त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे उन्मत्ताश्च ततोऽभूवन् मार्गाद् भ्रष्टाश्च ते तदा । अन्धीभूयातिगहने पतन्तो निम्नभूमिषु ॥ ४३ ॥ कण्टकैःक्षतसर्वाङ्गा भग्नबाहूरुपादकाः । अधिक्षिपन्तश्चान्योऽन्यं कलहञ्चक्रुरुच्चकैः ॥ ४४ ॥ मुष्टिभिश्च शिलाभिश्च काष्ठैर्जघ्नुः परस्परम् । अथ ते दीर्णसर्वाङ्गाः पुरं कञ्चित् समासदुः ॥ ४५ ॥ निशीथे दैववशतः पुरद्वारमुपाययुः । पुरद्वाराधिपालैस्ते प्रतिरुद्धाः प्रवेशने ॥ ४६ ॥ देशकालानभिज्ञानात् कलहञ्चक्रुरुच्चकैः । अथ ते प्रहृता द्वारपालैरतितरां यदा ॥ ४७ ॥ तदा पलायनपरा बभूवुः परितस्तु ते । पतिताः परिखे केचिद् भक्षिता मकरादिभिः ॥ ४८ ॥
लिये खोज करने लगे तो उन्हें धतूरेके फल मिल गये । भ्रमवश उन सबने उन्हें नीबू समझकर खा लिया ॥ ४० उ०-४२ ॥ इससे वे और भी पागल हो गये और अपने मार्गसे भटककर उस घोर जंगलमें गड्ढोंमें गिरने-पड़ने लगे ॥ ४३ ॥ उनके सारे शरीरमें काँटे लग गये, हाथ-पैर और घुटने घायल हो गये तथा वे एक दूसरेको बुरा-भला कहकर आपसमें बड़ा कलह करने लगे ॥ ४४ ॥ होते-होते वे एक-दूसरेपर घूँसे, पत्थर और लकड़ियाँ चलाने लगे । इससे उनके सब अंग क्षत-विक्षत हो गये । अन्तमें वे किसी नगरके पास जा निकले ॥ ४५ ॥ दैववश वे आधी रातके समय नगरके द्वारपर पहुँचे । उस समय द्वारपालने उन्हें नगरमें प्रवेश करनेसे रोका ॥ ४६ ॥ उन्हें कुछ देश-कालका ज्ञान तो था ही नहीं, इसलिये वे उनके साथ भी झगड़ा करने लगे । अब तो द्वारपालों ने भी उनको खूब पीटा ॥ ४७ ॥ तब वे इधर-उधर भागने लगे । उनमेंसे कुछ तो नगरकी खाईमें गिर गये और वहाँ मकर आदि जलजन्तुओंने उन्हें खा लिया ॥ ४८ ॥