त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
अष्टादशोऽध्यायः। २८५ अपरेयं महाभ्रान्तिस्तेष्वभ्रान्तत्वनिश्चयः । यथा हि बाघविज्ञानात् पूर्वं भ्रान्तिर्भवेत्तथा ॥ १५६ ॥ सर्वजाग्रतविज्ञानमभ्रान्तिरिव हि स्थितम् । यथा च रजतज्ञानं शुक्तिज्ञानाद् भ्रमात्मकम् ॥ १५७ ॥ एवं चिदात्मविज्ञानात् सर्वं ज्ञानं भ्रमात्मकम् । नभोनीलभ्रमः सर्वसमानो भासते तथा ॥ १५८ ॥ जागतो भ्रम एष स्यात् सर्वेषां दोषहेतुतः । अभ्रान्तिशुद्धविज्ञानं यच्चिदात्मतया स्थितम् ॥ १५९ ॥ एवमेतच्चया पृष्टं प्रोक्तं युक्त्यनुसङ्गतम् । सन्देहमत्र सन्त्यज्य राम प्रोक्तं विनिश्चिनु ॥ १६० ॥ कथं मुक्ते व्यवहृतिरिति पृष्टं पुरा तु यत् । तत्ते प्रवक्ष्यामि राम शृणु सम्यक् समाहितः ॥ १६१ ॥ सत्यता सिद्ध नहीं हो जाती । इसमें सन्देह नहीं कि इस प्रकारके सब ज्ञान भ्रममात्र ही हैं । तथा उन्हें भ्रम न मानना—यह दूसरी बहुत बड़ी भ्रान्ति है ॥ १५५-१५६ पू० ॥ जिस प्रकार कोई भी भ्रान्ति उसका बाध अनुभव होनेसे पहले सत्य ही जान पड़ती है उसी प्रकार जाग्रत्कालका सारा ज्ञान अभ्रान्ति- सा ही जान पड़ता है ॥ १५६ उ०-१५७ पू० ॥ किन्तु जिस प्रकार शुक्तिका परिचय हो जानेपर उसमें अध्यस्त चाँदीकी प्रतीति भ्रमरूप जान पड़ती है, उसी प्रकार चेतन आत्माका ज्ञान होनेपर अन्य सभी ज्ञान भ्रमरूप निश्चय होते हैं ॥ १५७ उ०-१५८ पू० ॥ जिस प्रकार आकाशकी नीलताका भ्रम सबको समानरूपसे भासता है उसी प्रकार अविद्यारूप दोषके कारण जाग्रत्कालका भ्रम सभीको समानरूपसे हो रहा है । अभ्रान्ति तो शुद्ध विज्ञान ही है जो चेतन आत्मारूपसे स्थित है ॥ १५८ उ०-१५६ ॥ परशुराम ! इस प्रकार तुम्हारे प्रश्नके विषयमें मैंने युक्तिपूर्वक उत्तर दे दिया । तुम इस विषयमें सन्देह त्यागकर जैसा कहा गया है वैसा ही निश्चय करो ॥ १६० ॥ तुमने पहले ( पन्द्रहवें अध्यायके आरम्भमें ) पूछा था कि मुक्ति हो जानेपर भी व्यवहार कैसे होता है ! उसका उत्तर देता हूँ ! परशुराम ! खूब सावधान होकर सुनो ॥ १६१ ॥
२८६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मुक्ता हि ज्ञानिनो लोके ह्युत्तमाधममध्यमाः । प्रारब्धोपनतैर्भोगैः खिद्यमानाः क्षणे क्षणे ॥ १६२ ॥ स्वरूपज्ञास्तु ये राम ते मन्दज्ञानिनः स्मृताः । ये तु प्रारब्धसंप्राप्तान् भुञ्जाना अपि नो विदुः ॥ १६३ ॥ मधुक्षीवा रसमिव मध्यास्ते ज्ञानिनः स्मृताः । ये तु प्रारब्धकोटीनां फलैरपि विचित्रितैः ॥ १६४ ॥ न स्वस्थितेः प्रच्यवन्ते नोद्विजन्त्यापदां गणैः । न विस्मयन्ति चाश्चर्यैर्न हृष्यन्ति महासुखैः ॥ १६५ ॥ अन्तःशान्ता वहिर्लोकसमास्ते ज्ञानिषूत्तमाः । एवं बुद्धिविभेदेन ज्ञानपाकविभेदतः ॥ १६६ ॥ प्रारब्धशेषमाहात्म्याद्व्यवहारा विचित्रिताः । मधुमत्तादिवच्चैषां व्यवहारोऽपि सम्भवेत् ॥ १६७ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अष्टादशोऽध्यायः ।
लोकमें मुक्त हुए ज्ञानी पुरुष तीन प्रकारके हैं—उत्तम, अधम और मध्यम। जो लोग प्रारब्धवश प्राप्त हुए भोगोंसे क्षण-क्षणमें खिन्न होते रहते हैं, किन्तु जिन्हें स्वरूपका ज्ञान होता है, वे मन्द ज्ञानी माने जाते हैं ॥ १६२-१६३ पू० ॥ जिन्हें प्रारब्धसे प्राप्त हुए भोगोंको भोगते हुए भी, मदिरोन्मत्तके समान निरन्तर समाहित रहनेके कारण, उन भोगोंका कुछ पता नहीं चलता, वे मध्यम ज्ञानी माने गये हैं ॥ १६३ उ०-१६४ पू० ॥ किन्तु जो करोड़ों प्रारब्धोंके तरह-तरहके फल-भोग प्राप्त होनेपर भी अपनी स्वरूपस्थितिसे च्युत नहीं होते, अनेकों आपत्तियाँ आने- पर भी खिन्न नहीं होते, बड़े-बड़े आश्चर्योंसे भी जिन्हें विस्मय नहीं होता और महान् सुखोंकी प्राप्ति होनेपर भी हर्ष नहीं होता, इस प्रकार जो भीतरसे शान्त और ऊपरसे अन्य लोगोंके समान रहते हैं, वे ज्ञानियोंमें उत्तम माने गये हैं ॥ १६४ उ०-१६६ पू० ॥ इस प्रकार बुद्धिके भेदसे, ज्ञानकी परिपक्वताके भेदसे और शेष प्रारब्धके प्रभावसे ज्ञानियोंके व्यवहार भिन्न-भिन्न प्रकारके होते हैं। तथापि मदोन्मत्तादिके समान उनके द्वारा व्यवहार भी अवश्य हो सकता है ॥ १६६ उ०-१६७ ॥ अष्टादश अध्याय समाप्त।
