त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशोऽध्यायः । २६१ रामाम्भोधौ तरङ्गाणां संख्यां कुर्याद्धि कश्चन । पार्थिवानाम्णूनां वा तथा तारागणस्य वा ॥ २५ ॥ एकस्यापि हि कामानां संख्यातुं नैव शक्यते । इयं राम तृतीया ते संप्रोक्ता कामवासना ॥ २६ ॥ आकाशादपि विस्तीर्णा ह्यचला भूधरादपि । आशापिशाची प्रोक्तेयं राम या कामवासना ॥ २७ ॥ अनयैव हि सर्वोऽयं लोक उन्मत्तवत् स्थितः । येन दन्दह्यमानोऽयं लोक आक्रन्दते तदा ॥ २८ ॥ केऽपि लोके धन्यतमा महामन्त्रसमाश्रयात् । विनिर्मुक्तास्तया भान्ति नराः सर्वाङ्गशीतलाः ॥ २९ ॥ एताभिस्तिसृभी राम वासनाभिर्यतो मनः । समाक्रान्तमतो नूनं तत्तत्त्वं नावभासते ॥ ३० ॥ अतः सर्वसाधनस्य वासनानाशनं फलम् । परशुराम ! कोई पुरुष समुद्रकी तरंगोंकी गणना तो कर सकता है, पृथ्वीके कणोंको भी गिन सकता है और तारागणकी गिनती भी कर सकता है; किन्तु किसी एक पुरुषकी भी कामनाओंको गिनना सम्भव नहीं है । परशुराम ! यह तुमसे तीसरी कामवासनाका वर्णन किया ॥ २४ उ०--२६ ॥ परशुराम ! यह कामवासना ही आशापिशाची भी कही जाती है । यह आकाशसे भी विस्तीर्ण और पर्वतसे भी अधिक अविचल है ॥२७॥ इसीके कारण यह सारा लोक उन्मत्त-सा हो रहा है और इसीसे दग्ध होकर यह सर्वदा चीत्कार करता रहता है ॥ २८ ॥ इस संसारमें कोई अत्यन्त बड़भागी पुरुष ही परवैराग्यरूप महामन्त्रका आश्रय लेकर इससे मुक्त होते हैं और फिर सर्वाङ्ग शीतल होकर सुशोभित होते हैं ॥ २९ ॥ परशुराम ! क्योंकि मन इन तीन वासनाओंसे आक्रान्त है, इसीसे इसे वह परमतत्त्व प्रकाशित नहीं होता ॥ ३० ॥ अतः सब साधनोंका फल वासनाओंका नाश ही है। इनमें