त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ दत्तात्रेयोक्तवचः श्रुत्वात्यन्तसुकौतुकी । जामदग्न्यः पुनरपि पप्रच्छ विनयान्वितः ॥ १ ॥ भगवन् गुरुणाऽथोक्तं भवता यत्तथैव तत् । अविचारात्परो नाशः संप्राप्तः सर्वथा जनैः ॥ २ ॥ विचारेण भवेच्छ्रेयस्तन्निदानमपि श्रुतम् । माहात्म्यश्रुतिरित्येव तत्र मे संशयो महान् ॥ ३ ॥ कथं वा तदपि प्राप्यं साधनं तत्र किं भवेत् । स्वाभाविकं तद्यदि स्यात्तत् सर्वैर्न कुतः श्रुतम् ॥ ४ ॥ अहं वाद्यावधि कुतः प्रवृत्तिं नाप्तवानिह । दुःखं मत्तोऽधिकं प्राप्ता विहताश्च पदे पदे ॥ ५ ॥ न कुतः साधनं प्राप्ता एतन्मे कृपया वद । इत्यापृष्टः प्राह भूयो हृष्टो दत्तो दयानिधिः ॥ ६ ॥ तृतीय अध्याय ॥ ३ ॥ हेमचूड और हेमलेखाका समागम श्रीदत्तात्रेयजीकी कही बातें सुनकर परशुरामजीने अत्यन्त कुतूहल और विनयपूर्वक पुनः प्रश्न किया ॥ १ ॥ “भगवन् ! गुरुदेव ! आपने जो कुछ कहा वह सत्य ही है। लोगोंको सब प्रकार अविचारसे ही बड़ी हानि हुई है ॥ २ ॥ अतः विचारसे ही उनका कल्याण हो सकता है। और उसका मूल माहात्म्यश्रवण है—यह भी मैंने सुना। किन्तु उसमें मुझे एक बड़ा सन्देह है ॥ ३ ॥ वह श्रवण भी कैसे प्राप्त हो ? उसके लिये क्या उपाय है। यदि आप कहें कि वह तो स्वाभाविक ही हो जाता है तो सबहीने माहात्म्य- श्रवण क्यों नहीं कर लिया ॥ ४ ॥ अथवा मुझे भी आजतक उसे श्रवण करनेकी रुचि क्यों नहीं हुई ? ऐसे भी लोग हैं जिन्हें मुझसे भी अधिक दुःख प्राप्त हैं और जो