त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे विचाराद्विष्णुमाश्रित्य जयन्ति प्रत्यरीन् सदा । विचारः सुखवृक्षस्य बीजमङ्कुरशक्तिकम् ॥ ५५ ॥ विराजते विचारेण पुरुषः सर्वतोऽधिकः । विचाराद्विधिरुत्कृष्टो विचारात्पूज्यते हरिः ॥ ५६ ॥ सर्वज्ञस्तु विचारेण शिव आसीन्महेश्वरः । अविचारान्मृगासक्तो रामो बुद्धिमतां वरः ॥ ५७ ॥ परमामापदं प्राप्तो विचारादथ वारिधिम् । बद्ध्वा लङ्कापुरीं रक्षोगणाकीर्णां समाक्रमत् ॥ ५८ ॥ अविचाराद्विधिरपि मूढो भूत्वाभिमानतः । शिरश्छेदं समगमदिति संस्तुतमेव ते ॥ ५९ ॥ महादेवोऽविचारेण वरं दत्वा सुराय वै । भस्मीभावात् स्वस्य भीतः पलायनपरोऽभवत् ॥ ६० ॥ वे विचारपूर्वक विष्णुभगवान्का आश्रय लेकर सर्वदा अपने शत्रुओंपर विजयी होते हैं। विचार ही सुखरूपी वृक्षका बीज है, इसीमें सुखका अंकुर फूटनेकी शक्ति है ॥ ५५ ॥ विचारके ही कारण मनुष्यकी सबसे अधिक शोभा होती है। विचारके कारण ही ब्रह्मा सबसे श्रेष्ठ माने जाते हैं और विचारसे ही विष्णुकी सर्वत्र पूजा होती है ॥ ५६ ॥ विचारके द्वारा ही भगवान् शिव सर्वज्ञ और महेश्वर हैं। तथा [इसके विपरीत] बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ होनेपर भी अविचारके कारण रामका सुवर्णमृगके प्रति आकर्षण हुआ और वे बड़ी आपत्तिमं पड़ गये। फिर विचारका आश्रय लेकर ही उन्होंने समुद्रपर पुल बनवाया और राक्षसोंसे बसी हुई लंकापुरी पर आक्रमण किया ॥ ५७-५८ ॥ यह बात तुमसे कही ही जा चुकी है कि अविचारके कारण ही अभिमानसे मूढ होकर ब्रह्माने अपना एक सिर कटवा लिया था * ॥ ५९ ॥ महादेवजीने भी अविचारके वशीभूत होकर भस्मासुरको वर दे दिया और फिर अपने भस्म होनेकी सम्भावनासे भयभीत होकर भागते फिरे ॥ ६० ॥
- पहले ब्रह्माके पाँच सिर थे। जब वे सरस्वती को देखकर कामातुर हुए तब भगवान् शंकर ने उनकी भर्त्सना की और अपने हाथ से उनका पाँचवाँ मस्तक काट डाला।