भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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एकोनविंशोऽध्यायः । २४७ श्रेयः प्राप्नोति सहसा ह्याकाशफलपातवत् । तस्मात् कारणवैचित्र्याच्छ्रेयःप्राप्तिर्विचित्रता ॥ ६३ ॥ तथा च बुद्धिभेदेन वासनातारतम्यतः । साधनानां तारतम्याद्विचित्रा ज्ञानिनां स्थितिः ॥ ६४ ॥ स्वभावाद्यस्य वै बुद्धेर्वासना विरला भवेत् । तस्याल्पसाधनेनैव ज्ञानसिद्धिर्भवेदलम् ॥ ६५ ॥ यस्य स्वभावात् संशुद्धं वासना न हि लेशतः । तस्य स्वल्पनिमित्तेन भवेज्ज्ञानं महत्तरम् ॥ ६६ ॥ यस्य स्वभावादत्यन्तवासनानिबिडं मनः । तस्य ज्ञानं जातमपि समाच्छादितकल्पकम् ॥ ६७ ॥ तेनैव साधितं भूयश्चिरादभ्येति पूर्णताम् । अत एव ज्ञानिनां तु दृश्यते त्रिविधा स्थितिः ॥ ६८ ॥ चित्तपाकविभेदेन स्थितिभेदो भृगूद्वह । गिरे हुए फलके समान अकस्मात् भी परमपदकी प्राप्ति हो जाती है ॥ ६२-६३ पू० ॥ अतः कारणोंकी विभिन्नता होनेसे निःश्रेयसकी प्राप्तिमें भी भेद रहता है। इसी प्रकार बुद्धियोंके भेद, वासनाओंकी न्यूनाधिकता और साधनोंके तारतम्यसे भी ज्ञानियोंकी स्थिति अनेक प्रकारकी होती है ॥ ६३ उ०--६४ ॥ जिसकी बुद्धिमें स्वभावसे ही वासनाओंकी कमी होती है उसे थोड़े-से साधनसे ही पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाता है ॥ ६५ ॥ जिसका मन स्वभावसे ही शुद्ध है और लेशमात्र भी वासना नहीं है, उसे किसी थोड़े-से निमित्तसे ही महान् ज्ञान हो जाता है ॥६६॥ जिसका मन स्वभावसे ही वासनाओंसे अत्यन्त भरपूर है उसे ज्ञान हो भी जाय तो भी ढका-सा रहता है ॥ ६७ ॥ वही जब बहुत साधन करता है तो बहुत काल व्यतीत होनेपर उसका ज्ञान पूर्ण होता है। इसीसे ज्ञानियोंकी अनेक प्रकारकी स्थिति देखी जाती है ॥ ६८ ॥ भृगुनन्दन ! यह स्थितिका भेद चित्तशुद्धिका भेद रहनेके कारण