एकोनविंशोऽध्यायः इति दत्तात्रेयमुखाच्छ्रुत्वा भार्गवनन्दनः । भूयः पप्रच्छ मुक्तानां व्यवहारक्रमं क्रमात् ॥ १ ॥ भगवन् भूय एतन्मे विस्तरेण निरूपय । यथा बुद्धिविभेदेन ज्ञानपाकविचित्रता ॥ २ ॥ ज्ञानन्त्वेकविधं स्वात्ममात्रभानात्मकं ननु । उपेयञ्च तदेव स्याद्यन्मोक्षस्तत्प्रथात्मकः ॥ ३ ॥ तत् कथं बुद्धिभेदेन पाकभेदसमाश्रयम् । साधनान्यपि भिद्यन्तेऽथवा नेति तदीरय ॥ ४ ॥ इति पृष्टः पुनस्तेन दत्तात्रेयो दयानिधिः । विस्तरेण तमेवार्थं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ ५ ॥ एकोनविंश अध्याय ॥ १९ ॥ ज्ञानियोंकी स्थितियोंके भेद श्रीदत्तात्रेयजीके मुखसे यह सब सुनकर भृगुनन्दन परशुरामने उनसे क्रमशः मुक्तपुरुषोंकी व्यवहारपद्धतिके विषयमें पुनः प्रश्न किया ॥ १ ॥ भगवन् ! आप कृपा करके यह बात मुझे विस्तारपूर्वक फिर समझाइये कि बुद्धिभेदके कारण ज्ञानियोंके ज्ञानकी परिपक्वतामें कैसे अन्तर रह जाता है ॥ २ ॥ यह तो निश्चय है कि केवल अपने आत्माका भानरूप ज्ञान तो सबको एक-सा ही होता है। तथा उस ज्ञानकी स्थितिरूप जो मोक्ष है वही सबका लक्ष्य भी है ॥ ३ ॥ फिर बुद्धिभेदके कारण उसकी परिपक्वतामें रहनेवाला अन्तर क्यों ? क्या उनके साधनोंमें भी कोई भेद रहता है या नहीं—यह सब बताइये ॥ ४ ॥ उनके इस प्रकार पूछनेपर दयानिधि भगवान् दत्तात्रेयने उसी बातको पुनः विस्तारपूर्वक कहना आरम्भ किया ॥ ५ ॥
२८८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे शृणु राम प्रवक्ष्यामि रहस्यं ह्येतदुत्तमम् । साधने न विभेदोऽस्ति ज्ञानं न चित्रसाधनम् ॥ ६ ॥ तारतम्यात् साधनानां फलप्राप्तिर्विभेदिता । पूर्णे तु साधने ज्ञानमनायासेन सिद्ध्यति ॥ ७ ॥ अपूर्चितारतम्येन त्वयासापेक्षणाद्भवेत् । वस्तुतः साधनं किञ्चिज्ज्ञानेनैवोपयुज्यते ॥ ८ ॥ ज्ञानं क्वचिन्नैव साध्यं सिद्धत्वात्तु स्वभावतः । चैतन्यमेव विज्ञानं तत् सदा स्वप्रकाशकम् ॥ ९ ॥ तत्र का साधनापेक्षा नित्याभानस्वरूपके । चैतन्यं निहितं चित्तकरण्डेऽतिसुनिर्मले ॥ १० ॥ अनन्तवासनापङ्कमग्नं नैवोपलक्ष्यते । निरोधसलिलैः सम्यग् वासनापङ्कमार्जने ॥ ११ ॥ परशुराम ! सुनो, मैं यह उत्तम रहस्य तुम्हें सुनाता हूँ । ज्ञानके साधनोंमें कोई भेद नहीं रहता । ज्ञान विभिन्न साधनोंवाला नहीं है ॥ ६ ॥ किन्तु साधनोंकी न्यूनाधिकता रहनेके कारण उनकी फलप्राप्तिमें अन्तर रहता है । साधन की पूर्णता होनेपर तो सहजहीमें ज्ञान प्राप्त हो जाता है । और अपूर्णता रहनेपर उसकी न्यूनाधिकताके अनुसार प्रयास करनेकी आवश्यकता पड़ती है ॥ ७-८ पू० ॥ वास्तवमें तो ज्ञानप्राप्तिके लिये साधनकी कोई आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि ज्ञान स्वभावसे ही सिद्ध होनेके कारण किसी साधनसे प्राप्त होनेवाला नहीं है ॥ ८ उ०-९ पू० ॥ चैतन्य ही तो ज्ञान है और वह सदा ही स्वयंप्रकाश है । अतः उस नित्यप्रकाशस्वरूपकी उपलब्धिके लिये साधनकी क्या आवश्यकता है ? ॥ ९ उ०-१० पू० ॥ यह चैतन्य चित्तरूप स्फटिकमणिकी अत्यन्त स्वच्छ पिटारीमें रखा हुआ है । किन्तु अनन्तवासनाओंकी कीचड़में फँसा होनेके कारण दिखायी नहीं देवा ॥ १० उ०-११ पू० ॥ अतः चित्तनिरोधरूप जलसे उस वासनाओंके कीचड़को धोना
एकोनविंशोऽध्यायः । २८६ विचारशितयन्त्रेण यत्नाच्चित्तकरण्डके । चिरात् संघटिते राम सुयुक्त्योद्घाटिते ततः ॥ १२ ॥ भासमानं तु मणिवच्चैतन्यमुपलभ्यते । राम तस्माद् वासनानां निरासे साधनं स्मृतम् ॥ १३ ॥ वासनाल्प्याधिक्यभावाद् बुद्धिस्तु विविधा भवेत् । यस्य यावद् वासनौघो बुद्धिमाच्छाद्य संस्थितः ॥ १४ ॥ साधनापेक्षं तस्य तावदेव भृगूद्वह । वासना विविधाः प्रोक्तास्तत्र मुख्या वदामि ते ॥ १५ ॥ अपराधकर्मकामभेदेन त्रिविधा हि सा । अश्रद्धैवापराधः स्यान्मुख्यः स्वात्मविनाशनः ॥ १६ ॥ विपरीतग्रहश्चापि ह्यपराधस्तु पौरुषः । प्रायः कलासु कुशला अपराधवशन्ननु ॥ १७ ॥ सत्सङ्गशास्त्रयोगैश्च परं तत्त्वं हि नो विदुः । पड़ता है । यह चित्तपेटिका बहुत दिनोंसे बन्द पड़ी हुई है । इसे विचाररूप तीक्ष्ण यन्त्रके द्वारा बड़ी युक्तिसे खोलना पड़ता है । तब वह चैतन्य मणिके समान दमकता हुआ दिखायी देने लगता है । इस प्रकार परशुरामजी ! साधनका उपयोग तो वासनाओंकी निवृत्तिमें ही माना गया है ॥ ११ उ०-१३ ॥ वासनाओंकी न्यूनता और अधिकताके कारण बुद्धि अनेक प्रकारकी होती है । जिसकी बुद्धिको जितने वासनाजालने ढक रखा है, परशुराम ! उसको उतने ही साधनकी अपेक्षा होती है ॥ १४-१५ पू० ॥ वासनाएँ अनेक प्रकारकी कही गयी हैं । उनमेंसे मुख्य तुम्हें बताता हूँ । वे अपराधवासना, कर्मवासना और कामवासना भेदसे तीन प्रकारकी हैं ॥ १५ उ०-१६ पू० ॥ वेद-शास्त्रादिमें श्रद्धा न होना ही अपना नाश करनेवाला मुख्य अपराध है ; तथा पुरुष (आत्मा) सम्बन्धी विपरीत धारणा होनी दूसरा अपराध है ॥ १६ उ०-१७ पू० ॥ प्रायः जो लोग अनेक कलाओंमें कुशल हैं वे भी इन अपराधोंके कारण संतसमागम और शास्त्रावलोकनके अवसर प्राप्त होनेपर भी उस परमतत्त्वको नहीं जान पाते ॥ १७ उ०-१८ पू० ॥
