त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तेषां नो विविधा भाति स्थितिः प्रकृतिभेदतः ॥ ७ ॥ केचित् सदा समाधिस्थाः केचिन्मीमांसने रताः । अपरे भक्तिनिर्मग्नाश्चान्ये कर्मसमाश्रयाः ॥ ८ ॥ व्यवहारपरास्त्वेके बहिर्मुखनरा इव । तेषु श्रेयान् हि कतम एतन्नो वक्तुमर्हसि ॥ ९ ॥ स्वस्वपक्षं वयं विद्मः श्रेयांसमिति वै विधे । इति पृष्टोऽवदद् ब्रह्मा मत्वाऽनाश्वस्तमानसान् ॥ १० ॥ मुनीन्द्रा नाहमप्येतद्वेद्मि सर्वात्मना ततः । जानीयादिममर्थन्तु सर्वज्ञः परमेश्वरः ॥ ११ ॥ तत्र यामोऽर्थं संप्रष्टुमित्युक्त्वा तत्र तैरयौ । सङ्गम्य देवदेवेशं विष्णुं नाभिसमागतः ॥ १२ ॥ पप्रच्छ ऋषिमुख्यानां प्रश्नं तं लोकसृड् विधिः । कारण सभी तत्त्वोंके जाननेवाले हैं । किन्तु स्वभावभेदसे हम सबकी स्थितियाँ तरह-तरहकी हैं ॥ ७ ॥ हममें से कोई सर्वदा समाधिमें मग्न रहते हैं, कोई विचारमें लगे रहते हैं, कोई भक्तिभावमें लीन रहते हैं और कोई कर्ममें निष्ठा रखने वाले हैं ॥ ८ ॥ कोई बहिर्मुख पुरुषोंकी तरह व्यवहारमें लगे रहते हैं । इन सबमें श्रेष्ठ कौन हैं—यह हमें बतलानेकी कृपा करें । ब्रह्मन् ! हम लोग तो अपने-अपने पक्षको ही सबसे श्रेष्ठ मानते हैं ॥ ९--१० पू० ॥ मुनियों द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर ब्रह्माजीने यह सोचकर कि इनके चित्तमें मेरे प्रति ठीक-ठीक श्रद्धा नहीं है, उनसे, कहा, “मुनीन्द्रो ! यह बात पूरी तरहसे मैं भी नहीं जानता । भगवान् महेश्वर सर्वज्ञ हैं, वे इस विषयमें जानते होंगे ! १० उ०--११ ॥ चलो, उनसे पूछनेके लिये वहाँ चलें ।” ऐसा कहकर वे उन सबको लेकर वहाँ गये । भगवान् विष्णु भी वहीं पधारे हुए थे । अतः उनके सहित श्रीमहादेवजीसे मिलकर लोकस्रष्टा श्रीब्रह्माजीने मुनिश्रेष्ठोंका प्रश्न पूछा ॥ १२--१३ पू० ॥