त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
पृष्ठ 310, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ें२६६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे कामनाया विशेषेण यदीश्वरपरो भवेत् । तदैश्वराणि शास्त्राणि प्रसङ्गादवलोकयेत् ॥ ५७ ॥ काम्यकर्मफलश्रुत्या प्रवृत्तः काम्यकर्मणि । विहतस्तत्फलाप्राप्त्या वैगुण्यात् सूक्ष्मकर्मणः ॥ ५८ ॥ कर्त्तव्यजिज्ञासयैव कश्चित् स पुरुषं व्रजेत् । तत्प्रसङ्गवशात् क्वापि माहात्म्यं शृणुयात् क्वचित् ॥ ५९ ॥ महेश्वरस्य च ततः प्राक्पुण्यपरिपाकतः । तस्य प्रसादने भूयात् प्रवृत्तिरपि भार्गव ॥ ६० ॥ तस्मात् प्राक्पुण्यपाकेन सत्सङ्गमभिगम्य तु । प्राप्नोति श्रेयःसोपानपंक्तिमत्यन्तदुर्लभाम् ॥ ६१ ॥ प्रायः सत्सङ्गमूलैव श्रेयःप्राप्तिरुदीरिता । क्वचिदुत्कृष्टपुण्येन चोत्कृष्टतपसापि वा ॥ ६२ ॥ [ मेरी कामनापूर्तिमें विघ्न न हो—ऐसी ] विशेष कामनासे ही जब वह ईश्वरपरायण होता है, तब प्रसंगवश उसे ईश्वरसम्बन्धी शास्त्र देखने पड़ते हैं ॥ ५७ ॥ काम्य कर्मोंके फल सुनकर वह काम्य कर्मोंमें प्रवृत्त होता है। किन्तु किसी कर्मांगमें त्रुटि आजानेके कारण जब उसकी फलप्राप्तिमें विघ्न पड़ता है तो अपना कर्त्तव्य जाननेकी इच्छासे वह किसी सत्पुरुषके पास जाता है ॥ ५८-५६ पू० ॥ उसी प्रसंगसे कभी अपना पूर्व पुण्य उदय होनेपर वह उन महा- पुरुषके मुखसे भगवान् महेश्वरका माहात्म्य श्रवण करता है। और परशुरामजी ! उन महेश्वरकी कृपासे ही माहात्म्य-वर्णनमें उन महा- पुरुषकी प्रवृत्ति भी होती है ॥ ५६ उ०--६० ॥ अतः पूर्व पुण्योंका उदय होनेपर ही वह सत्संगमें जाकर निःश्रेयस ( मुक्तिपद ) की अत्यन्त दुर्लभ सोपानपरम्परा ( सीढ़ी अर्थात् साधन- पद्धति ) प्राप्त करता है ॥ ६१ ॥ इस प्रकार निःश्रेयसप्राप्तिका मूलकारण प्रायः सत्संग ही कहा गया है। कभी महान् पुण्य अथवा उत्तम तपके द्वारा आकाशसे