त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः । १७ अप्यसत्यात्मकं यस्मात् कथं सत्यसमं भवेत् । अथापि नित्यकर्त्तव्यमेतन्नास्यावधिः क्वचित् ॥ २४ ॥ लक्षितो मे स भगवन् संवर्त्तः सर्वशीतलः । कर्त्तव्यलेशविषमविषज्वालावनिर्गतः ॥ २५ ॥ हसन्निव लोकतन्त्रमभयं मार्गमाश्रितः । वने दावाग्निसङ्कीर्णे हिमाम्बुस्थगजोपमः ॥ २६ ॥ सर्वकर्त्तव्यवैकल्यामृतसंस्वादनन्दितः । कथमेतां दशां प्राप्तो यच्च मामाह तत्पुरा ॥ २७ ॥ सर्वमेतत् सुकृपया गुरो मे वक्तुमर्हसि । कर्त्तव्यकालभुजगनिगीर्णं मां विमोचय ॥ २८ ॥ इत्युक्त्वा चरणौ मूर्ध्ना गृहीत्वा दण्डवन्नतः । अथ दृष्ट्वा तथाभूतं भार्गवं मुक्तिभाजनम् ॥ २९ ॥ अतः [ कृतिसाध्य होनेके कारण ] असत्यरूप होनेपर भी यह सत्यके समान कैसे हो सकती है ? यदि कहो कि [ 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतꣳसमाः' इस श्रुतिवचन के अनुसार ] यह तो मनुष्यको नित्य करते ही रहना चाहिये, तब तो कभी इसकी समाप्ति ही नहीं होगी ॥ २४ ॥ किन्तु भगवान् संवर्त्त मुनि तो मुझे सब प्रकार शान्त प्रतीत होते थे । वे तो कर्त्तव्यकी लेशमात्र विषमविषमयी ज्वालासे भी मुक्त हो चुके थे ॥ २५ ॥ इस लोकव्यवहारको देखकर उन्हें मानो हँसी आती थी और वे भयशून्य मार्गपर आरूढ थे; जैसे दावाग्निसे व्याप्त वनमें कोई शीतल- जलमें खड़ा हुआ गजराज हो ॥ २६ ॥ वे सर्वकर्त्तव्यविमुक्ति रूप अमृतका आस्वादन करके परम आनन्दित जान पड़ते थे । ऐसी अवस्था उन्हें कैसे प्राप्त हुई, जिसका कि उस समय उन्होंने मुझसे भी वर्णन किया था ॥ २७ ॥ गुरुदेव ! कृपापूर्वक यह सब रहस्य मुझे बताइये । मुझे कर्त्तव्यरूप काले नागने डसा हुआ है, उससे आप मुझे छुड़ा लीजिये ॥ २८ ॥ ऐसा कहकर परशुरामने उनके दोनों चरणोंको सिरपर रखकर दण्डवत् प्रणाम किया । तब परशुरामकी ऐसी स्थिति और उन्हें मुक्तिका