२६० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे निर्विशेषं परं तत्त्वं नास्ति नैव च सम्भवेत् ॥ १८ ॥ अस्ति तच्चैव विज्ञातुं शक्यते केनचित् क्वचित् । ज्ञात्वापि परमं तत्त्वं नैव तत्त्वं परं भवेत् ॥ १९ ॥ एतज्ज्ञानात् कथं मोक्ष इत्यादि बहुधा स्थितः । विपरीतग्रहो वापि चैतत्संशय एव वा ॥ २० ॥ अपराधः पौरुषस्तु वासनाद्या प्रकीर्त्तिता । शास्त्रविद्यासु कुशलाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २१ ॥ अनया विहता राम संसृतिं समुपागताः । पुरा दुष्कृतसंस्कारवशाद् बुद्धौ तु यत् स्थितम् ॥ २२ ॥ मालिन्यमुपदेशस्य ग्रहणप्रतिबन्धकम् । येनाचार्यैः सम्यगुक्तमपि नो गृह्यते खलु ॥ २३ ॥ सा कर्मवासना प्रोक्ता दुर्जेयापि निरोधतः । कामः कर्त्तव्यशेषः स्यादनन्तो बहुशाखकः ॥ २४ ॥ [ उनकी ऐसी धारणा रहती है—] 'कोई निर्विशेष परमतत्त्व है ही नहीं और न उसका होना सम्भव ही है। यदि वह हो भी तो किसीको उसका कभी ज्ञान नहीं हो सकता। यदि कोई जान भी ले तो सन्देह होने लगता है कि यह परमतत्त्व होना सम्भव नहीं है; इसके ज्ञानसे मोक्ष कैसे हो सकता है ?' इस प्रकार विपरीत ग्रह अनेक प्रकारसे रहता है। अथवा इसीको संशय भी कह सकते हैं ॥ १८ उ०-२० ॥ यह पुरुषसम्बन्धी अपराध पहली वासना कही गयी है। परशुराम ! इसके मारे हुए सैकड़ों-हजारों शास्त्रविद्यामें कुशल पुरुष भी संसार- चक्रमें पड़े रहते हैं ॥ २१-२२ पू० ॥ पूर्व दुष्कर्मोंके संस्कारोंके कारण बुद्धिमें जो मलिनता आ जाती है वह उपदेशको ग्रहण करने में रुकावट डालनेवाली होती है, जिसके कारण गुरुदेवके द्वारा बहुत समझानेपर भी बात समझमें नहीं आती। उसको 'कर्मवासना' कहा है। इसे चित्तनिरोधके द्वारा भी जीतना कठिन है ॥ २२ उ०-२४ पू० ॥ 'मेरा यह कर्त्तव्य है' इत्यादि प्रकारसे कर्त्तव्यशेष रहनेका संकल्प 'कामवासना' है। यह अनन्त और अनेकों शाखाओंवाली है।
एकोनविंशोऽध्यायः । २६१ रामाम्भोधौ तरङ्गाणां संख्यां कुर्याद्धि कश्चन । पार्थिवानाम्णूनां वा तथा तारागणस्य वा ॥ २५ ॥ एकस्यापि हि कामानां संख्यातुं नैव शक्यते । इयं राम तृतीया ते संप्रोक्ता कामवासना ॥ २६ ॥ आकाशादपि विस्तीर्णा ह्यचला भूधरादपि । आशापिशाची प्रोक्तेयं राम या कामवासना ॥ २७ ॥ अनयैव हि सर्वोऽयं लोक उन्मत्तवत् स्थितः । येन दन्दह्यमानोऽयं लोक आक्रन्दते तदा ॥ २८ ॥ केऽपि लोके धन्यतमा महामन्त्रसमाश्रयात् । विनिर्मुक्तास्तया भान्ति नराः सर्वाङ्गशीतलाः ॥ २९ ॥ एताभिस्तिसृभी राम वासनाभिर्यतो मनः । समाक्रान्तमतो नूनं तत्तत्त्वं नावभासते ॥ ३० ॥ अतः सर्वसाधनस्य वासनानाशनं फलम् । परशुराम ! कोई पुरुष समुद्रकी तरंगोंकी गणना तो कर सकता है, पृथ्वीके कणोंको भी गिन सकता है और तारागणकी गिनती भी कर सकता है; किन्तु किसी एक पुरुषकी भी कामनाओंको गिनना सम्भव नहीं है । परशुराम ! यह तुमसे तीसरी कामवासनाका वर्णन किया ॥ २४ उ०--२६ ॥ परशुराम ! यह कामवासना ही आशापिशाची भी कही जाती है । यह आकाशसे भी विस्तीर्ण और पर्वतसे भी अधिक अविचल है ॥२७॥ इसीके कारण यह सारा लोक उन्मत्त-सा हो रहा है और इसीसे दग्ध होकर यह सर्वदा चीत्कार करता रहता है ॥ २८ ॥ इस संसारमें कोई अत्यन्त बड़भागी पुरुष ही परवैराग्यरूप महामन्त्रका आश्रय लेकर इससे मुक्त होते हैं और फिर सर्वाङ्ग शीतल होकर सुशोभित होते हैं ॥ २९ ॥ परशुराम ! क्योंकि मन इन तीन वासनाओंसे आक्रान्त है, इसीसे इसे वह परमतत्त्व प्रकाशित नहीं होता ॥ ३० ॥ अतः सब साधनोंका फल वासनाओंका नाश ही है। इनमें
२६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्राद्या ह्यपराधत्वनिश्चयाद्विनिवर्त्तते ॥ ३१ ॥ द्वितीया जन्मनैकेन निवर्त्तेतापि जन्मभिः । ऐश्वरेण प्रसादेन नान्यथा कोटियुक्तिभिः ॥ ३२ ॥ तृतीया विनिवर्त्तेत वैराग्यादिसुसाधनैः । दोषदृष्ट्यैव वैराग्यं भवेन्नैवाऽन्यथा क्वचित् ॥ ३३ ॥ प्रोक्तानां वासनानां वै स्वल्पानल्पविभेदतः । तस्याश्चाल्पानल्पभावापेक्षा भवति भार्गव ॥ ३४ ॥ तत्राद्यं सर्वमूलं स्यान्मुमुक्षुत्वं न चेतरत् । मुमुक्षामन्तरा यत्तु श्रवणं मननादिकम् ॥ ३५ ॥ न मुख्यफलसंयुक्तं केवलं शिल्पवद्भवेत् । न शिल्पज्ञानमात्रेण प्राप्यते परमं पदम् ॥ ३६ ॥ मुमुक्षामन्तरा यैस्तु श्रुतं सम्यग् विचारितम् । शवालङ्कारवत् सर्वं तेषां व्यर्थं भवेत् खलु ॥ ३७ ॥ पहली अपराधवासना तो अश्रद्धा आदिमें अपराधत्वका निश्चय होनेसे निवृत्त होती है ॥ ३१ ॥ दूसरी कर्मवासना एक या अनेक जन्मोंमें केवल ईश्वरकी कृपासे ही छूट सकती है, और तो करोड़ों युक्तियोंसे भी नहीं छूट सकती ॥३२॥ तीसरी कामवासना वैराग्यादि साधनोंसे दूर हो सकती है। वैराग्य विषयोंमें दोषदृष्टि होनेपर ही होता है, और किसी प्रकार नहीं ॥ ३३ ॥ परशुराम ! उपर्युक्त वासनाओंकी अल्पता अथवा अधिकताके भेदके अनुसार उनकी निवृत्तिके लिये भी अल्प या अधिक भावकी अपेक्षा होती है ॥ ३४ ॥ इनमें भी सबका मूल और आदि कारण मुमुक्षुता है, कोई और नहीं। मुमुक्षुताके बिना जो श्रवण-मनन इत्यादि होते हैं उनसे मुख्य फल तत्त्वज्ञान नहीं मिलता, वे केवल कलामात्र रह जाते हैं और केवल कलामात्रका ज्ञान होनेसे परमपदकी प्राप्ति हो नहीं सकती ॥ ३५-३६ ॥ मुमुक्षुताके बिना जिन्होंने जो कुछ भी श्रवण या मनन किया होता है वह तो केवल मुर्देके श्रृंगारके समान उनके लिये व्यर्थ ही होता है ॥ ३७ ॥
एकोनविंशोऽध्यायः। २६३ व्यर्था सापि भवेन्मन्दा मुमुक्षा राम सर्वथा । यथा फलश्रुतेरिच्छा सामान्या न फलावहा ॥ ३८ ॥ फलश्रुत्युत्तरोद्भूता नेच्छा कर्मफलावहा । फलश्रुत्या कस्य नाम न स्यात् सा जीवधर्मिणः ॥ ३९ ॥ तस्मादापातरूपाया मुमुक्षाया न वै फलम् । यथा मुमुक्षा तीव्रा स्यात्तथा तस्याचिरं फलम् ॥ ४० ॥ मुमुक्षा या मुख्यतमा सा साधनगणेष्वलम् । प्रवृत्तिमुत्पादयेद्वै सा हि तत्परतोच्यते ॥ ४१ ॥ यथा सुदग्धसर्वाङ्गो न शीतान्यदपेक्षते । तथा यदा विमुक्त्यन्यन्नापेक्षेत हि सर्वथा ॥ ४२ ॥ सा मुमुक्षा भवेत्तीव्रा समर्था फलसाधने । एषा विमुक्तेरन्यत्र दोषदृष्ट्यैव जायते ॥ ४३ ॥ परशुराम ! वह मुमुक्षुता भी यदि मन्द हो तो सर्वथा व्यर्थ ही होती है, जिस प्रकार केवल फल सुनकर होनेवाली इच्छा सामान्य ही होती है, उससे फलकी प्राप्ति नहीं होती ॥ ३८ ॥ फल सुननेके पश्चात् उत्पन्न हुई इच्छा कर्मका फल देनेवाली नहीं होती। ऐसा कौन जीवधर्मी है जिसे फल सुनकर इच्छा उत्पन्न न हो ॥ ३६ ॥ इसलिये जो अकस्मात् (किसी कारणविशेषसे) उत्पन्न हो जाती है उस मुमुक्षुता का फल नहीं होता। मुमुक्षा जितनी तीव्र होगी उतना ही शीघ्र उसका फल प्राप्त होगा ॥ ४० ॥ जो तीव्रतम मुमुक्षा है वह तो अकेली ही सम्पूर्ण साधनोंमें प्रवृत्ति उत्पन्न कर देती है। उसीको तत्परता भी कहते हैं ॥ ४१ ॥ जिसके सब अंगोंमें अत्यन्त दाह हो रहा हो वह पुरुष जैसे शीतके सिवा किसी अन्य वस्तुकी इच्छा नहीं करता, उसी प्रकार जब मुक्तिके सिवा और किसी प्रकारकी इच्छा न रहे तब वह तीव्र मुमुक्षा होती है वही मुक्तिरूप फल प्राप्त करानेमें समर्थ है। ऐसी मुमुक्षा मुक्तिके सिवा और सभीमें दोषदृष्टि होनेपर ही उत्पन्न होती है ॥ ४२-४३ ॥
२६४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तीव्रवैराग्यमुखतः क्रमेण तीव्रतामियात् । दोषदृष्ट्या हि वैराग्यं विषयप्रीतिनाशनम् ॥ ४४ ॥ वैराग्येण मुमुक्षुत्वं तीव्रं तत्परतोदयम् । तत्परत्वं साधनेषु प्रवृत्तिरतितीव्रता ॥ ४५ ॥ अतितीव्रप्रवृत्त्यैव द्रुतं फलमवाप्नुयात् । इति दत्तात्रेयवचो निशम्य भार्गवः पुनः ॥ ४६ ॥ पप्रच्छ सन्दिग्धमनाः संशयं सुमहत्तरम् । भगवन् भवता प्रोक्तं सत्सङ्गो मूलकारणम् ॥ ४७ ॥ ईश्वरानुग्रहश्चापि दोषदृष्टिरपीति च । किमादिकारणं मुख्यं तत्प्राप्तिर्वा कथं भवेत् ॥ ४८ ॥ न हि निष्कारणं किञ्चिद्भवेदिति हि निश्चयः । तत् कथं स्याद्विना हेतोरेतन्मे वद विस्तरात् ॥ ४९ ॥ इति पृष्टः प्राह रामं दत्तात्रेयो दयानिधिः । तीव्र वैराग्यादिके क्रमसे मुमुक्षुतामें तीव्रता आती है । विषयों- में दोषदृष्टि होनेसे ही उनकी आसक्तिको नष्ट करनेवाला वैराग्य उत्पन्न होता है ॥ ४४ ॥ वैराग्यसे तत्परताकी प्राप्ति करानेवाली तीव्र मुमुक्षुता होती है । और साधनोंमें प्रवृत्त होनेकी अत्यन्त तीव्रता ही तत्परता है तथा अत्यन्त तीव्र प्रवृत्ति होनेपर ही फलकी शीघ्र प्राप्ति होती ॥४५-४६ पू०॥ श्रीदत्तात्रेयजीके ये वचन सुनकर परशुरामजीके मनमें सन्देह हो गया । अतः उन्होंने पुनः यह महान् संशय प्रकट करते हुए पूछा—॥ ४६ उ०-४७ पू० ॥ "भगवन् ! पहले आपने सत्संगको ही मूलकारण बतलाया था । फिर ईश्वरकी कृपा और विषयोंमें दोषदृष्टिका भी वर्णन किया । इनमें मुख्य और आदि कारण कौन-सा है और उसकी प्राप्ति भी कैसे होती है, क्योंकि यह तो निश्चय है कि कोई भी बात अकारण ही नहीं होती; फिर वह (मुक्तिका मूलकारण) ही बिना किसी निमित्तके कैसे हो जायगा ? अतः आप उसका विस्तारसे वर्णन कीजिये" ॥ ४७ उ०-४९ ॥ ऐसा प्रश्न होनेपर दयानिधि दत्तात्रेयजी परशुरामसे कहने
