भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 404 में से

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विंशोऽध्यायः । ३०६ प्रश्नं निशम्य च ज्ञात्वा विष्णुविधिमनोगतम् ॥ १३ ॥ मत्वाऽनाश्वस्तमनसा ऋषीन् देवो व्यचिन्तयत् । किञ्चिदुक्तं मयाऽत्रापि व्यर्थमेव भवेन्न तु ॥ १४ ॥ स्वपक्षत्वेन जानीयुर्ऋषयः श्रद्धया युताः । इति मत्वा प्रत्युवाच देवदेवो महेश्वरः ॥ १५ ॥ शृणुध्वं मुनयो नाऽहमप्येतद्वेद्मि सुस्फुटम् । अतो विद्यां भगवतीं ध्यायामः परमेश्वरीम् ॥ १६ ॥ तत्प्रसादान्निगूढार्थमपि विद्मस्ततः परम् । इत्युक्त्वा मुनयः सर्वे विधिविष्णुशिवैः सह ॥ १७ ॥ दध्युर्विद्यां महेशानीं त्रिपुरां चिच्छरीरिणीम् । एवं सर्वैरभिध्याता त्रिपुरा चिच्छरीरिणी ॥ १८ ॥ आविरासीच्चिदाकाशमयी शब्दमयी परा । अभवन्मेघगम्भीरनिःस्वनो गगनाङ्गणे ॥ १९ ॥ वदन्त्वृषिगणाः किं वो ध्याता तद् द्रुतमीहितम् । प्रश्न सुनकर श्रीमहादेवजी विष्णु और ब्रह्माजी के मनका आशय समझ गये और ऋषियोंके चित्तमें अश्रद्धा देखकर सोचने लगे कि इस विषयमें यदि मैं भी कुछ कहूँगा तो वह व्यर्थ ही होगी। ऋषियों- को श्रद्धा तो है नहीं, इसलिये उसे ये मेरे अपने ही पक्षकी बात मानेंगे ॥ १३ उ०--१५ पू० ॥ ऐसा सोचकर देवाधिदेव श्रीमहादेवजी बोले—“मुनिगण ! सुनिये, मैं भी यह बात स्पष्टतया नहीं जानता। इसलिये हम सब मिलकर परमेश्वरी भगवती विद्यादेवीका ध्यान करें। फिर तो उनकी कृपासे हम अत्यन्त गूढ़ रहस्यको भी जान सकते हैं” ॥ १५ उ०--१७ पू० ॥ महादेवजीके ऐसा कहनेपर ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजीके सहित सभी मुनिगण चित्शरीरिणी महेश्वरी त्रिपुरादेवीका ध्यान करने लगे। इस प्रकार सबके द्वारा ध्यान किये जाने पर चित्स्वरूपिणी त्रिपुरा, जो चिदाकाशमयी और शब्दस्वरूपा हैं, प्रकट हो गयीं ॥ १७ उ०--१९ पू० ॥ तब आकाशमण्डलमें उनका यह मेघगम्भीर स्वर गूँज उठा— “ऋषियो ! बतलाओ, तुमने किसलिये मेरा ध्यान किया ? शीघ्र ही

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