भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 40

२६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे शुभं वाप्यशुभं वापि न विदुः स्वात्मनः क्वचित् । उत्पद्योत्पद्य नश्यन्ति न जानन्ति स्वकं हितम् ॥ ८१ ॥ सुखबुद्धिश्च दुःखेषु सुखे दुःखनिश्चयम् । प्राप्याविचारमाहात्म्यात् पच्यन्ते सृतिपावके ॥ ८२ ॥ दुःखेन क्लिश्यमानाश्च न कथञ्चित् त्यजन्ति तत् । यथा पादशताघातैस्ताडितोऽपि महाखरः ॥ ८३ ॥ रासभीमनुयात्येव तथा संसरणं जनः । त्वन्तु राम विचारात्मा पारं दुःखस्य सङ्गतः ॥ ८४ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे विचारमाहात्म्ये द्वितीयोऽध्यायः ॥ प्रकार [ विचारहीन ] लोग भी वृथा ही इस ब्रह्माण्डकूपमें उत्पन्न होते हैं ॥ ७६-८० ॥ उन्हें अपने हिताहितका कुछ भी ज्ञान नहीं होता । वे पुनः पुनः उत्पन्न होकर मरते रहते हैं, अपने हितका उन्हें कुछ पता नहीं चलता ॥ ८१ ॥ अविचारके प्रभावसे उनकी [ पुत्र-सम्पत्ति आदि ] दुःखके साधनोंमें सुखबुद्धि हो जाती है और [ वैराग्यादि ] सुखके साधनोंमें दुःखबुद्धि । अतः वे [ जन्म-मरणरूप ] संसाराग्निमें जलते रहते हैं ॥ ८२ ॥ दुःखरूप स्त्री-पुत्रादिसे तरह-तरह क्लेश पानेपर भी वे किसी प्रकार उन्हें त्याग नहीं पाते । जिस प्रकार गधा सैकड़ों लातें खानेपर भी गधी के पीछे लगा ही रहता है उसी प्रकार लोग संसारका पीछा नहीं छोड़ते । परशुराम ! तुम तो विचारवान् हो, इसलिये अब इस संसाररूप दुःखसे पार हो गये हो ॥ ८३-८४ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ।