त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशोऽध्यायः । २६५ भार्गव शृणु ते वक्ष्ये श्रेयसः परमोद्भवम् ॥ ५० ॥ परा सा या चितिर्देवी स्वस्वातन्त्र्यस्य वैभवात् । स्वात्मन्येव जगच्चित्रं दर्पणप्रतिबिम्बवत् ॥ ५१ ॥ सैव हैरण्यगर्भाख्यां तनुमास्थाय वै परा । अनाद्यज्ञानसञ्छन्नजीवानां हितकाम्यया ॥ ५२ ॥ उन्मेषयदागमाब्धिं सर्वकामप्रपूरणम् । तत्र जीवाः स्वभावेन विचित्रकामवासनाः ॥ ५३ ॥ कथं तेषां शुभं भूयादेवं चिन्तापरायणः । असृजत् काम्यकर्माणि फलचित्राणि सर्वशः ॥ ५४ ॥ सदसद्वापि हि जनः करोत्येव स्वभावतः । तथा च केनापि कर्मपरिपाकवशेन तु ॥ ५५ ॥ भ्रमन् योनिविभेदेषु मानुष्यमुपसङ्गतः । कामनावशतः काम्ये कर्मण्यभिमुखो भवेत् ॥ ५६ ॥ लगे—"भृगुनन्दन ! सुनो, मैं तुम्हें निःश्रेयसका प्रधान साधन बतलाता हूँ ॥ ५० ॥ जो पराचितिदेवी अपने स्वातन्त्र्यके प्रभावसे दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान अपनेमें ही इस जगत्रूप चित्रको भासित कर देती है उसीने हिरण्यगर्भसंज्ञक शरीर धारण कर अनादि अज्ञानसे आवृत जीवोंके हितकी कामनासे सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले आगम- शास्त्ररूप समुद्रको प्रकट किया ॥ ५१-५३ पू० ॥ संसारमें जीव तो स्वभावसे ही अनेकों प्रकारकी कामना एवं वासनाओंवाले हैं। अतः उनका किस प्रकार शुभ हो—ऐसा चिन्तन करते हुए उसने अनेक फल देनेवाले सम्पूर्ण काम्य कर्मों की रचना की ॥ ५३ उ०-५४ ॥ मनुष्य स्वभावसे ही शुभ या अशुभ कर्म तो करता ही रहता है। तथा अनेकों योनियोंमें भटकता हुआ किसी कार्यविशेषके फलोन्मुख होनेपर मनुष्य-शरीर प्राप्त करता है। तब कामनाओंके अधीन होकर वह काम्य कर्मोंकी ओर प्रवृत्त होता है ॥ ५५-५६ ॥