचारके द्वारा ही भगवान् शिव सर्वज्ञ और महेश्वर हैं। तथा [इसके विपरीत] बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ होनेपर भी अविचारके कारण रामका सुवर्णमृगके प्रति आकर्षण हुआ और वे बड़ी आपत्तिमं पड़ गये। फिर विचारका आश्रय लेकर ही उन्होंने समुद्रपर पुल बनवाया और राक्षसोंसे बसी हुई लंकापुरी पर आक्रमण किया ॥ ५७-५८ ॥ यह बात तुमसे कही ही जा चुकी है कि अविचारके कारण ही अभिमानसे मूढ होकर ब्रह्माने अपना एक सिर कटवा लिया था * ॥ ५९ ॥ महादेवजीने भी अविचारके वशीभूत होकर भस्मासुरको वर दे दिया और फिर अपने भस्म होनेकी सम्भावनासे भयभीत होकर भागते फिरे ॥ ६० ॥
- पहले ब्रह्माके पाँच सिर थे। जब वे सरस्वती को देखकर कामातुर हुए तब भगवान् शंकर ने उनकी भर्त्सना की और अपने हाथ से उनका पाँचवाँ मस्तक काट डाला।
द्वितीयोऽध्यायः । २३ अविचाराद्धरिः पूर्वं भृगुपत्नीं निहत्य तु । शापेन परमं दुःखमाप्तमत्यन्तदुःसहम् ॥ ६१ ॥ एवमन्ये सुरा दैत्या यातुधाना नरा मृगाः । अविचारवशादेव विपदं प्राप्नुवन्ति हि ॥ ६२ ॥ महाभागास्ते हि धीरा यान् कुत्रापि च भार्गव । विजहाति विचारो नो नमस्तेभ्यो निरन्तरम् ॥ ६३ ॥ कर्त्तव्यमविचारेण प्राप्य मुह्यन्ति सर्वतः । विचार्य कृत्वा सर्वेभ्यो मुच्यतेऽपारसङ्कटैः ॥ ६४ ॥ एवं लोकांश्चिरादेषोऽविचारः सङ्गतोऽभवत् । यस्याविचारो यावत् स्यात् कुतस्तावद्विमर्शनम् ॥ ६५ ॥ ग्रीष्मभीष्मकरातप्ते मरुौ क्व शिशिरं जलम् । एवं चिराविचाराग्निज्यालामालापरीवृते ॥ ६६ ॥ विचारशीतलस्पर्शः कथं स्यात् साधनं विना । साधनन्त्वेकमेवात्र परमं सर्वतोऽधिकम् ॥ ६७ ॥ अविचारसे ही पूर्वकालमें विष्णुभगवान् भृगुकी भार्याको मारकर फिर शापसे अत्यन्त असहनीय आपत्तिमें पड़ गये ॥ ६१ ॥ इसी प्रकार और भी असुर, देवता, राक्षस, मनुष्य एवं मृग आदि अविचारके अधीन होनेपर ही विपत्तिमें पड़ते हैं ॥ ६२ ॥ परशुराम ! वे बुद्धिमान् पुरुष बड़े ही भाग्यशाली हैं जिन्हें किसी भी परिस्थितिमें विचार नहीं छोड़ता। उन्हें बार-बार प्रणाम है ॥६३॥ अविचारसे अकर्त्तव्यको ही कर्त्तव्य समझकर लोग सब प्रकार मोहमें पड़ जाते हैं और विचारपूर्वक कर्म करनेपर वे सब प्रकारके अपार संकटोंसे भी छुटकारा पा लेते हैं ॥ ६४ ॥ इस प्रकार चिरकालसे इस अविचारने ही लोगोंको प्रभावित कर रखा है। और जबतक किसीपर अविचारका अधिकार है तबतक वह विचार कैसे कर सकता है ॥ ६५ ॥ ग्रीष्मकालके प्रचण्ड मार्त्तण्डकी किरणोंसे तपे हुए मरुस्थलमें भला, शीतल जल कहाँ मिल सकता है ? इसी प्रकार चिरकालसे अविचाररूप अग्निकी लपटोंसे घिरे हुए अन्तःकरणमें बिना साधन
