त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सर्वविज्ञानात्मरूपं यद्विज्ञानं भवेत् खलु । तदेवाऽद्वैतविज्ञानं परमं तापसोत्तमाः ॥ ६० ॥ जाते यादृशविज्ञाने संशयाश्चिरसम्भृताः । वायुनेवाभ्रजालानि विलीयन्ते परं हि तत् ॥ ६१ ॥ कामादिवासनाः सर्वा यस्मिन् सन्ति न किञ्चन । स्युर्भग्नदंष्ट्राहिरिव तद्विज्ञानं परं स्मृतम् ॥ ६२ ॥ विज्ञानस्य फलं सर्वदुःखानां विलयो भवेत् । अत्यन्ताभयसंप्राप्तिर्मोक्ष इत्युच्यते फलम् ॥ ६३ ॥ भयं द्वितीयसङ्कल्पादद्वैते विदिते दृढम् । कुतः स्याद् द्वैतसङ्कल्पस्तमः सूर्योदये यथा ॥ ६४ ॥ ऋषयो न भयं क्वापि द्वैतसङ्कल्पवर्जने । अतो यत् फलमन्यत् स्यात्तद्भयं सर्वथा भवेत् ॥ ६५ ॥ अन्तवत्तु द्वितीयं स्याद् भूयो लोके समीक्षणात् । श्रेष्ठ तपस्वियो ! जिस विज्ञानके द्वारा घट-पटादि सम्पूर्ण विज्ञान आत्मस्वरूप हो जाते हैं वही वास्तवमें परम अद्वैतविज्ञान है ॥ ६० ॥ जिस प्रकारका विज्ञान उत्पन्न होनेपर चिरकालसे पोषित सारे संशय वायुसे मेघमालाके समान लीन हो जाते हैं वही परविज्ञान है ॥ ६१ ॥ जिसके होनेपर कामादि सम्पूर्ण वासनाएँ कुछ भी नहीं रहतीं- रहती भी हैं तो दाँत तोड़े हुए सर्पके समान व्यर्थ हो जाती हैं, वही विज्ञान पर माना गया है ॥ ६२ ॥ इस विज्ञानका फल सम्पूर्ण दुःखोंकी निवृत्ति और पूर्ण निर्भयताकी प्राप्ति है। यह मोक्ष ही उसका फल कहा जाता है ॥ ६३ ॥ भय तो किसी दूसरेका संकल्प होनेपर होता है। और दृढ अद्वैतज्ञान होनेपर द्वैतका संकल्प हो कैसे सकता है ? जैसे सूर्योदय होनेपर नहीं हो सकता ॥ ६४ ॥ ऋषियो ! द्वैतका संकल्प छूट जानेपर फिर कहीं भय नहीं रहता। इसलिये जो फल आत्मस्वरूपसे भिन्न होगा वह तो सब प्रकार भय रूप ही होगा ॥ ६५ ॥ अपनेसे भिन्न जो भी पदार्थ होगा वह नाशवान् ही होगा, क्योंकि