त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तीव्रवैराग्यमुखतः क्रमेण तीव्रतामियात् । दोषदृष्ट्या हि वैराग्यं विषयप्रीतिनाशनम् ॥ ४४ ॥ वैराग्येण मुमुक्षुत्वं तीव्रं तत्परतोदयम् । तत्परत्वं साधनेषु प्रवृत्तिरतितीव्रता ॥ ४५ ॥ अतितीव्रप्रवृत्त्यैव द्रुतं फलमवाप्नुयात् । इति दत्तात्रेयवचो निशम्य भार्गवः पुनः ॥ ४६ ॥ पप्रच्छ सन्दिग्धमनाः संशयं सुमहत्तरम् । भगवन् भवता प्रोक्तं सत्सङ्गो मूलकारणम् ॥ ४७ ॥ ईश्वरानुग्रहश्चापि दोषदृष्टिरपीति च । किमादिकारणं मुख्यं तत्प्राप्तिर्वा कथं भवेत् ॥ ४८ ॥ न हि निष्कारणं किञ्चिद्भवेदिति हि निश्चयः । तत् कथं स्याद्विना हेतोरेतन्मे वद विस्तरात् ॥ ४९ ॥ इति पृष्टः प्राह रामं दत्तात्रेयो दयानिधिः । तीव्र वैराग्यादिके क्रमसे मुमुक्षुतामें तीव्रता आती है । विषयों- में दोषदृष्टि होनेसे ही उनकी आसक्तिको नष्ट करनेवाला वैराग्य उत्पन्न होता है ॥ ४४ ॥ वैराग्यसे तत्परताकी प्राप्ति करानेवाली तीव्र मुमुक्षुता होती है । और साधनोंमें प्रवृत्त होनेकी अत्यन्त तीव्रता ही तत्परता है तथा अत्यन्त तीव्र प्रवृत्ति होनेपर ही फलकी शीघ्र प्राप्ति होती ॥४५-४६ पू०॥ श्रीदत्तात्रेयजीके ये वचन सुनकर परशुरामजीके मनमें सन्देह हो गया । अतः उन्होंने पुनः यह महान् संशय प्रकट करते हुए पूछा—॥ ४६ उ०-४७ पू० ॥ "भगवन् ! पहले आपने सत्संगको ही मूलकारण बतलाया था । फिर ईश्वरकी कृपा और विषयोंमें दोषदृष्टिका भी वर्णन किया । इनमें मुख्य और आदि कारण कौन-सा है और उसकी प्राप्ति भी कैसे होती है, क्योंकि यह तो निश्चय है कि कोई भी बात अकारण ही नहीं होती; फिर वह (मुक्तिका मूलकारण) ही बिना किसी निमित्तके कैसे हो जायगा ? अतः आप उसका विस्तारसे वर्णन कीजिये" ॥ ४७ उ०-४९ ॥ ऐसा प्रश्न होनेपर दयानिधि दत्तात्रेयजी परशुरामसे कहने