भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 304

२६० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे निर्विशेषं परं तत्त्वं नास्ति नैव च सम्भवेत् ॥ १८ ॥ अस्ति तच्चैव विज्ञातुं शक्यते केनचित् क्वचित् । ज्ञात्वापि परमं तत्त्वं नैव तत्त्वं परं भवेत् ॥ १९ ॥ एतज्ज्ञानात् कथं मोक्ष इत्यादि बहुधा स्थितः । विपरीतग्रहो वापि चैतत्संशय एव वा ॥ २० ॥ अपराधः पौरुषस्तु वासनाद्या प्रकीर्त्तिता । शास्त्रविद्यासु कुशलाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २१ ॥ अनया विहता राम संसृतिं समुपागताः । पुरा दुष्कृतसंस्कारवशाद् बुद्धौ तु यत् स्थितम् ॥ २२ ॥ मालिन्यमुपदेशस्य ग्रहणप्रतिबन्धकम् । येनाचार्यैः सम्यगुक्तमपि नो गृह्यते खलु ॥ २३ ॥ सा कर्मवासना प्रोक्ता दुर्जेयापि निरोधतः । कामः कर्त्तव्यशेषः स्यादनन्तो बहुशाखकः ॥ २४ ॥ [ उनकी ऐसी धारणा रहती है—] 'कोई निर्विशेष परमतत्त्व है ही नहीं और न उसका होना सम्भव ही है। यदि वह हो भी तो किसीको उसका कभी ज्ञान नहीं हो सकता। यदि कोई जान भी ले तो सन्देह होने लगता है कि यह परमतत्त्व होना सम्भव नहीं है; इसके ज्ञानसे मोक्ष कैसे हो सकता है ?' इस प्रकार विपरीत ग्रह अनेक प्रकारसे रहता है। अथवा इसीको संशय भी कह सकते हैं ॥ १८ उ०-२० ॥ यह पुरुषसम्बन्धी अपराध पहली वासना कही गयी है। परशुराम ! इसके मारे हुए सैकड़ों-हजारों शास्त्रविद्यामें कुशल पुरुष भी संसार- चक्रमें पड़े रहते हैं ॥ २१-२२ पू० ॥ पूर्व दुष्कर्मोंके संस्कारोंके कारण बुद्धिमें जो मलिनता आ जाती है वह उपदेशको ग्रहण करने में रुकावट डालनेवाली होती है, जिसके कारण गुरुदेवके द्वारा बहुत समझानेपर भी बात समझमें नहीं आती। उसको 'कर्मवासना' कहा है। इसे चित्तनिरोधके द्वारा भी जीतना कठिन है ॥ २२ उ०-२४ पू० ॥ 'मेरा यह कर्त्तव्य है' इत्यादि प्रकारसे कर्त्तव्यशेष रहनेका संकल्प 'कामवासना' है। यह अनन्त और अनेकों शाखाओंवाली है।