त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मनसश्चलनं तत् स्यात् सत्यवेद्यस्य सङ्गतिः ॥ १२० ॥ उत्तमज्ञानिनश्चैते दशे युगपदास्थिते । स सर्वदा व्युत्थितश्च समाधिस्थश्च भार्गव ॥ १२१ ॥ तस्मात्तस्यापि वेद्येन रहिता वित्तिरास्थिता । एवमेतद्धि संप्रोक्तं पृष्टं यद्यत् पुरा त्वया ॥ १२२ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे ज्ञानिस्थितिवि- भेदकथनमेकोनविंशोऽध्यायः । जब उसका सत्य रूपसे गृहीत दृश्यके साथ सम्बन्ध रहता है तो वही उसका चलन है ॥ १२० ॥ उत्तम ज्ञानीमें ये दोनों अवस्थाएँ एक साथ रहती हैं । परशुराम ! वह सर्वदा ही व्युत्थित रहता है और सर्वदा ही समाधिस्थ ॥ १२१ ॥ अतः उनकी दृष्टिमें भी चेतन सर्वदा चेत्यशून्य ही है। इस प्रकार तुमने पहले जो प्रश्न किया था वह सब निरूपण कर दिया ॥ १२२ ॥ एकोनविंश अध्याय समाप्त ।