त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः । २१ केचित् खातेषु कूपेषु पतिताः प्राणमुत्सृजुः अपरे तैर्विनिहताः केचिज्जीवग्रहं गताः ॥ ४९ ॥ एवं जना हितेच्छाभिः कर्तव्यविषमूर्च्छिताः । अहो विनाशं यान्त्युच्चैर्मोहेनान्धीकृताः खलु ॥ ५० ॥ धन्योऽसि भार्गव त्वन्तु यस्मादभ्युदयं गतः । विचारः सर्वमूलं हि सोपानं प्रथमं भवेत् ॥ ५१ ॥ परश्रेयोमहासौधप्राप्तौ जानीहि सर्वथा । सुविचारमृते क्षेमप्राप्तिः कस्य कथम्भवेत् ॥ ५२ ॥ अविचारः परो मृत्युरविचारहता जनाः । विमृश्यकारी जयति सर्वत्राभीष्टसङ्गमात् ॥ ५३ ॥ अविचारहता दैत्या यातुधानाश्च सर्वशः । विचारपरमा देवाः सर्वतः सुखभागिनः ॥ ५४ ॥ कुछ ने गड्ढों और कुओंमें गिरकर प्राण त्याग दिये और कोई उनसे मार खाकर किसी प्रकार अपनी जान बचाकर भाग गये॥ ४९ ॥ इसी प्रकार संसारी लोग अपने कल्याणकी कामनासे कर्त्तव्यरूप विषको पीकर मूर्च्छित हो गये हैं और मोहसे अन्धे होकर उल्टे विनाशकी ओर ही जा रहे हैं ॥ ५० ॥ परशुराम ! तुम्हारे हृदयमें विचार उदय हुआ है, अतः तुम धन्य हो । विचार ही सबका मूल है और परमकल्याणरूप महत्पदकी प्राप्तिके लिये यही पहली सीढ़ी है—यह तुम निश्चय जानो । भला, सम्यक् विचारके बिना किसीको कल्याणकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ॥५१-५२॥ अविचार सबसे बड़ी मृत्यु है, सब लोग अविचारसे ही नष्ट हो रहे हैं । जो विचारपूर्वक चलता है वही सर्वत्र अपने इच्छित पदार्थ प्राप्त करके अन्तमें विजय ( सफलता ) प्राप्त करता है ॥ ५३ ॥ दैत्य और राक्षस अविचारके कारण ही सब प्रकार नष्ट होते हैं और देवता लोग विचारनिष्ठ होनेके कारण सब प्रकार सुखके अधिकारी होते हैं ॥ ५४ ॥