भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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२४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सर्वहृत्पद्मनिलयदेवतायाः परा कृपा । तां विना स्यात् कथं कस्य महाश्रेयः सुसाधनः ॥ ६८ ॥ विचारार्कोऽविचारान्धमहाध्वान्तनिबर्हणः । तत्र मूलं भवेद्भक्त्या देवतापरिराधनम् ॥ ६९ ॥ राधिता परमा देवी सम्यक् तुष्टा सती तदा । विचाररूपतां याति चित्ताकाशे रविर्यथा ॥ ७० ॥ तस्मान्निजात्मरूपां तां त्रिपुरां परमेश्वरीम् । सर्वान्तरनिकेतां श्रीमहेशीं चिन्मयीं शिवाम् ॥ ७१ ॥ आराधयेदकापट्यात् सद्गुरुद्वारतः क्रमात् । आराधनेऽपि मूलं स्याद्भक्तिः श्रद्धा च निर्मला ॥ ७२ ॥ तत्रापि मूलं माहात्म्यश्रवणं परिकीर्तितम् । अतस्ते प्रथमं राम माहात्म्यं सम्प्रवर्णितम् ॥ ७३ ॥ किये विचारका शीतल स्पर्श कैसे प्राप्त हो सकता है । इसके लिये परम साधन भी एक ही है और वह सबसे बढ़कर है ॥ ६६-६७ ॥ [ वह है—] सबके हृदयकमलमें निवास करनेवाली श्रीत्रिपुरा- देवीकी परम कृपा । उसके बिना भला किसीको परम कल्याणकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? ॥ ६८ ॥ विचाररूपी सूर्य अविचारसे अन्धे हुए लोगोंके अज्ञानरूप महान् अन्धकारको नष्ट करनेवाला है । उसका मूल भक्तिभावसे उनकी आराधना करना ही है ॥ ६६ ॥ आराधिता होनेपर महादेवी त्रिपुरा प्रसन्न होकर विचार रूपमें परिणत हो सूर्यके समान हृदयाकाशमें प्रकट हो जाती हैं ॥ ७० ॥ अतः उन भगवती त्रिपुराकी जो अपनी आत्मस्वरूपा, सर्वान्तर- यामिनी, महान् ऐश्वर्यशालिनी, चिन्मयी और कल्याणस्वरूपिणी हैं— सद्गुरुके द्वारा दीक्षित होकर निष्छल भावसे विधिवत् आराधना करनी चाहिये । उनकी आराधनामें भी निर्मल श्रद्धा एवं भक्ति ही मूल ( प्रधान कारण ) हैं ॥ ७१-७२ ॥ उनका भी मूल बताया गया है उनके माहात्म्यका श्रवण, इसीसे हे परशुराम ! पहले मैंने तुम्हें उनका माहात्म्य सुनाया था ॥ ७३ ॥