त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः । १६ कर्त्तव्यविषसंसर्गमूर्च्छितं पश्य वै जगत् । अन्धीभूतं न जानाति क्रियां स्वस्य हितात्मिकाम् ॥ ३६ ॥ अन्यथा चेष्टते भूयो मोहमापद्यते पुनः । एवंविधो हि लोकोऽयं कर्त्तव्यविषमूर्च्छितः ॥ ३७ ॥ अनादिकालतो भीमे पच्यते विषसागरे । यथा हि केचित्पथिकाः प्राप्ता विन्ध्यं महानगम् ॥ ३८ ॥ क्षुधाभरसमाक्रान्ताः फलानि ददृशुर्वने । विषमुष्टिफलान्याशु तिन्दुकस्य फलेहया ॥ ३९ ॥ भक्षयामासुरत्यन्तक्षुधानष्टरसेन्द्रियाः । अथ ते तद्विषज्वालाज्वलिताङ्गाः सुपीडिताः ॥ ४० ॥ अन्धीभूता विचिन्वन्तस्तद्विषोष्णप्रशान्तये । अविदित्वा मुष्टिफलं तिन्दुकफलनिषेवणात् ॥ ४१ ॥ मत्वा ज्वालां निजे देहे धत्तूरफलमासदुः । भ्रान्त्या जम्बीरबुद्ध्या तत् सर्वैरासीह सुभक्षितम् ॥ ४२ ॥ देखो, यह सारा संसार कर्त्तव्यरूप विषके संसर्गसे मूर्च्छित होनेके कारण अन्धा हो रहा है, इसलिये इसे अपना हित करनेवाली क्रियाका पता नहीं लगता ॥ ३६ ॥ यह बार-बार उलटे ही कर्म करता है और पुनः पुनः मोहग्रस्त होता रहता है। कर्त्तव्यरूप विषसे मूर्च्छित यह लोक अनादिकालसे इसी प्रकार भीषण विषसमुद्रमें सन्तप्त हो रहा है ॥ ३७-३८ पू० ॥ [ यह बात ऐसी है जैसे—] कुछ यात्री पर्वतराज विन्ध्याचलपर जा पहुँचे। वे भूखसे अत्यन्त व्याकुल थे। वहां वे फल खोजने लगे, और काजूके फल समझकर कुचलाके फल खा गये। अत्यन्त क्षुधातुर होनेके कारण उनकी रसनेन्द्रिय शक्तिहीन हो गयी थी। [ अतः उनके स्वादकी ओर उनका ध्यान नहीं गया ] ॥ ३८ उ०-४० पू० ॥ अब कुचलाके विषकी ज्वालासे उनके अंग-अंगमें जलन होने लगी। उससे उन्हें बड़ी बेचैनी हुई। उन्हें यह तो पता था नहीं कि हमने कुचलाके फल खा लिये हैं, अतः अपने शरीर में उस ज्वालाको काजू खानेका ही परिणाम समझकर वे अन्धे-से होकर उसकी शान्तिके