भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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२८६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मुक्ता हि ज्ञानिनो लोके ह्युत्तमाधममध्यमाः । प्रारब्धोपनतैर्भोगैः खिद्यमानाः क्षणे क्षणे ॥ १६२ ॥ स्वरूपज्ञास्तु ये राम ते मन्दज्ञानिनः स्मृताः । ये तु प्रारब्धसंप्राप्तान् भुञ्जाना अपि नो विदुः ॥ १६३ ॥ मधुक्षीवा रसमिव मध्यास्ते ज्ञानिनः स्मृताः । ये तु प्रारब्धकोटीनां फलैरपि विचित्रितैः ॥ १६४ ॥ न स्वस्थितेः प्रच्यवन्ते नोद्विजन्त्यापदां गणैः । न विस्मयन्ति चाश्चर्यैर्न हृष्यन्ति महासुखैः ॥ १६५ ॥ अन्तःशान्ता वहिर्लोकसमास्ते ज्ञानिषूत्तमाः । एवं बुद्धिविभेदेन ज्ञानपाकविभेदतः ॥ १६६ ॥ प्रारब्धशेषमाहात्म्याद्व्यवहारा विचित्रिताः । मधुमत्तादिवच्चैषां व्यवहारोऽपि सम्भवेत् ॥ १६७ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अष्टादशोऽध्यायः ।

लोकमें मुक्त हुए ज्ञानी पुरुष तीन प्रकारके हैं—उत्तम, अधम और मध्यम। जो लोग प्रारब्धवश प्राप्त हुए भोगोंसे क्षण-क्षणमें खिन्न होते रहते हैं, किन्तु जिन्हें स्वरूपका ज्ञान होता है, वे मन्द ज्ञानी माने जाते हैं ॥ १६२-१६३ पू० ॥ जिन्हें प्रारब्धसे प्राप्त हुए भोगोंको भोगते हुए भी, मदिरोन्मत्तके समान निरन्तर समाहित रहनेके कारण, उन भोगोंका कुछ पता नहीं चलता, वे मध्यम ज्ञानी माने गये हैं ॥ १६३ उ०-१६४ पू० ॥ किन्तु जो करोड़ों प्रारब्धोंके तरह-तरहके फल-भोग प्राप्त होनेपर भी अपनी स्वरूपस्थितिसे च्युत नहीं होते, अनेकों आपत्तियाँ आने- पर भी खिन्न नहीं होते, बड़े-बड़े आश्चर्योंसे भी जिन्हें विस्मय नहीं होता और महान् सुखोंकी प्राप्ति होनेपर भी हर्ष नहीं होता, इस प्रकार जो भीतरसे शान्त और ऊपरसे अन्य लोगोंके समान रहते हैं, वे ज्ञानियोंमें उत्तम माने गये हैं ॥ १६४ उ०-१६६ पू० ॥ इस प्रकार बुद्धिके भेदसे, ज्ञानकी परिपक्वताके भेदसे और शेष प्रारब्धके प्रभावसे ज्ञानियोंके व्यवहार भिन्न-भिन्न प्रकारके होते हैं। तथापि मदोन्मत्तादिके समान उनके द्वारा व्यवहार भी अवश्य हो सकता है ॥ १६६ उ०-१६७ ॥ अष्टादश अध्याय समाप्त।