त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे नित्यमुक्ता पुनर्मुक्ता भूयो भूयो भवाम्यहम् । निरुपादानसम्भारं सृजामि जगदीदृशम् ॥ ४७ ॥ इत्यादि सन्ति बहुधा ममैश्वर्यपरम्पराः । न तद् गणयितुं शक्यं सहस्रवदनेन वा ॥ ४८ ॥ शृण्वन्तु संग्रहाद्वक्ष्ये मदैश्वर्यस्य लेशतः । जगद्यात्रा विचित्रेयं सर्वतः संप्रसारिता ॥ ४९ ॥ ममज्ञानं बहुविधं द्वैताद्वैतादिभेदतः । परापरविभेदाच्च बहुधा चापि तत् फलम् ॥ ५० ॥ द्वैतज्ञानन्तु विविधं द्वितीयालम्बनं यतः । ध्यानमेव तु तत्प्रोक्तं स्वप्नराज्यादिसम्मितम् ॥ ५१ ॥ तच्चापि सफलं ज्ञेयं नियत्या नियतं यतः । अपरञ्चापि विविधं तत्र मुख्यं तदेव हि ॥ ५२ ॥ कर आत्मज्ञान प्राप्त करके मैं नित्यमुक्त होकर भी पुनः पुनः मुक्त होती हूँ। तथा किसी प्रकारकी साधनसामग्रीके बिना ही ऐसा संसार रच लेती हूँ ॥ ४६-४७ ॥ इसी प्रकार मेरी ऐश्वर्य-परम्परा अनेक प्रकारकी है। उसे सहस्र मुखवाले शेषजी भी नहीं गिन सकते ॥ ४८ ॥ सुनिये, संक्षेपसे बतलाती हूँ। मेरे ऐश्वर्यके लेशमात्रसे सब ओर यह अद्भुत जगद्व्यवहार फैला हुआ है ॥ ४९ ॥ द्वैत और अद्वैत आदि भेदसे मेरा ज्ञान भी अनेक प्रकार का है। तथा पर और अपर रूपसे उसके फल भी अनेकों प्रकारके हैं ॥ ५० ॥ द्वैत ज्ञान अनेकों प्रकारका है, क्योंकि उसका आश्रय कोई अन्य होता है। उसे ध्यान भी कहते हैं। यह स्वप्न और मनोराज्यके समान होता है ॥ ५१ ॥ किन्तु [ मनोराज्यके समान होनेपर भी ] उसे फलदायक ही समझना चाहिये, क्योंकि नियति (विधाता) का ऐसा ही विधान है। अपर ज्ञान यद्यपि अनेक प्रकारका है तथापि उनमें मुख्य वही है [ जो ऊपर श्लोक ३६-३७ में बतलाया गया है ] ॥ ५२ ॥