एकोनविंशोऽध्यायः । २६५ भार्गव शृणु ते वक्ष्ये श्रेयसः परमोद्भवम् ॥ ५० ॥ परा सा या चितिर्देवी स्वस्वातन्त्र्यस्य वैभवात् । स्वात्मन्येव जगच्चित्रं दर्पणप्रतिबिम्बवत् ॥ ५१ ॥ सैव हैरण्यगर्भाख्यां तनुमास्थाय वै परा । अनाद्यज्ञानसञ्छन्नजीवानां हितकाम्यया ॥ ५२ ॥ उन्मेषयदागमाब्धिं सर्वकामप्रपूरणम् । तत्र जीवाः स्वभावेन विचित्रकामवासनाः ॥ ५३ ॥ कथं तेषां शुभं भूयादेवं चिन्तापरायणः । असृजत् काम्यकर्माणि फलचित्राणि सर्वशः ॥ ५४ ॥ सदसद्वापि हि जनः करोत्येव स्वभावतः । तथा च केनापि कर्मपरिपाकवशेन तु ॥ ५५ ॥ भ्रमन् योनिविभेदेषु मानुष्यमुपसङ्गतः । कामनावशतः काम्ये कर्मण्यभिमुखो भवेत् ॥ ५६ ॥ लगे—"भृगुनन्दन ! सुनो, मैं तुम्हें निःश्रेयसका प्रधान साधन बतलाता हूँ ॥ ५० ॥ जो पराचितिदेवी अपने स्वातन्त्र्यके प्रभावसे दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान अपनेमें ही इस जगत्रूप चित्रको भासित कर देती है उसीने हिरण्यगर्भसंज्ञक शरीर धारण कर अनादि अज्ञानसे आवृत जीवोंके हितकी कामनासे सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले आगम- शास्त्ररूप समुद्रको प्रकट किया ॥ ५१-५३ पू० ॥ संसारमें जीव तो स्वभावसे ही अनेकों प्रकारकी कामना एवं वासनाओंवाले हैं। अतः उनका किस प्रकार शुभ हो—ऐसा चिन्तन करते हुए उसने अनेक फल देनेवाले सम्पूर्ण काम्य कर्मों की रचना की ॥ ५३ उ०-५४ ॥ मनुष्य स्वभावसे ही शुभ या अशुभ कर्म तो करता ही रहता है। तथा अनेकों योनियोंमें भटकता हुआ किसी कार्यविशेषके फलोन्मुख होनेपर मनुष्य-शरीर प्राप्त करता है। तब कामनाओंके अधीन होकर वह काम्य कर्मोंकी ओर प्रवृत्त होता है ॥ ५५-५६ ॥
२६६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे कामनाया विशेषेण यदीश्वरपरो भवेत् । तदैश्वराणि शास्त्राणि प्रसङ्गादवलोकयेत् ॥ ५७ ॥ काम्यकर्मफलश्रुत्या प्रवृत्तः काम्यकर्मणि । विहतस्तत्फलाप्राप्त्या वैगुण्यात् सूक्ष्मकर्मणः ॥ ५८ ॥ कर्त्तव्यजिज्ञासयैव कश्चित् स पुरुषं व्रजेत् । तत्प्रसङ्गवशात् क्वापि माहात्म्यं शृणुयात् क्वचित् ॥ ५९ ॥ महेश्वरस्य च ततः प्राक्पुण्यपरिपाकतः । तस्य प्रसादने भूयात् प्रवृत्तिरपि भार्गव ॥ ६० ॥ तस्मात् प्राक्पुण्यपाकेन सत्सङ्गमभिगम्य तु । प्राप्नोति श्रेयःसोपानपंक्तिमत्यन्तदुर्लभाम् ॥ ६१ ॥ प्रायः सत्सङ्गमूलैव श्रेयःप्राप्तिरुदीरिता । क्वचिदुत्कृष्टपुण्येन चोत्कृष्टतपसापि वा ॥ ६२ ॥ [ मेरी कामनापूर्तिमें विघ्न न हो—ऐसी ] विशेष कामनासे ही जब वह ईश्वरपरायण होता है, तब प्रसंगवश उसे ईश्वरसम्बन्धी शास्त्र देखने पड़ते हैं ॥ ५७ ॥ काम्य कर्मोंके फल सुनकर वह काम्य कर्मोंमें प्रवृत्त होता है। किन्तु किसी कर्मांगमें त्रुटि आजानेके कारण जब उसकी फलप्राप्तिमें विघ्न पड़ता है तो अपना कर्त्तव्य जाननेकी इच्छासे वह किसी सत्पुरुषके पास जाता है ॥ ५८-५६ पू० ॥ उसी प्रसंगसे कभी अपना पूर्व पुण्य उदय होनेपर वह उन महा- पुरुषके मुखसे भगवान् महेश्वरका माहात्म्य श्रवण करता है। और परशुरामजी ! उन महेश्वरकी कृपासे ही माहात्म्य-वर्णनमें उन महा- पुरुषकी प्रवृत्ति भी होती है ॥ ५६ उ०--६० ॥ अतः पूर्व पुण्योंका उदय होनेपर ही वह सत्संगमें जाकर निःश्रेयस ( मुक्तिपद ) की अत्यन्त दुर्लभ सोपानपरम्परा ( सीढ़ी अर्थात् साधन- पद्धति ) प्राप्त करता है ॥ ६१ ॥ इस प्रकार निःश्रेयसप्राप्तिका मूलकारण प्रायः सत्संग ही कहा गया है। कभी महान् पुण्य अथवा उत्तम तपके द्वारा आकाशसे
४. अध्याय १७-२२: अद्वैत-स्थिति, परा-संवित् उपासना एवं ज्ञानखण्ड उपसंहार
एकोनविंशोऽध्यायः । २४७ श्रेयः प्राप्नोति सहसा ह्याकाशफलपातवत् । तस्मात् कारणवैचित्र्याच्छ्रेयःप्राप्तिर्विचित्रता ॥ ६३ ॥ तथा च बुद्धिभेदेन वासनातारतम्यतः । साधनानां तारतम्याद्विचित्रा ज्ञानिनां स्थितिः ॥ ६४ ॥ स्वभावाद्यस्य वै बुद्धेर्वासना विरला भवेत् । तस्याल्पसाधनेनैव ज्ञानसिद्धिर्भवेदलम् ॥ ६५ ॥ यस्य स्वभावात् संशुद्धं वासना न हि लेशतः । तस्य स्वल्पनिमित्तेन भवेज्ज्ञानं महत्तरम् ॥ ६६ ॥ यस्य स्वभावादत्यन्तवासनानिबिडं मनः । तस्य ज्ञानं जातमपि समाच्छादितकल्पकम् ॥ ६७ ॥ तेनैव साधितं भूयश्चिरादभ्येति पूर्णताम् । अत एव ज्ञानिनां तु दृश्यते त्रिविधा स्थितिः ॥ ६८ ॥ चित्तपाकविभेदेन स्थितिभेदो भृगूद्वह । गिरे हुए फलके समान अकस्मात् भी परमपदकी प्राप्ति हो जाती है ॥ ६२-६३ पू० ॥ अतः कारणोंकी विभिन्नता होनेसे निःश्रेयसकी प्राप्तिमें भी भेद रहता है। इसी प्रकार बुद्धियोंके भेद, वासनाओंकी न्यूनाधिकता और साधनोंके तारतम्यसे भी ज्ञानियोंकी स्थिति अनेक प्रकारकी होती है ॥ ६३ उ०--६४ ॥ जिसकी बुद्धिमें स्वभावसे ही वासनाओंकी कमी होती है उसे थोड़े-से साधनसे ही पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाता है ॥ ६५ ॥ जिसका मन स्वभावसे ही शुद्ध है और लेशमात्र भी वासना नहीं है, उसे किसी थोड़े-से निमित्तसे ही महान् ज्ञान हो जाता है ॥६६॥ जिसका मन स्वभावसे ही वासनाओंसे अत्यन्त भरपूर है उसे ज्ञान हो भी जाय तो भी ढका-सा रहता है ॥ ६७ ॥ वही जब बहुत साधन करता है तो बहुत काल व्यतीत होनेपर उसका ज्ञान पूर्ण होता है। इसीसे ज्ञानियोंकी अनेक प्रकारकी स्थिति देखी जाती है ॥ ६८ ॥ भृगुनन्दन ! यह स्थितिका भेद चित्तशुद्धिका भेद रहनेके कारण
२६८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तस्माद् बुद्धौ वासनाभिस्त्वावृत्तेस्तारतम्यतः ॥ ६९ ॥ ज्ञानं भिन्नं लक्ष्यते हि स्थितिभेदस्तथा भवेत् । राम पश्य स्थितेर्भेदं ज्ञानिनां तु परस्परम् ॥ ७० ॥ ब्रह्मविष्णुमहेशानां स्वभावज्ञानिनस्तु ते । तेषां पश्य स्थितेर्भेदं स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ ७१ ॥ नैषां ज्ञानस्य मालिन्यं वक्तुं शक्यं कथञ्चन । स्वभावगुणमाहात्म्यं भिन्नमेव तथापि हि ॥ ७२ ॥ यथा ज्ञानिशरीरं तु गौरं न श्यामतां व्रजेत् । एवं चित्तस्वभावोऽपि नान्यभावं प्रपद्यते ॥ ७३ ॥ अस्मान् राम तथा पश्य ज्ञानिनोऽत्रिसुतान् स्थितान् । दुर्वाससं चन्द्रमसं माञ्च भिन्नस्थितिं गतम् ॥ ७४ ॥ क्रोधिनं कामिनं त्यक्तसर्वलिङ्गपरिग्रहम् । होता है। अतः वासनाओंके कारण बुद्धिमें आवरणकी न्यूनाधिकता रहनेके कारण भिन्न-भिन्न कोटिका ज्ञान देखा जाता है और इसीसे स्थितिमें भी भेद रहता है ॥ ६९-७० पू० ॥ परशुराम ! तुम ज्ञानियोंकी पारस्परिक स्थितियोंका भेद तो देखो—ब्रह्मा, विष्णु और महादेव ये तीनों स्वभावसे ही ज्ञानी हैं; किन्तु देखो, अपने स्वभावसिद्ध गुणोंके कारण उनकी स्थितियोंमें कितना भेद है ॥ ७० उ०-७१ ॥ इनके ज्ञानमें किसी भी प्रकार मलिनता तो बतायी नहीं जा सकती। तथापि स्वाभाविक गुणोंका प्रभाव तो अलग ही होता है ॥ ७२ ॥ जिस प्रकार किसी ज्ञानीका गोरा शरीर साँवला नहीं हो सकता इसी प्रकार उसके चित्तका स्वभाव भी नहीं बदल सकता ॥ ७३ ॥ परशुराम ! तुम हम ही को देखो। महर्षि अत्रिके हम तीनों पुत्र ज्ञानी हैं। किन्तु दुर्वासा, चन्द्रमा और मेरी स्थितियोंमें बड़ा अन्तर है ॥ ७४ ॥ दुर्वासा क्रोधी है, चन्द्रमा कामी है और मैं सब प्रकारके लिंग
एकोनविंशोऽध्यायः। २६६ वसिष्ठं पश्य कर्मिष्ठं सनकादींश्च न्यासिनः ॥ ७५ ॥ नारदं भक्तिसंमग्नं कवयन्तञ्च भार्गवम् । दैत्यपक्षसंश्रयिणं गुरुं देवसमाश्रयम् ॥ ७६ ॥ वाग्मिनञ्च व्यासमपि शास्त्रनिर्माणतत्परम् । जनकं पश्य राजानं भरतं त्यागिनं तथा ॥ ७७ ॥ भिन्नस्थितीन् स्वभावेन ज्ञानिनः पश्य चापरान् । रहस्यं ते प्रवक्ष्यामि शृणु भार्गवनन्दन ॥ ७८ ॥ विविधा या वासनोक्ता द्वितीया तत्र या भवेत् । कर्मजा मूढतारूपा सा सर्वेभ्यो महत्तरा ॥ ७९ ॥ येषां तल्लेशकश्चित्ते नास्ति मेधाविनस्तु ते । अपराधविहीनानां तेषां कामादिवासनाः ॥ ८० ॥ अभ्यासेनाविलीनाश्च ज्ञानस्याप्रतिबन्धिकाः । और संगका त्याग किये हुए हूँ। वसिष्ठको देखो, वे बड़े कर्मकाण्डी और सनकादिक संन्यासी हैं ॥ ७५ ॥ नारदजी भक्तिभावमें लीन रहते हैं, शुक्राचार्य दैत्योंका पक्ष लेकर कविता करनेमें लगे रहते हैं और वृहस्पतिजी देवताओंका पक्ष लेने वाले हैं ॥ ७६ ॥ व्यासजी बड़े वादकुशल हैं और शास्त्ररचनामें तत्पर रहते हैं। जनकको देखो, वे राजा हैं और भरत राज्यका त्याग करनेवाले हैं ॥७७॥ इसी प्रकार तुम और भी अनेकों भिन्न स्थितिवाले ज्ञानियोंको देख सकते हो। भृगुनन्दन ! इसमें जो रहस्य है, वह मैं तुम्हें बताता हूँ, श्रवण करो ॥ ७८ ॥ मैंने ऊपर जो तीन प्रकारकी वासनाएँ बतलायी हैं उनमें दूसरी कर्मवासना, जिसका स्वरूप मूढ़ता ही है, सबसे बढ़कर है ॥ ७९ ॥ जिनके चित्तमें उसका लेशमात्र भी नहीं होता वे लोग बुद्धिमान् होते हैं। [ अपने निमित्त कर्मका अभाव होनेके कारण ] उनमें अपराधवासना भी नहीं होती। ऐसी स्थितिमें यदि अभ्यासके द्वारा उनकी कामवासना सर्वथा निवृत्त न भी हो तो भी वह ज्ञानकी प्रति- बन्धिका नहीं रहती ॥ ८०-८१ पू० ॥
