त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः । १५ तद्भवचरणद्वन्द्वं तत आसादितं मया । अन्धो जनसमायोगमिवात्यन्तसुखावहम् ॥ १२ ॥ तन्मे न विदितं किञ्चित्संवर्त्तमुनिराह यत् । श्रुतं माहात्म्यमखिलं त्रिपुराभक्तिकारकम् ॥ १३ ॥ सा भवद्रूपिणी देवी हृदि नित्यं समाहिता । एवं मे वर्त्तमानस्य किं फलं समवाप्यते ॥ १४ ॥ भगवन् कृपया ब्रूहि यत्संवर्त्तः पुरावदत् । अविदित्वा च तन्नास्ति क्वचिच्च कृतकृत्यता ॥ १५ ॥ तदुक्तमविदित्वा तु यद्यच्च क्रियते मया । तद्वालक्रीडनमिव प्रतिभाति समन्ततः ॥ १६ ॥ पुरा मया हि बहुशः क्रतुभिर्दक्षिणोच्छ्रयैः । प्रभृतान्नगणैरिष्टा देवाः शक्रमुखा ननु ॥ १७ ॥ अतः मैं वहाँ से आपके चरणयुगलकी शरणमें आया हूँ, जैसे कोई [अकेला भटकता हुआ] अन्धा अत्यन्त सुखदायक जनसमाजमें आ जाय ॥ १२ ॥ मुझसे संवर्त्त मुनिने जो कुछ कहा वह मैंने कुछ भी नहीं समझा। आपके मुखारविन्दसे पहले मैंने भगवती त्रिपुरामें भक्तिभाव जागृत करनेवाला माहात्म्य पूरा सुना था ॥ १३ ॥ वह त्रिपुरादेवी साक्षात् आपका ही स्वरूप है। वह सर्वदा मेरे हृदयमें विराजमान है। इस स्थितिमें रहते हुए मुझे किस फलकी प्राप्ति होगी ॥ १४ ॥ इसके सिवा भगवन् ! संवर्त्तजीने मुझसे पहले जो बात कही थी, कृपया वह भी समझा दीजिये, क्योंकि उसे बिना समझे कभी कृतकृत्यता प्राप्त नहीं हो सकती ॥ १५ ॥ उनकी कही हुई बातको समझे बिना मैं जो कुछ भी करता हूँ वह मुझे सब प्रकार बच्चोंका खेल-सा जान पड़ता है ॥ १६ ॥ पूर्वकालमें मैंने यज्ञोंद्वारा इन्द्रादि देवताओंका पूजन किया था। उन यज्ञोंमें बड़ी-बड़ी दक्षिणाएँ दी थीं और खूब अन्नदान किया था ॥ १७ ॥