भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 327

विंशोऽध्यायः । ३१३ मम मायाविमूढास्तु मां न जानन्ति सर्वतः ॥ ४० ॥ पूजिता ह्येव सर्वैस्तैर्ददामि फलमीहितम् । न मत्तोऽन्या काचिदस्ति पूज्या वा फलदायिनी ॥ ४१ ॥ यथा यो मां भावयति फलं मत् प्राप्नुयात्तथा । ममैश्वर्यमृषिगणा अपरिच्छिन्नमीरितम् ॥ ४२ ॥ अनपेक्ष्यैव यत् किञ्चिदहमद्वयचिन्मयी । स्फुराम्यनन्तजगदाकारेण ऋषिपुङ्गवाः ॥ ४३ ॥ तथा स्फुरन्त्यपि सदा नात्येम्यद्वैतचिद्वपुः । एतन्मे मुख्यमैश्वर्यं दुर्घटार्थविभावनम् ॥ ४४ ॥ ममैश्वर्यन्तु ऋषयः पश्यध्वं सूक्ष्मया दृशा । सर्वाश्रया सर्वगता चाप्यहं केवला चितिः ॥ ४५ ॥ स्वमायया स्वमज्ञात्वा संसरन्ती चिरादहम् । भूयो विदित्वा स्वात्मानं गुरोः शिष्यपदं गता ॥ ४६ ॥ इन सबरूपोंमें मैं हूँ, किन्तु मेरी मायासे मोहित पुरुष मुझे नहीं पहचानते । इन सबमें पूजित होनेपर मैं ही इनके द्वारा अभीष्ट फल प्रदान करती हूँ। मुझसे भिन्न न कोई पूजित होनेवाली है और न फल देनेवाली ॥ ४० उ०-४१ ॥ मुझमें जो जैसी भावना करता है वह वैसा ही फल प्राप्त कर लेता है। ऋषियो ! मेरा ऐश्वर्य असीम बतलाया गया हैं ॥ ४२ ॥ मुनिवरो ! मैं अद्वय और चिन्मयी हूं तथा अन्य किसीकी भी अपेक्षा न रख कर जगत्रूपसे भास रही हूँ ॥ ४३ ॥ किन्तु इस प्रकार भासनेपर भी मैं अपने अद्वितीय चिन्मय स्वरूपका त्याग नहीं करती हूँ। यही असम्भवको सम्भव कर देनेवाला मेरा मुख्य ऐश्वर्य है ॥ ४४ ॥ ऋषियो ! मेरे ऐश्वर्यको आप लोग तनिक सूक्ष्म दृष्टिसे देखें कि मैं सबकी आधार और सबमें अनुगत होकर भी केवल चिन्मात्र ही हूँ ॥ ४५ ॥ अपनी मायासे अपने हीको न जानकर मैं चिरकालसे जन्म- मरण रूप संसारचक्रमें पड़ी हुई हूं। फिर गुरुदेवका शिष्यत्व स्वीकार