भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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द्वितीयोऽध्यायः । २३ अविचाराद्धरिः पूर्वं भृगुपत्नीं निहत्य तु । शापेन परमं दुःखमाप्तमत्यन्तदुःसहम् ॥ ६१ ॥ एवमन्ये सुरा दैत्या यातुधाना नरा मृगाः । अविचारवशादेव विपदं प्राप्नुवन्ति हि ॥ ६२ ॥ महाभागास्ते हि धीरा यान् कुत्रापि च भार्गव । विजहाति विचारो नो नमस्तेभ्यो निरन्तरम् ॥ ६३ ॥ कर्त्तव्यमविचारेण प्राप्य मुह्यन्ति सर्वतः । विचार्य कृत्वा सर्वेभ्यो मुच्यतेऽपारसङ्कटैः ॥ ६४ ॥ एवं लोकांश्चिरादेषोऽविचारः सङ्गतोऽभवत् । यस्याविचारो यावत् स्यात् कुतस्तावद्विमर्शनम् ॥ ६५ ॥ ग्रीष्मभीष्मकरातप्ते मरुौ क्व शिशिरं जलम् । एवं चिराविचाराग्निज्यालामालापरीवृते ॥ ६६ ॥ विचारशीतलस्पर्शः कथं स्यात् साधनं विना । साधनन्त्वेकमेवात्र परमं सर्वतोऽधिकम् ॥ ६७ ॥ अविचारसे ही पूर्वकालमें विष्णुभगवान् भृगुकी भार्याको मारकर फिर शापसे अत्यन्त असहनीय आपत्तिमें पड़ गये ॥ ६१ ॥ इसी प्रकार और भी असुर, देवता, राक्षस, मनुष्य एवं मृग आदि अविचारके अधीन होनेपर ही विपत्तिमें पड़ते हैं ॥ ६२ ॥ परशुराम ! वे बुद्धिमान् पुरुष बड़े ही भाग्यशाली हैं जिन्हें किसी भी परिस्थितिमें विचार नहीं छोड़ता। उन्हें बार-बार प्रणाम है ॥६३॥ अविचारसे अकर्त्तव्यको ही कर्त्तव्य समझकर लोग सब प्रकार मोहमें पड़ जाते हैं और विचारपूर्वक कर्म करनेपर वे सब प्रकारके अपार संकटोंसे भी छुटकारा पा लेते हैं ॥ ६४ ॥ इस प्रकार चिरकालसे इस अविचारने ही लोगोंको प्रभावित कर रखा है। और जबतक किसीपर अविचारका अधिकार है तबतक वह विचार कैसे कर सकता है ॥ ६५ ॥ ग्रीष्मकालके प्रचण्ड मार्त्तण्डकी किरणोंसे तपे हुए मरुस्थलमें भला, शीतल जल कहाँ मिल सकता है ? इसी प्रकार चिरकालसे अविचाररूप अग्निकी लपटोंसे घिरे हुए अन्तःकरणमें बिना साधन