त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तदल्पफलमेवेति श्रुतं संवर्त्तवक्त्रतः । मन्ये तदहमल्पं यद् दुःखमेवेति सर्वथा ॥ १८ ॥ असुखं नहि दुःखं स्याद् दुःखमल्पं सुखं स्मृतम् । यतः सुखात्यये दुःखं भवेद् गुरुतरं किल ॥ १९ ॥ नैतावदेव चैतस्मादधिकं चास्ति वैभवम् । मृत्यूपयोगो यद्भूयो न तन्न स्यात्कदाचन ॥ २० ॥ एवमेव भवेद्यन्मे क्रियते त्रिपुराविधौ । बालक्रोडेव मे भाति सर्वं तन्मानसं यतः ॥ २१ ॥ एतद्यदुक्तं भवता कर्तुं तस्यादितोऽन्यथा । नियतं चाप्यन्यथा तद्वचोभेदसमाश्रयात् ॥ २२ ॥ आलम्बभेदतश्चापि विविधं प्रतिपद्यते । कथमेतत्क्रतुसममसत्यफलसम्मितम् ॥ २३ ॥ किन्तु संवर्त्तजीके मुखसे सुना कि वे सब तो तुच्छ फल देनेवाले हैं। और जो तुच्छ होता है उसे तो मैं सर्वथा दुःखरूप ही मानता हूँ ॥ १८ ॥ वास्तवमें सुखका अभाव ही दुःख नहीं है, अल्प सुख भी दुःख ही माना जाता है; क्योंकि सुखका अन्त होनेपर भी बड़ा भारी दुःख होता है ॥ १९ ॥ इतना ही नहीं, इस कर्मकाण्डमें एक इससे भी बड़ा भय यह है कि अन्तमें मृत्यु होती है, और ऐसा कोई उपाय नहीं है जिससे वह न हो ॥ २० ॥ त्रिपुरादेवीकी उपासनामें मैं जो कुछ करता हूँ उससे भी ऐसा ही होता है। क्योंकि वह सब भी मानसिक व्यापार ही है, अतः मुझे तो बच्चोंका खेल-सा जान पड़ता है ॥ २१ ॥ आपने जिस विधिसे उपासना करनेको कहा था उस प्रकार भी की जा सकती है और अन्य प्रकार भी। [ कर्मानुष्ठानके समान ] विधिसे भी उसका अनुष्ठान हो सकता है और [ भावकी प्रधानतासे ] बिना विधिके भी; क्योंकि शास्त्रोंमें मतभेद है ही ॥ २२ ॥ इसके सिवा आलम्बन ( इष्टदेव ) के भेदसे भी उपासना अनेक प्रकारकी है। इस प्रकार असत्य फलवाली होनेसे यह यज्ञोंके समान ही क्यों नहीं है ? ॥ २३ ॥