भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 316

३०२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मनोभूमौ तु प्रारब्धबीजं भोगाङ्कुरं भवेत् ॥ ९५ ॥ मनोभूमेरभावेन तत् प्रारब्धं तु कालतः । कुसूलस्थं बीजमिव विनश्येन्नष्टशक्तिकम् ॥ ९६ ॥ यथात्यन्तसुमेधावी युगपद्दश पञ्च च । कार्याणि कुरुते कापि भवेदस्खलितोऽपि च ॥ ९७ ॥ भूय एवंविधा दृष्टाः क्रियानैपुण्यसंश्रयाः । यथा गच्छन् वदन् कुर्वन् युगपलक्ष्यते जनः ॥ ९८ ॥ तत्र चैकेन मनसा कथं स्यात् त्रिविधा क्रिया । अध्येतॄणां बहूनाञ्च युगपल्लक्षयेद् गुरुः ॥ ९९ ॥ अपभ्रंशानुच्चरितं वर्णभेदव्यवस्थितम् । राम यस्ते हतः शत्रुरर्जुनो हैहयाधिपः ॥ १०० ॥ सहस्रबाहुर्युगपद् हेतिभिर्बहुभिः पृथक् । अयुध्यदस्खलन् कापि मेधावी दृष्ट एव ते ॥ १०१ ॥ कर दिया होता है। मनकी भूमिपर ही प्रारब्धरूप बीजसे भोगरूप अङ्कुर उत्पन्न होता है। किन्तु इनकी मनरूप भूमि रहती नहीं, इस- लिये इनका प्रारब्ध खत्तीमें भरे हुए बीजकी तरह कालक्रमसे शक्ति- हीन हो जानेके कारण नष्ट हो जाता है ॥ ६५-६६ ॥ [ अब बहुमानस ज्ञानियोंका वर्णन करते हैं—] जिस प्रकार कोई अत्यन्त बुद्धिमान् पुरुष एकसाथ दस-पाँच काम करता है और उनमें कोई त्रुटि भी नहीं आने देता, इसी प्रकार ज्ञानियोंमें भी क्रियाकौशल- से सम्पन्न ऐसे अनेकों महापुरुष देखे जाते हैं ॥ ६७-६८ पू० ॥ जिस प्रकार एक ही आदमी एकसाथ चलता, बोलता और हाथोंसे काम करता देखा जाता है। यहाँ एक ही मनसे एक साथ तीन कार्य कैसे हो सकते हैं ? ॥ ६८ उ०-६९ पू० ॥ अध्यापक वर्णभेदमें रहनेवाले विद्यार्थियोंके अशुद्ध उच्चारण और अनुच्चारण को एक-साथ ही देख लेता है ॥ ६६ उ०-१०० पू० ॥ परशुराम ! तुमने जिस हैहयराज सहस्रार्जुन नामके शत्रु का वध किया था वह अलग-अलग अनेकों शस्त्रोंसे एकसाथ ही युद्ध करता था और ऐसा बुद्धिमान् था कि इसमें कभी चूक नहीं पड़ती थी। यह सब तुमने देखा ही था ॥ १०० उ०-१०१ ॥