भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 326

३१२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे विभेदभासमारुह्य सेव्यतेऽत्यन्ततत्परैः ॥ ३४ ॥ अक्षान्तःकरणादीनां प्राणसूत्रं यदान्तरम् । यदभानेन किञ्चित् स्याद्यच्छास्त्रैरभिलक्षितम् ॥ ३५ ॥ परा सा प्रतिभा देव्याः परं रूपं मयेरितम् । ब्रह्माण्डानामेकनां वहिरूर्ध्वे सुधाम्बुधौ ॥ ३६ ॥ मणिद्वीपे नीपवने चिन्तामणिसुमन्दिरे । पञ्चब्रह्ममये मञ्चे रूपं त्रैपुरसुन्दरम् ॥ ३७ ॥ अनादिमिथुनं यत्तदपराख्यम् ऋषीश्वराः । तथा सदाशिवेशानौ विधिविष्णुत्रिलोचनाः ॥ ३८ ॥ गणेशस्कन्ददिक्पालाः शक्तयो गणदेवताः । यातुधानाः सुरा नागा यक्षकिम्पुरुषादयः ॥ ३९ ॥ पूज्याः सर्वा मम तनूरपराः परिकीर्त्तिताः । कर भी अपने चित्तकी स्वाभाविकी प्रवृत्तिके कारण उपास्य-उपा- सकरूप भेदकी कल्पना करके अत्यन्त तत्पर हो निश्चल भावसे परम प्रेमपूर्वक उसका सेवन करते हैं, जो इन्द्रिय और अन्तःकरणादिका प्राणरूप अन्तःसूत्र है, जिसके स्फुरित न होनेपर कुछ भी नहीं रहता तथा जो केवल शास्त्रों द्वारा ही लक्षित होता है, वह परम प्रकाश ही मुझ त्रिपुरादेवीका पर स्वरूप कहा गया है ॥ ३१-३६ पू० ॥ अनेकों ब्रह्माण्डोंके बाहर बहुत दूर जो अमृतका समुद्र है उसमें एक मणिमय द्वीप है, उसके कदम्ब-वनमें एक चिन्तामणियोंका बना मनोहर मन्दिर है । उसमें पञ्चब्रह्ममय१ सिंहासनपर जो अनादि मिथुनात्मक त्रिपुरसुन्दरी रूप है, ऋषीश्वरो ! वही मेरा अपर स्वरूप है ॥ ३६ उ०-३७ पू० ॥ इसी प्रकार सदाशिव, ईशान, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, गणेश, स्कन्द, इन्द्रादि दिक्पाल, महालक्ष्मी आदि शक्तियाँ, वसु आदि गण, राक्षस, देवता, नाग, यक्ष और किन्नर आदि जो भी पूज्य हैं वे सभी मेरे अपर स्वरूप कहे गये हैं ॥ ३८ उ०-४० पू० ॥ १. ब्रह्मा, विष्णु, शिव, ईश्वर और सदाशिव-ये पाँच ब्रह्म (भगवान्‌के स्वरूप) ही जिसके अवयव हैं । इनमें पहले उसके चार पाये हैं और सदाशिव ऊपरका पट्ट है ।