भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 404 में से

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पृष्ठ 314

३०० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे ततो वैराग्यादिकं तु न तेषामुपयुज्यते ॥ ८१ ॥ न वा भूयोऽपि मननं समाधिश्चोपयुज्यते । सकृच्छ्रवणमात्रेण मननं ध्यानमेव च ॥ ८२ ॥ तत्काल ईषत् संप्राप्य ज्ञातासन्दिग्धतत्पदाः । भवन्ति जीवन्मुक्तास्ते जनकप्रमुखा इव ॥ ८३ ॥ विपरीताभ्यासवशान्नैव तैः क्षपिताः खलु । कामादिवासनाः सम्यक् सूक्ष्मा निर्मलबुद्धिभिः ॥ ८४ ॥ अतस्तैस्तत्पदे ज्ञाते चापि पूर्वस्थितास्तु ताः । कामादिवासनाः प्राग्वत् प्रवर्त्तन्ते निरन्तरम् ॥ ८५ ॥ न ताभिरीषद्वा बुद्धेस्तेषां लेपो भवेत् क्वचित् । विद्वद्भिस्ते हि संप्रोक्ता मुक्ताश्च बहुमानसाः ॥ ८६ ॥ राम कर्मवासनाभिरतिमूढं तु यन्मनः । तस्य ज्ञानं नैव भवेच्छिवोदितमपि क्वचित् ॥ ८७ ॥ दृढापराधयुक्तानामपि न स्यात् कथञ्चन । फिर उन्हें वैराग्यादि साधनोंकी भी विशेष आवश्यकता नहीं रहती और न पुनः पुनः मनन या समाधिकी ही अपेक्षा रहती है। एकबार श्रवण करनेपर ही तत्काल उसका कुछ मनन और निदि- ध्यासन भी हो जाता है। और वे निःसन्देह होकर उस परमपदको जान लेते हैं तथा जनकादिकी तरह जीवन्मुक्त हो जाते हैं ॥ ८१ उ०-८३ ॥ उनकी बुद्धि बहुत सूक्ष्म और निर्मल रहती है, इसलिये अपनी कामादिवासनाओंको उन्होंने उनके विपरीत अभ्यास करके क्षीण नहीं किया ॥ ८४ ॥ इसलिये उस परमपदको जान लेनेपर भी वे पहले हीसे विद्यमान कामादि वासनाएं उसमें पहले हीकी तरह बराबर नहीं रहती हैं ॥८५॥ उनसे उसकी बुद्धि कभी लेशमात्र भी लिप्त नहीं होती। विद्वान् लोग उन्हें मुक्त और बहुमानस कहते हैं ॥ ८६ ॥ परशुराम ! जिनका मन कर्मवासनाके कारण अत्यन्त मूढ हो गया है उसे साक्षात् शंकरजी उपदेश करें तब भी कभी ज्ञान नहीं हो सकता। इसी प्रकार सुदृढ अपराध-वासनावालोंको भी कभी ज्ञान नहीं होता ॥ ८७-८८ पू० ॥

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