त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्राद्या ह्यपराधत्वनिश्चयाद्विनिवर्त्तते ॥ ३१ ॥ द्वितीया जन्मनैकेन निवर्त्तेतापि जन्मभिः । ऐश्वरेण प्रसादेन नान्यथा कोटियुक्तिभिः ॥ ३२ ॥ तृतीया विनिवर्त्तेत वैराग्यादिसुसाधनैः । दोषदृष्ट्यैव वैराग्यं भवेन्नैवाऽन्यथा क्वचित् ॥ ३३ ॥ प्रोक्तानां वासनानां वै स्वल्पानल्पविभेदतः । तस्याश्चाल्पानल्पभावापेक्षा भवति भार्गव ॥ ३४ ॥ तत्राद्यं सर्वमूलं स्यान्मुमुक्षुत्वं न चेतरत् । मुमुक्षामन्तरा यत्तु श्रवणं मननादिकम् ॥ ३५ ॥ न मुख्यफलसंयुक्तं केवलं शिल्पवद्भवेत् । न शिल्पज्ञानमात्रेण प्राप्यते परमं पदम् ॥ ३६ ॥ मुमुक्षामन्तरा यैस्तु श्रुतं सम्यग् विचारितम् । शवालङ्कारवत् सर्वं तेषां व्यर्थं भवेत् खलु ॥ ३७ ॥ पहली अपराधवासना तो अश्रद्धा आदिमें अपराधत्वका निश्चय होनेसे निवृत्त होती है ॥ ३१ ॥ दूसरी कर्मवासना एक या अनेक जन्मोंमें केवल ईश्वरकी कृपासे ही छूट सकती है, और तो करोड़ों युक्तियोंसे भी नहीं छूट सकती ॥३२॥ तीसरी कामवासना वैराग्यादि साधनोंसे दूर हो सकती है। वैराग्य विषयोंमें दोषदृष्टि होनेपर ही होता है, और किसी प्रकार नहीं ॥ ३३ ॥ परशुराम ! उपर्युक्त वासनाओंकी अल्पता अथवा अधिकताके भेदके अनुसार उनकी निवृत्तिके लिये भी अल्प या अधिक भावकी अपेक्षा होती है ॥ ३४ ॥ इनमें भी सबका मूल और आदि कारण मुमुक्षुता है, कोई और नहीं। मुमुक्षुताके बिना जो श्रवण-मनन इत्यादि होते हैं उनसे मुख्य फल तत्त्वज्ञान नहीं मिलता, वे केवल कलामात्र रह जाते हैं और केवल कलामात्रका ज्ञान होनेसे परमपदकी प्राप्ति हो नहीं सकती ॥ ३५-३६ ॥ मुमुक्षुताके बिना जिन्होंने जो कुछ भी श्रवण या मनन किया होता है वह तो केवल मुर्देके श्रृंगारके समान उनके लिये व्यर्थ ही होता है ॥ ३७ ॥