त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
पृष्ठ 317, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशोऽध्यायः । ३०३ तेषां मनो बहुविधं भूत्वा तत्तत्क्रमानुगम् । यथाकार्यं बहुविधं साधयेत्तद्गदेव हि ॥ १०२ ॥ उत्तमज्ञानिनामात्मदृष्टिर्वाह्यगतापि च । अविरुद्धा सर्वदा स्याद्येषां ते बहुमानसाः ॥ १०३ ॥ तत्प्रारब्धं मनोभूमौ भवेदङ्कुरितं पृथक् । भवेज्ज्ञानाग्निना दग्धं क्षतं भूतं पुनः पुनः ॥ १०४ ॥ प्रारब्धबीजाङ्कुरः स्यात् सुखदुःखसमागमः । तद्विमर्शः फलं प्रोक्तं कुतो दग्धाङ्कुरे फलम् ॥ १०५ ॥ आहृतेरनुसन्धानैस्तेषां व्यवहृतिर्भवेत् । यथा प्रौढो हि बालेन सह खेलन् हि दृश्यते ॥ १०६ ॥ हृष्टो विषण्णश्च शिलागजादीनां विनाशने । एवं हृष्यन्ति सीदन्ति कार्येषु बहुमानसाः ॥ १०७ ॥ यथाऽन्यकार्यसक्तस्य हर्षोद्वेगौ न चान्तरौ । इन सबका मन जैसे अनेकरूप होकर अनेक प्रकारके कार्योंको उन-उनके क्रमानुसार सम्पन्न करता है, वैसे ही जिन उत्तम ज्ञानियों- की आत्मदृष्टिमें बाहर जानेपर भी कभी कोई अन्तर नहीं पड़ता वे 'बहुमानस' कहलाते हैं ॥ १०२-१०३ ॥ उनका अलग-अलग प्रारब्ध जैसे-जैसे उनकी मनोभूमिमें अंकुरित होता है वैसे-वैसे ही वह पुनः पुनः ज्ञानाग्निसे दग्ध हो जाता है ॥१०४॥ प्रारब्धरूप बीजका अंकुर है सुख-दुःखकी प्राप्ति और उसका फल है सुख-दुःखपर विचार करना। किन्तु जब अंकुर ही जल गया तो फल कहाँ से होगा ? ॥ १०५ ॥ केवल स्वभावसिद्ध अनुसन्धानके द्वारा ही उनका व्यवहार चलता है। जैसे कोई-कोई प्रौढ पुरुष बच्चोंके साथ खेलते समय पत्थर- के हाथी आदि किसी खिलौनेके फूट जानेपर प्रसन्न या उदास होता देखा जाता है उसी प्रकार ये बहुमानस ज्ञानी भी व्यवहारमें हर्षित और दुःखित होते देखे जाते हैं ॥ १०६-१०७॥ जिस प्रकार किसी अन्य कार्यमें लगे हुए पुरुषको ऊपर हीसे