भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

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अष्टादशोऽध्यायः। २८५ अपरेयं महाभ्रान्तिस्तेष्वभ्रान्तत्वनिश्चयः । यथा हि बाघविज्ञानात् पूर्वं भ्रान्तिर्भवेत्तथा ॥ १५६ ॥ सर्वजाग्रतविज्ञानमभ्रान्तिरिव हि स्थितम् । यथा च रजतज्ञानं शुक्तिज्ञानाद् भ्रमात्मकम् ॥ १५७ ॥ एवं चिदात्मविज्ञानात् सर्वं ज्ञानं भ्रमात्मकम् । नभोनीलभ्रमः सर्वसमानो भासते तथा ॥ १५८ ॥ जागतो भ्रम एष स्यात् सर्वेषां दोषहेतुतः । अभ्रान्तिशुद्धविज्ञानं यच्चिदात्मतया स्थितम् ॥ १५९ ॥ एवमेतच्चया पृष्टं प्रोक्तं युक्त्यनुसङ्गतम् । सन्देहमत्र सन्त्यज्य राम प्रोक्तं विनिश्चिनु ॥ १६० ॥ कथं मुक्ते व्यवहृतिरिति पृष्टं पुरा तु यत् । तत्ते प्रवक्ष्यामि राम शृणु सम्यक् समाहितः ॥ १६१ ॥ सत्यता सिद्ध नहीं हो जाती । इसमें सन्देह नहीं कि इस प्रकारके सब ज्ञान भ्रममात्र ही हैं । तथा उन्हें भ्रम न मानना—यह दूसरी बहुत बड़ी भ्रान्ति है ॥ १५५-१५६ पू० ॥ जिस प्रकार कोई भी भ्रान्ति उसका बाध अनुभव होनेसे पहले सत्य ही जान पड़ती है उसी प्रकार जाग्रत्कालका सारा ज्ञान अभ्रान्ति- सा ही जान पड़ता है ॥ १५६ उ०-१५७ पू० ॥ किन्तु जिस प्रकार शुक्तिका परिचय हो जानेपर उसमें अध्यस्त चाँदीकी प्रतीति भ्रमरूप जान पड़ती है, उसी प्रकार चेतन आत्माका ज्ञान होनेपर अन्य सभी ज्ञान भ्रमरूप निश्चय होते हैं ॥ १५७ उ०-१५८ पू० ॥ जिस प्रकार आकाशकी नीलताका भ्रम सबको समानरूपसे भासता है उसी प्रकार अविद्यारूप दोषके कारण जाग्रत्कालका भ्रम सभीको समानरूपसे हो रहा है । अभ्रान्ति तो शुद्ध विज्ञान ही है जो चेतन आत्मारूपसे स्थित है ॥ १५८ उ०-१५६ ॥ परशुराम ! इस प्रकार तुम्हारे प्रश्नके विषयमें मैंने युक्तिपूर्वक उत्तर दे दिया । तुम इस विषयमें सन्देह त्यागकर जैसा कहा गया है वैसा ही निश्चय करो ॥ १६० ॥ तुमने पहले ( पन्द्रहवें अध्यायके आरम्भमें ) पूछा था कि मुक्ति हो जानेपर भी व्यवहार कैसे होता है ! उसका उत्तर देता हूँ ! परशुराम ! खूब सावधान होकर सुनो ॥ १६१ ॥