त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशोऽध्यायः। ३०५ तथा विकल्पविकलं स्फुरेत् प्रोक्तदशासु च ॥ ११४ ॥ तावता न हि सर्वेषां समाधिः स्याद्धि भार्गव । ये तद्विमर्शसंयुक्ताः स तेषामेव संस्मृतः ॥ ११५ ॥ व्यवहारपरा वित्तिरपि वेद्यविवर्जिता । विदितं नाभसं नैल्यं यथा भूयोऽवलोकने ॥ ११६ ॥ असत्यत्वेन विज्ञातं न वित्तिस्तेन संयुता । अन्यथा नैव भेदः स्यात्तत्त्वात्तत्त्वविभासयोः ॥ ११७ ॥ तथाऽसत्यगृहीतस्य वेद्यस्य न हि वेदने । सम्बन्धः कुत्र चिद्वा स्याज्ज्ञानिनामत एव हि ॥ ११८ ॥ वेद्यहीना भवेद्वित्तिर्बाधितस्य विभासनात् । अमनस्कस्य सुतरां यतः सा चोन्मनी दशा ॥ ११९ ॥ मनो वै निश्चलं यत्र तदुक्तं चोन्मनी दशा । नहीं रह सकता। तथा उपर्युक्त विभिन्न ज्ञानोंकी अन्तराल अवस्थाओंमें वही निर्विकल्परूपसे स्फुरित होता है ॥ ११३-११४ ॥ परशुराम ! किन्तु इतने हीसे सबको समाधिकी प्राप्ति नहीं हो जाती। जो आत्मानुसन्धानपूर्वक अभ्यास करते हैं उन्हें ही समाधिकी प्राप्ति मानी गयी है ॥ ११५ ॥ तत्त्वज्ञ महापुरुषोंकी दृष्टिमें तो व्यवहारके समय भी चेतन चेत्यवर्गसे रहित ही है। जिसे आकाशकी नीलिमाके असत्यत्व- का ज्ञान हो गया है उसे दिखाई देनेपर भी वह असत्य ही जान पड़ती है। उसी प्रकार ज्ञानियोंकी दृष्टिमें चेतन दृश्यशून्य है। यदि ऐसा न हो तो ज्ञानी और अज्ञानीके दृश्य दर्शनमें कोई भेद ही न रहे ॥ ११६-११७ ॥ दृश्यवर्गको इस प्रकार असत्यरूपसे ग्रहण कर लेनेपर उसका भान होनेपर भी ज्ञानियोंका उसके साथ कहीं कोई सम्बन्ध नहीं होता। इसीसे बाधित दृश्यका भान होनेपर भी उत्तम ज्ञानियोंकी दृष्टिमें चिच्छक्ति सर्वदा दृश्यहीन ही है। तथा जो अन्यमनस्क ज्ञानी हैं उन्हें तो दृश्यका भान ही नहीं होता क्योंकि उनकी तो उन्मनी अवस्था रहती है ॥ ११८-११९ ॥ जहाँ मन निश्चल हो जाता है उसे उन्मनी दशा कहते हैं और २० त्रि० ज्ञा०