त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविंशोऽध्यायः । ३१५ प्रोक्तमुख्यापरमयं ध्यानं मुख्यफलक्रमम् । अद्वैतविज्ञानमेव परविज्ञानमीरितम् ॥ ५३ ॥ मामनाराध्य परमां चिरं विद्यां तु श्रीमतीम् । कथं प्राप्येत परमां विद्यामद्वैतसंज्ञिकाम् ॥ ५४ ॥ तदेवाद्वैतविज्ञानं केवला या परा चितिः । तस्याः शुद्धदशामर्शो द्वैतामर्शाभिभावकः ॥ ५५ ॥ चित्तं यदा स्वमात्मानं केवलं ह्यभिसम्पतेत् । तदेवानुविभातं स्याद्विज्ञानमृषिसत्तमाः ॥ ५६ ॥ श्रुतितो युक्तितो वापि केवलात्मविभासनम् । देहाद्यात्मावभासस्य नाशनं ज्ञानमुच्यते ॥ ५७ ॥ तदेव भवति ज्ञानं यज्ज्ञानेन तु किञ्चन । भासमानमपि क्वापि न विभायात् कथञ्चन ॥ ५८ ॥ तदेवाद्वैतविज्ञानं यद्विज्ञानेन किञ्चन । अविज्ञातं नैव भवेत् कदाचिल्लेशतोऽपि च ॥ ५९ ॥ ऊपर बतलाया हुआ वह अपर ब्रह्मका ध्यान मुख्य फल (मोक्ष) का परम्परा-साधन है। पर ज्ञान तो अद्वैतज्ञान ही कहा गया है ॥ ५३ ॥ मैं परमोत्कृष्ट श्रीविद्या हूँ। मेरी चिरकालतक आराधना किये बिना कोई अद्वैत नाम्नी पराविद्याको कैसे प्राप्त कर सकता है ॥ ५४ ॥ जो विशुद्ध पराचिति है वही अद्वैत ज्ञान है। उसके शुद्धस्वरूपका विचार ही द्वैतभावनाकी निवृत्ति करनेवाला है ॥ ५५ ॥ जिस समय चित्त केवल अपने आत्मा-स्वरूपकी ओर ही लगता है, मुनिवरो ! उसी समय उस विशुद्ध विज्ञानका साक्षात्कार होता है ॥५६॥ श्रुति और युक्ति के द्वारा विशुद्ध आत्माका अनुभव होना और देहा- दिमें आत्मभाव का अभाव हो जाना भी ज्ञान ही कहा जाता है ॥ ५७ ॥ ज्ञान तो वास्तवमें वही है जिसके होनेपर जो कुछ भासमान है वह कहीं भी तनिक भी नहीं भासता ॥ ५८ ॥ सच्चा अद्वैत ज्ञान वही है जिसके होनेपर फिर कभी, कुछ भा लेशमात्र भी अज्ञात नहीं रहता ॥ ५९ ॥