३०० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे ततो वैराग्यादिकं तु न तेषामुपयुज्यते ॥ ८१ ॥ न वा भूयोऽपि मननं समाधिश्चोपयुज्यते । सकृच्छ्रवणमात्रेण मननं ध्यानमेव च ॥ ८२ ॥ तत्काल ईषत् संप्राप्य ज्ञातासन्दिग्धतत्पदाः । भवन्ति जीवन्मुक्तास्ते जनकप्रमुखा इव ॥ ८३ ॥ विपरीताभ्यासवशान्नैव तैः क्षपिताः खलु । कामादिवासनाः सम्यक् सूक्ष्मा निर्मलबुद्धिभिः ॥ ८४ ॥ अतस्तैस्तत्पदे ज्ञाते चापि पूर्वस्थितास्तु ताः । कामादिवासनाः प्राग्वत् प्रवर्त्तन्ते निरन्तरम् ॥ ८५ ॥ न ताभिरीषद्वा बुद्धेस्तेषां लेपो भवेत् क्वचित् । विद्वद्भिस्ते हि संप्रोक्ता मुक्ताश्च बहुमानसाः ॥ ८६ ॥ राम कर्मवासनाभिरतिमूढं तु यन्मनः । तस्य ज्ञानं नैव भवेच्छिवोदितमपि क्वचित् ॥ ८७ ॥ दृढापराधयुक्तानामपि न स्यात् कथञ्चन । फिर उन्हें वैराग्यादि साधनोंकी भी विशेष आवश्यकता नहीं रहती और न पुनः पुनः मनन या समाधिकी ही अपेक्षा रहती है। एकबार श्रवण करनेपर ही तत्काल उसका कुछ मनन और निदि- ध्यासन भी हो जाता है। और वे निःसन्देह होकर उस परमपदको जान लेते हैं तथा जनकादिकी तरह जीवन्मुक्त हो जाते हैं ॥ ८१ उ०-८३ ॥ उनकी बुद्धि बहुत सूक्ष्म और निर्मल रहती है, इसलिये अपनी कामादिवासनाओंको उन्होंने उनके विपरीत अभ्यास करके क्षीण नहीं किया ॥ ८४ ॥ इसलिये उस परमपदको जान लेनेपर भी वे पहले हीसे विद्यमान कामादि वासनाएं उसमें पहले हीकी तरह बराबर नहीं रहती हैं ॥८५॥ उनसे उसकी बुद्धि कभी लेशमात्र भी लिप्त नहीं होती। विद्वान् लोग उन्हें मुक्त और बहुमानस कहते हैं ॥ ८६ ॥ परशुराम ! जिनका मन कर्मवासनाके कारण अत्यन्त मूढ हो गया है उसे साक्षात् शंकरजी उपदेश करें तब भी कभी ज्ञान नहीं हो सकता। इसी प्रकार सुदृढ अपराध-वासनावालोंको भी कभी ज्ञान नहीं होता ॥ ८७-८८ पू० ॥
एकोनविंशोऽध्यायः । ३०१ यस्यापराधरूपापि कर्मरूपापि वासना ॥ ८८ ॥ स्वल्पा कामात्मकाश्चापि बहुलास्तस्य भार्गव । बहुलश्रवणैस्तद्वन्मननैश्च समाधिभिः ॥ ८९ ॥ चिरकालेन विज्ञानं बहुक्लेशेन जायते । तस्य व्यवहृतिः स्वल्पा तत्राभ्यासप्रकर्षतः ॥ ९० ॥ मनो यदि भवेन्नष्टप्रायं निर्वासनं ततः । ज्ञानिनस्त्वीदृशाः प्रोक्ता मध्यमा नष्टमानसाः ॥ ९१ ॥ तेषामेव तु केषाश्चिदभ्यासस्याप्रकर्षतः । वासनाविरलं यस्मादनष्टं मानसं भवेत् ॥ ९२ ॥ समनस्कास्तु ते प्रोक्ता मन्दज्ञानयुतास्तु वै । केवलज्ञानिनस्त्वेते जीवन्मुक्तास्तथेतरे ॥ ९३ ॥ केवलज्ञानिनो दृष्टदुःखाभाजो भवन्ति हि । प्रारब्धतन्त्रास्ते प्रोक्ता देहान्ते मुक्तिभागिनः ॥ ९४ ॥ ये नष्टमानसाः प्रोक्तास्तैः प्रारब्धं पराकृतम् । जिसमें अपराध और कर्मरूप वासनाएँ कम हैं किन्तु कामत्रासना अधिक है, परशुराम ! उसे बहुत श्रवण, मनन और समाधिका अभ्यास करनेपर चिरकालमें बड़ी कठिनतासे ज्ञान होता है ॥८८ उ०-६० पू०॥ उसका व्यवहार बहुत कम रहता है। अभ्यासकी अधिकता- से जब उसका मन नष्टप्राय हो जाता है, तो वह वासनाशून्य हो जाता है। ऐसे ज्ञानी मध्यम कोटिके होते हैं और 'नष्टमानस' कहलाते हैं ॥ ६० उ०-६१ ॥ उनमेंसे ही किन्हीं-किन्हींमें अभ्यासकी अधिकता न होनेके कारण कुछ वासनाएँ रह जाती हैं, क्योंकि उनका मन नष्ट नहीं होता ॥६२॥ वे 'समनस्क' कहे जाते हैं और मन्द ज्ञानवान् होते हैं। ये केवल ज्ञानी हैं, अन्य ( उत्तम और मध्यम कोटिके ) ज्ञानी जीवन्मुक्त होते हैं ॥ ६३ ॥ केवल ज्ञानियोंको दृष्ट दुःख भोगने पड़ते हैं। वे प्रारब्धके अधीन रहते हैं और उन्हें देह त्याग करनेपर मुक्ति मिलती है ॥ ६४ ॥ जो नष्टमनस ज्ञानी कहे गये हैं उन्होंने तो प्रारब्धको परास्त
३०२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मनोभूमौ तु प्रारब्धबीजं भोगाङ्कुरं भवेत् ॥ ९५ ॥ मनोभूमेरभावेन तत् प्रारब्धं तु कालतः । कुसूलस्थं बीजमिव विनश्येन्नष्टशक्तिकम् ॥ ९६ ॥ यथात्यन्तसुमेधावी युगपद्दश पञ्च च । कार्याणि कुरुते कापि भवेदस्खलितोऽपि च ॥ ९७ ॥ भूय एवंविधा दृष्टाः क्रियानैपुण्यसंश्रयाः । यथा गच्छन् वदन् कुर्वन् युगपलक्ष्यते जनः ॥ ९८ ॥ तत्र चैकेन मनसा कथं स्यात् त्रिविधा क्रिया । अध्येतॄणां बहूनाञ्च युगपल्लक्षयेद् गुरुः ॥ ९९ ॥ अपभ्रंशानुच्चरितं वर्णभेदव्यवस्थितम् । राम यस्ते हतः शत्रुरर्जुनो हैहयाधिपः ॥ १०० ॥ सहस्रबाहुर्युगपद् हेतिभिर्बहुभिः पृथक् । अयुध्यदस्खलन् कापि मेधावी दृष्ट एव ते ॥ १०१ ॥ कर दिया होता है। मनकी भूमिपर ही प्रारब्धरूप बीजसे भोगरूप अङ्कुर उत्पन्न होता है। किन्तु इनकी मनरूप भूमि रहती नहीं, इस- लिये इनका प्रारब्ध खत्तीमें भरे हुए बीजकी तरह कालक्रमसे शक्ति- हीन हो जानेके कारण नष्ट हो जाता है ॥ ६५-६६ ॥ [ अब बहुमानस ज्ञानियोंका वर्णन करते हैं—] जिस प्रकार कोई अत्यन्त बुद्धिमान् पुरुष एकसाथ दस-पाँच काम करता है और उनमें कोई त्रुटि भी नहीं आने देता, इसी प्रकार ज्ञानियोंमें भी क्रियाकौशल- से सम्पन्न ऐसे अनेकों महापुरुष देखे जाते हैं ॥ ६७-६८ पू० ॥ जिस प्रकार एक ही आदमी एकसाथ चलता, बोलता और हाथोंसे काम करता देखा जाता है। यहाँ एक ही मनसे एक साथ तीन कार्य कैसे हो सकते हैं ? ॥ ६८ उ०-६९ पू० ॥ अध्यापक वर्णभेदमें रहनेवाले विद्यार्थियोंके अशुद्ध उच्चारण और अनुच्चारण को एक-साथ ही देख लेता है ॥ ६६ उ०-१०० पू० ॥ परशुराम ! तुमने जिस हैहयराज सहस्रार्जुन नामके शत्रु का वध किया था वह अलग-अलग अनेकों शस्त्रोंसे एकसाथ ही युद्ध करता था और ऐसा बुद्धिमान् था कि इसमें कभी चूक नहीं पड़ती थी। यह सब तुमने देखा ही था ॥ १०० उ०-१०१ ॥
एकोनविंशोऽध्यायः । ३०३ तेषां मनो बहुविधं भूत्वा तत्तत्क्रमानुगम् । यथाकार्यं बहुविधं साधयेत्तद्गदेव हि ॥ १०२ ॥ उत्तमज्ञानिनामात्मदृष्टिर्वाह्यगतापि च । अविरुद्धा सर्वदा स्याद्येषां ते बहुमानसाः ॥ १०३ ॥ तत्प्रारब्धं मनोभूमौ भवेदङ्कुरितं पृथक् । भवेज्ज्ञानाग्निना दग्धं क्षतं भूतं पुनः पुनः ॥ १०४ ॥ प्रारब्धबीजाङ्कुरः स्यात् सुखदुःखसमागमः । तद्विमर्शः फलं प्रोक्तं कुतो दग्धाङ्कुरे फलम् ॥ १०५ ॥ आहृतेरनुसन्धानैस्तेषां व्यवहृतिर्भवेत् । यथा प्रौढो हि बालेन सह खेलन् हि दृश्यते ॥ १०६ ॥ हृष्टो विषण्णश्च शिलागजादीनां विनाशने । एवं हृष्यन्ति सीदन्ति कार्येषु बहुमानसाः ॥ १०७ ॥ यथाऽन्यकार्यसक्तस्य हर्षोद्वेगौ न चान्तरौ । इन सबका मन जैसे अनेकरूप होकर अनेक प्रकारके कार्योंको उन-उनके क्रमानुसार सम्पन्न करता है, वैसे ही जिन उत्तम ज्ञानियों- की आत्मदृष्टिमें बाहर जानेपर भी कभी कोई अन्तर नहीं पड़ता वे 'बहुमानस' कहलाते हैं ॥ १०२-१०३ ॥ उनका अलग-अलग प्रारब्ध जैसे-जैसे उनकी मनोभूमिमें अंकुरित होता है वैसे-वैसे ही वह पुनः पुनः ज्ञानाग्निसे दग्ध हो जाता है ॥१०४॥ प्रारब्धरूप बीजका अंकुर है सुख-दुःखकी प्राप्ति और उसका फल है सुख-दुःखपर विचार करना। किन्तु जब अंकुर ही जल गया तो फल कहाँ से होगा ? ॥ १०५ ॥ केवल स्वभावसिद्ध अनुसन्धानके द्वारा ही उनका व्यवहार चलता है। जैसे कोई-कोई प्रौढ पुरुष बच्चोंके साथ खेलते समय पत्थर- के हाथी आदि किसी खिलौनेके फूट जानेपर प्रसन्न या उदास होता देखा जाता है उसी प्रकार ये बहुमानस ज्ञानी भी व्यवहारमें हर्षित और दुःखित होते देखे जाते हैं ॥ १०६-१०७॥ जिस प्रकार किसी अन्य कार्यमें लगे हुए पुरुषको ऊपर हीसे
३०४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे एवं तेषां व्यवहृतौ समा सर्वत्र संस्थितिः ॥ १०८ ॥ मेधाविनां ज्ञानिनां तु वासनानाशहेतवे । विरुद्धवासनाभ्यासनिरोधादेरभावतः ॥ १०९॥ अनुवृत्तिर्भवेत् पूर्ववासनाऽनाशहेतुतः । अतः केचित् कर्मनिष्ठाः कामिनः क्रोधिनोऽपरे ॥ ११० ॥ उत्तमज्ञानिनो भान्ति विविधाचारतत्पराः । समनस्कस्तत्र यो वै मन्दज्ञानी निरूपितः ॥ १११ ॥ तेनापि वेद्यमखिलमसत्यत्वेन निश्चितम् । स्वरूपवित्तो नो किञ्चिद्भासते हि समाधिषु ॥ ११२ ॥ समाधिर्वै स्वरूपस्य विमर्शो नान्य उच्यते । निर्विकल्पस्वरूपं तु सर्वाश्रयतया सदा ॥ ११३ ॥ स्फुरत्येव हि सर्वेषां तदस्फूर्त्तौ न किञ्चन । हर्ष-शोक होते हैं, अन्तःकरणसे नहीं, उसी प्रकार तरह-तरहका व्यवहार करते समय भी उनकी स्थिति सर्वत्र समान होती है ॥ १०८ ॥ ये बुद्धिमान् ज्ञानी अपनी वासनाओंके नाशके लिये विरुद्ध वास- नाओंका अभ्यास अथवा मनोनिरोध आदि नहीं करते । अतः पूर्व- वासनाओंका नाश न होनेके कारण कभी-कभी उनमेंसे किसीकी अनुवृत्ति हो जाती है । इसीसे इन उत्तम ज्ञानियोंमेंसे कोई कर्मनिष्ठ, कोई कामी और कोई क्रोधी इस प्रकार तरह-तरहके आचरणवाले देखे जाते हैं ॥ १०६-१११ पू० ॥ ऊपर जिस समनस्क मन्द ज्ञानीका वर्णन किया उसने भी सम्पूर्ण दृश्यका असत्यत्व तो निश्चय कर लिया होता है तथा स्वरूपानुसन्धान और समाधिके समय उसे अन्य कुछ भासता भी नहीं है, [किन्तु अन्य अवस्थाओंमें उसे हर्ष-विषादादि हो जाते हैं ] ॥ १११ उ०-११२ ॥ वास्तवमें तो स्वरूपका अनुसन्धान ही समाधि कहा जाता है, और कुछ नहीं । एक निर्विकल्पस्वरूप आत्मा ही सर्वदा सबके आश्रयरूपसे स्फुरित हो रहा है । वह स्फुरित न हो तो कुछ भी