त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः । २५ तेन श्रुतेनाधुना त्वं प्राप्तवानसि मङ्गलम् । विचारं श्रेयसो मूलं यस्मात्ते न हि भीरितः ॥ ७४ ॥ विचारोदयपर्यन्तं भयमस्ति महत्तमम् । अविचारात्मदोषेण ग्रस्तस्य प्रतिवासरम् ॥ ७५ ॥ यथा हि सन्निपातेन ग्रस्तस्यौषधसेवनात् । अपि तावद्द्भवेद् भीतिर्यावद्धातोश्च शुद्धता ॥ ७६ ॥ प्राप्ते विचारे परमे फलितं जीवितं नॄणाम् । यावत् सुजन्म सुनॄणां विचारो न भवेत् परः ॥ ७७ ॥ तावन्तो जन्मतरवो वन्ध्या विफलहेतुतः । स एव सफलो जन्मवृक्षो यत्र विमर्शनम् ॥ ७८ ॥ कूपमण्डूकसदृशा ये नरा निर्विमर्शनाः । यथा कूपे समुत्पन्नो भेको नो वेद किञ्चन ॥ ७९ ॥ शुभं वाप्यशुभं वापि कूपे एव विनश्यति । तथा जना अपि वृथोत्पन्ना ब्रह्माण्डकूपके ॥ ८० ॥ उसके श्रवणसे ही तुम्हें इस [ विचाररूप ] मङ्गलकी प्राप्ति हुई है । विचार ही कल्याणका मूल है, अतः अब तुम्हें इस लोकमें किसी प्रकारका भय नहीं है ॥ ७४ ॥ जबतक विचार उदय नहीं होता तबतक तो अविचाररूप दोषसे ग्रस्त पुरुषके लिये प्रतिदिन (नित्य ही) बड़ा भारी भय रहता है ॥७५॥ जिस प्रकार सन्निपातग्रस्त पुरुषको तबतक तो भय रहता है जबतक कि औषध सेवन कर लेनेपर भी धातुओंकी अशुद्धि शेष रहती है ॥ ७६ ॥ उत्तम विचारकी प्राप्ति होनेपर ही मनुष्यका जीवन सफल होता है । उत्तम मनुष्यजन्म मिलनेपर भी जबतक विचार न हो तबतक तो निष्फल रहनेके कारण ये मानवजन्मरूप वृक्ष भी वन्ध्य ( व्यर्थ ) हैं । इनमें सफल तो वही जन्मरूप वृक्ष है जिसमें विचारका उदय हुआ है ॥ ७७-७८ ॥ जो लोग विचारहीन हैं वे तो कूपमण्डूकके समान हैं। जिस प्रकार कुएँमें उत्पन्न हुआ मेंढक कुएँसे बाहरकी अच्छी या बुरी कोई भी बात नहीं जानता और कुएँमें ही नष्ट हो जाता है, उसी