त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविंशोऽध्यायः। ३११ ब्रूहि यत्तेऽपरं रूपमैश्वर्यं ज्ञानमेव च । फलं तस्माद्दनं मुख्यं साधकं सिद्धमेव च ॥ २७ ॥ सिद्धेस्तु परमां काष्ठां सिद्धेषूत्तममेव च । देव्येतत् क्रमतो ब्रूहि भूयस्तुभ्यं नमो नमः ॥ २८ ॥ इत्यापृष्टा महाविद्या प्रवक्तुमुपचक्रमे । दयमाना ऋषिगणे स्पष्टार्थं परमं वचः ॥ २९ ॥ शृणुध्वमृषयः सर्वे प्रवक्ष्यामि क्रमेण तत् । अमृतं ह्यागमाम्भोधेः समुद्धृत्य ददामि वः ॥ ३० ॥ यत्र सर्वं जगदिदं दर्पणप्रतिविम्बवत् । उत्पन्नञ्च स्थितं लीनं सर्वेषां भासते सदा ॥ ३१ ॥ यदेव जगदाकारं भासतेऽविदितात्मनाम् । यद्योगिनां निर्विकल्पं विभात्यात्मनि केवलम् ॥ ३२ ॥ गम्भीरस्तिमिताम्भोधिरिव निश्चलभासनम् । यत् सुभक्तैरतिशयप्रीत्या कैतववर्जनात् ॥ ३३ ॥ स्वभावस्थं स्वरसतो ज्ञात्वापि स्वोदयं पदम् । आपका जो पर और अपर रूप है, जो ऐश्वर्य और ज्ञान है, उसका जो फल और मुख्य साधन है, जो साधक और सिद्ध हैं, जो सिद्धिकी पराकाष्ठा है और सिद्धोंमें जो श्रेष्ठ हैं—उन सबका क्रमशः वर्णन कीजिये । आपको पुनः अनेकों बार नमस्कार है” ॥ २७-२८ ॥ ऋषियों द्वारा इसप्रकार पूछे जानेपर देवी महाविद्याकी उनपर दयादृष्टि हो गयी और उन्होंने असन्दिग्ध एवं मधुर वचनोंमें अपना भाषण आरम्भ किया ॥ २९ ॥ “ऋषिगण ! आप सभी श्रवण करें, मैं क्रमशः वर्णन करती हूँ। मैं आगमरूपी समुद्रका अमृत निकालकर आप लोगोंको देती हूँ ॥ ३० ॥ जहाँ यह सम्पूर्ण जगत् दर्पणमें प्रतिबिम्बकी तरह सभीको सर्वदा उत्पन्न, स्थित और लीन हुआ भास रहा है, जो अज्ञानियोंको जगत्- रूप ही भासता है, किन्तु योगियोंको जो निर्विकल्प जान पड़ता है तथा अपने स्वरूपमें जो गम्भीर शान्त समुद्रके समान निश्चल रूपसे स्फुरित हो रहा है, श्रेष्ठ भक्तगण जिस अद्वय आत्मरूप पदको जान-