२४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सर्वहृत्पद्मनिलयदेवतायाः परा कृपा । तां विना स्यात् कथं कस्य महाश्रेयः सुसाधनः ॥ ६८ ॥ विचारार्कोऽविचारान्धमहाध्वान्तनिबर्हणः । तत्र मूलं भवेद्भक्त्या देवतापरिराधनम् ॥ ६९ ॥ राधिता परमा देवी सम्यक् तुष्टा सती तदा । विचाररूपतां याति चित्ताकाशे रविर्यथा ॥ ७० ॥ तस्मान्निजात्मरूपां तां त्रिपुरां परमेश्वरीम् । सर्वान्तरनिकेतां श्रीमहेशीं चिन्मयीं शिवाम् ॥ ७१ ॥ आराधयेदकापट्यात् सद्गुरुद्वारतः क्रमात् । आराधनेऽपि मूलं स्याद्भक्तिः श्रद्धा च निर्मला ॥ ७२ ॥ तत्रापि मूलं माहात्म्यश्रवणं परिकीर्तितम् । अतस्ते प्रथमं राम माहात्म्यं सम्प्रवर्णितम् ॥ ७३ ॥ किये विचारका शीतल स्पर्श कैसे प्राप्त हो सकता है । इसके लिये परम साधन भी एक ही है और वह सबसे बढ़कर है ॥ ६६-६७ ॥ [ वह है—] सबके हृदयकमलमें निवास करनेवाली श्रीत्रिपुरा- देवीकी परम कृपा । उसके बिना भला किसीको परम कल्याणकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? ॥ ६८ ॥ विचाररूपी सूर्य अविचारसे अन्धे हुए लोगोंके अज्ञानरूप महान् अन्धकारको नष्ट करनेवाला है । उसका मूल भक्तिभावसे उनकी आराधना करना ही है ॥ ६६ ॥ आराधिता होनेपर महादेवी त्रिपुरा प्रसन्न होकर विचार रूपमें परिणत हो सूर्यके समान हृदयाकाशमें प्रकट हो जाती हैं ॥ ७० ॥ अतः उन भगवती त्रिपुराकी जो अपनी आत्मस्वरूपा, सर्वान्तर- यामिनी, महान् ऐश्वर्यशालिनी, चिन्मयी और कल्याणस्वरूपिणी हैं— सद्गुरुके द्वारा दीक्षित होकर निष्छल भावसे विधिवत् आराधना करनी चाहिये । उनकी आराधनामें भी निर्मल श्रद्धा एवं भक्ति ही मूल ( प्रधान कारण ) हैं ॥ ७१-७२ ॥ उनका भी मूल बताया गया है उनके माहात्म्यका श्रवण, इसीसे हे परशुराम ! पहले मैंने तुम्हें उनका माहात्म्य सुनाया था ॥ ७३ ॥
द्वितीयोऽध्यायः । २५ तेन श्रुतेनाधुना त्वं प्राप्तवानसि मङ्गलम् । विचारं श्रेयसो मूलं यस्मात्ते न हि भीरितः ॥ ७४ ॥ विचारोदयपर्यन्तं भयमस्ति महत्तमम् । अविचारात्मदोषेण ग्रस्तस्य प्रतिवासरम् ॥ ७५ ॥ यथा हि सन्निपातेन ग्रस्तस्यौषधसेवनात् । अपि तावद्द्भवेद् भीतिर्यावद्धातोश्च शुद्धता ॥ ७६ ॥ प्राप्ते विचारे परमे फलितं जीवितं नॄणाम् । यावत् सुजन्म सुनॄणां विचारो न भवेत् परः ॥ ७७ ॥ तावन्तो जन्मतरवो वन्ध्या विफलहेतुतः । स एव सफलो जन्मवृक्षो यत्र विमर्शनम् ॥ ७८ ॥ कूपमण्डूकसदृशा ये नरा निर्विमर्शनाः । यथा कूपे समुत्पन्नो भेको नो वेद किञ्चन ॥ ७९ ॥ शुभं वाप्यशुभं वापि कूपे एव विनश्यति । तथा जना अपि वृथोत्पन्ना ब्रह्माण्डकूपके ॥ ८० ॥ उसके श्रवणसे ही तुम्हें इस [ विचाररूप ] मङ्गलकी प्राप्ति हुई है । विचार ही कल्याणका मूल है, अतः अब तुम्हें इस लोकमें किसी प्रकारका भय नहीं है ॥ ७४ ॥ जबतक विचार उदय नहीं होता तबतक तो अविचाररूप दोषसे ग्रस्त पुरुषके लिये प्रतिदिन (नित्य ही) बड़ा भारी भय रहता है ॥७५॥ जिस प्रकार सन्निपातग्रस्त पुरुषको तबतक तो भय रहता है जबतक कि औषध सेवन कर लेनेपर भी धातुओंकी अशुद्धि शेष रहती है ॥ ७६ ॥ उत्तम विचारकी प्राप्ति होनेपर ही मनुष्यका जीवन सफल होता है । उत्तम मनुष्यजन्म मिलनेपर भी जबतक विचार न हो तबतक तो निष्फल रहनेके कारण ये मानवजन्मरूप वृक्ष भी वन्ध्य ( व्यर्थ ) हैं । इनमें सफल तो वही जन्मरूप वृक्ष है जिसमें विचारका उदय हुआ है ॥ ७७-७८ ॥ जो लोग विचारहीन हैं वे तो कूपमण्डूकके समान हैं। जिस प्रकार कुएँमें उत्पन्न हुआ मेंढक कुएँसे बाहरकी अच्छी या बुरी कोई भी बात नहीं जानता और कुएँमें ही नष्ट हो जाता है, उसी
