त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
पृष्ठ 313, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशोऽध्यायः। २६६ वसिष्ठं पश्य कर्मिष्ठं सनकादींश्च न्यासिनः ॥ ७५ ॥ नारदं भक्तिसंमग्नं कवयन्तञ्च भार्गवम् । दैत्यपक्षसंश्रयिणं गुरुं देवसमाश्रयम् ॥ ७६ ॥ वाग्मिनञ्च व्यासमपि शास्त्रनिर्माणतत्परम् । जनकं पश्य राजानं भरतं त्यागिनं तथा ॥ ७७ ॥ भिन्नस्थितीन् स्वभावेन ज्ञानिनः पश्य चापरान् । रहस्यं ते प्रवक्ष्यामि शृणु भार्गवनन्दन ॥ ७८ ॥ विविधा या वासनोक्ता द्वितीया तत्र या भवेत् । कर्मजा मूढतारूपा सा सर्वेभ्यो महत्तरा ॥ ७९ ॥ येषां तल्लेशकश्चित्ते नास्ति मेधाविनस्तु ते । अपराधविहीनानां तेषां कामादिवासनाः ॥ ८० ॥ अभ्यासेनाविलीनाश्च ज्ञानस्याप्रतिबन्धिकाः । और संगका त्याग किये हुए हूँ। वसिष्ठको देखो, वे बड़े कर्मकाण्डी और सनकादिक संन्यासी हैं ॥ ७५ ॥ नारदजी भक्तिभावमें लीन रहते हैं, शुक्राचार्य दैत्योंका पक्ष लेकर कविता करनेमें लगे रहते हैं और वृहस्पतिजी देवताओंका पक्ष लेने वाले हैं ॥ ७६ ॥ व्यासजी बड़े वादकुशल हैं और शास्त्ररचनामें तत्पर रहते हैं। जनकको देखो, वे राजा हैं और भरत राज्यका त्याग करनेवाले हैं ॥७७॥ इसी प्रकार तुम और भी अनेकों भिन्न स्थितिवाले ज्ञानियोंको देख सकते हो। भृगुनन्दन ! इसमें जो रहस्य है, वह मैं तुम्हें बताता हूँ, श्रवण करो ॥ ७८ ॥ मैंने ऊपर जो तीन प्रकारकी वासनाएँ बतलायी हैं उनमें दूसरी कर्मवासना, जिसका स्वरूप मूढ़ता ही है, सबसे बढ़कर है ॥ ७९ ॥ जिनके चित्तमें उसका लेशमात्र भी नहीं होता वे लोग बुद्धिमान् होते हैं। [ अपने निमित्त कर्मका अभाव होनेके कारण ] उनमें अपराधवासना भी नहीं होती। ऐसी स्थितिमें यदि अभ्यासके द्वारा उनकी कामवासना सर्वथा निवृत्त न भी हो तो भी वह ज्ञानकी प्रति- बन्धिका नहीं रहती ॥ ८०-८१ पू० ॥