भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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१८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे दयमानस्वभावोऽथ दत्तो वक्तुमुपाक्रमत् । वत्स भार्गव धन्योऽसि यस्य ते बुद्धिरीदृशी ॥ ३० ॥ अब्धौ निमज्जतो नौकासम्प्राप्तिरिव सङ्गता । एतावदेव सुकृतिः क्रियाभिरुपसङ्गतः ॥ ३१ ॥ स्वात्मानमारोहयति पदे परमपावने । सा देवी त्रिपुरा सर्वहृदयाकाशरूपिणी ॥ ३२ ॥ अनन्यशरणं भक्तं प्रत्येवं रूपिणी द्रुतम् । हृदयान्तःपरिणता मोचयेन्मृत्युजालतः ॥ ३३ ॥ यावत् कर्त्तव्यवेतालान्न बिभेति दृढं नरः । न तावत् सुखमाप्नोति वेतालाविष्टवत् सदा ॥ ३४ ॥ नृणां कर्त्तव्यकालाहिसन्दष्टानां कथं शुभम् । करालगरलज्वालाक्रान्ताङ्गानामिव क्वचित् ॥ ३५ ॥ अधिकारी देखकर सहजदयालु भगवान् दत्तात्रेयने कहना आरम्भ किया—बेटा परशुराम ! तुम्हें ऐसी बुद्धि प्राप्त हुई, अतः तुम धन्य हो । यह ऐसी है जैसे किसी समुद्रमें डूबनेवालेको नौका मिल जाय ॥ २९-३१ पू० ॥ उपासना आदि क्रियाओंके द्वारा पुण्यवान् पुरुषको यही प्राप्त होता है कि वह अपने-आपको परमपवित्र पदमें आरूढ कर सकता है ॥ ३१ उ०-३२ पू० ॥ देवी त्रिपुरा सभीकी हृदयाकाशस्वरूपा है [—उसका यद्यपि कोई आकार नहीं है—] तथापि अपने अनन्यशरण भक्तके लिये वह तुरन्त मूर्त्तिमती हो जाती है और उसके अन्तःकरणमें आविर्भूत होकर वह उसे मृत्युके पाशसे मुक्त कर देती है ॥ ३२ उ०-३३ ॥ जबतक मनुष्यको इस कर्त्तव्यरूप पिशाचका भारी भय नहीं होता, तबतक उसे सुखकी प्राप्ति नहीं होती, वह भूताविष्ट व्यक्तिके समान विक्षिप्त रहता है ॥ ३४ ॥ भीषण विषकी ज्वालासे जिसके अंग-प्रत्यंगोंमें दाह हो रहा हो उस व्यक्तिके समान कर्त्तव्यरूप काले नागसे डसे हुए पुरुषका कल्याण भला कैसे हो सकता है ? ॥ ३५ ॥