२६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे शुभं वाप्यशुभं वापि न विदुः स्वात्मनः क्वचित् । उत्पद्योत्पद्य नश्यन्ति न जानन्ति स्वकं हितम् ॥ ८१ ॥ सुखबुद्धिश्च दुःखेषु सुखे दुःखनिश्चयम् । प्राप्याविचारमाहात्म्यात् पच्यन्ते सृतिपावके ॥ ८२ ॥ दुःखेन क्लिश्यमानाश्च न कथञ्चित् त्यजन्ति तत् । यथा पादशताघातैस्ताडितोऽपि महाखरः ॥ ८३ ॥ रासभीमनुयात्येव तथा संसरणं जनः । त्वन्तु राम विचारात्मा पारं दुःखस्य सङ्गतः ॥ ८४ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे विचारमाहात्म्ये द्वितीयोऽध्यायः ॥ प्रकार [ विचारहीन ] लोग भी वृथा ही इस ब्रह्माण्डकूपमें उत्पन्न होते हैं ॥ ७६-८० ॥ उन्हें अपने हिताहितका कुछ भी ज्ञान नहीं होता । वे पुनः पुनः उत्पन्न होकर मरते रहते हैं, अपने हितका उन्हें कुछ पता नहीं चलता ॥ ८१ ॥ अविचारके प्रभावसे उनकी [ पुत्र-सम्पत्ति आदि ] दुःखके साधनोंमें सुखबुद्धि हो जाती है और [ वैराग्यादि ] सुखके साधनोंमें दुःखबुद्धि । अतः वे [ जन्म-मरणरूप ] संसाराग्निमें जलते रहते हैं ॥ ८२ ॥ दुःखरूप स्त्री-पुत्रादिसे तरह-तरह क्लेश पानेपर भी वे किसी प्रकार उन्हें त्याग नहीं पाते । जिस प्रकार गधा सैकड़ों लातें खानेपर भी गधी के पीछे लगा ही रहता है उसी प्रकार लोग संसारका पीछा नहीं छोड़ते । परशुराम ! तुम तो विचारवान् हो, इसलिये अब इस संसाररूप दुःखसे पार हो गये हो ॥ ८३-८४ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ।
तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ दत्तात्रेयोक्तवचः श्रुत्वात्यन्तसुकौतुकी । जामदग्न्यः पुनरपि पप्रच्छ विनयान्वितः ॥ १ ॥ भगवन् गुरुणाऽथोक्तं भवता यत्तथैव तत् । अविचारात्परो नाशः संप्राप्तः सर्वथा जनैः ॥ २ ॥ विचारेण भवेच्छ्रेयस्तन्निदानमपि श्रुतम् । माहात्म्यश्रुतिरित्येव तत्र मे संशयो महान् ॥ ३ ॥ कथं वा तदपि प्राप्यं साधनं तत्र किं भवेत् । स्वाभाविकं तद्यदि स्यात्तत् सर्वैर्न कुतः श्रुतम् ॥ ४ ॥ अहं वाद्यावधि कुतः प्रवृत्तिं नाप्तवानिह । दुःखं मत्तोऽधिकं प्राप्ता विहताश्च पदे पदे ॥ ५ ॥ न कुतः साधनं प्राप्ता एतन्मे कृपया वद । इत्यापृष्टः प्राह भूयो हृष्टो दत्तो दयानिधिः ॥ ६ ॥ तृतीय अध्याय ॥ ३ ॥ हेमचूड और हेमलेखाका समागम श्रीदत्तात्रेयजीकी कही बातें सुनकर परशुरामजीने अत्यन्त कुतूहल और विनयपूर्वक पुनः प्रश्न किया ॥ १ ॥ “भगवन् ! गुरुदेव ! आपने जो कुछ कहा वह सत्य ही है। लोगोंको सब प्रकार अविचारसे ही बड़ी हानि हुई है ॥ २ ॥ अतः विचारसे ही उनका कल्याण हो सकता है। और उसका मूल माहात्म्यश्रवण है—यह भी मैंने सुना। किन्तु उसमें मुझे एक बड़ा सन्देह है ॥ ३ ॥ वह श्रवण भी कैसे प्राप्त हो ? उसके लिये क्या उपाय है। यदि आप कहें कि वह तो स्वाभाविक ही हो जाता है तो सबहीने माहात्म्य- श्रवण क्यों नहीं कर लिया ॥ ४ ॥ अथवा मुझे भी आजतक उसे श्रवण करनेकी रुचि क्यों नहीं हुई ? ऐसे भी लोग हैं जिन्हें मुझसे भी अधिक दुःख प्राप्त हैं और जो