भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 318

३०४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे एवं तेषां व्यवहृतौ समा सर्वत्र संस्थितिः ॥ १०८ ॥ मेधाविनां ज्ञानिनां तु वासनानाशहेतवे । विरुद्धवासनाभ्यासनिरोधादेरभावतः ॥ १०९॥ अनुवृत्तिर्भवेत् पूर्ववासनाऽनाशहेतुतः । अतः केचित् कर्मनिष्ठाः कामिनः क्रोधिनोऽपरे ॥ ११० ॥ उत्तमज्ञानिनो भान्ति विविधाचारतत्पराः । समनस्कस्तत्र यो वै मन्दज्ञानी निरूपितः ॥ १११ ॥ तेनापि वेद्यमखिलमसत्यत्वेन निश्चितम् । स्वरूपवित्तो नो किञ्चिद्भासते हि समाधिषु ॥ ११२ ॥ समाधिर्वै स्वरूपस्य विमर्शो नान्य उच्यते । निर्विकल्पस्वरूपं तु सर्वाश्रयतया सदा ॥ ११३ ॥ स्फुरत्येव हि सर्वेषां तदस्फूर्त्तौ न किञ्चन । हर्ष-शोक होते हैं, अन्तःकरणसे नहीं, उसी प्रकार तरह-तरहका व्यवहार करते समय भी उनकी स्थिति सर्वत्र समान होती है ॥ १०८ ॥ ये बुद्धिमान् ज्ञानी अपनी वासनाओंके नाशके लिये विरुद्ध वास- नाओंका अभ्यास अथवा मनोनिरोध आदि नहीं करते । अतः पूर्व- वासनाओंका नाश न होनेके कारण कभी-कभी उनमेंसे किसीकी अनुवृत्ति हो जाती है । इसीसे इन उत्तम ज्ञानियोंमेंसे कोई कर्मनिष्ठ, कोई कामी और कोई क्रोधी इस प्रकार तरह-तरहके आचरणवाले देखे जाते हैं ॥ १०६-१११ पू० ॥ ऊपर जिस समनस्क मन्द ज्ञानीका वर्णन किया उसने भी सम्पूर्ण दृश्यका असत्यत्व तो निश्चय कर लिया होता है तथा स्वरूपानुसन्धान और समाधिके समय उसे अन्य कुछ भासता भी नहीं है, [किन्तु अन्य अवस्थाओंमें उसे हर्ष-विषादादि हो जाते हैं ] ॥ १११ उ०-११२ ॥ वास्तवमें तो स्वरूपका अनुसन्धान ही समाधि कहा जाता है, और कुछ नहीं । एक निर्विकल्पस्वरूप आत्मा ही सर्वदा सबके आश्रयरूपसे स्फुरित हो रहा है । वह स्फुरित न हो तो कुछ भी