त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तावज्ज्ञाता ज्ञानमपि ज्ञेयं वा न भवेत् क्वचित् । यदा भेदो विगलितो ज्ञात्रादीनां मिथः स्थितः ॥ ७३ ॥ तदा ज्ञात्रादिसम्पत्तिरेतदेव फलं स्मृतम् । ज्ञात्रादिफलपर्यन्तं न भेदो वस्तुतो भवेत् ॥ ७४ ॥ व्यवहारप्रसिद्ध्यर्थं भेदस्तत्र प्रकल्पितः । अतः पूर्वं लभ्यमत्र फलं नास्त्येव किञ्चन ॥ ७५ ॥ आत्मैव मायया ज्ञातृज्ञानज्ञेयफलात्मना । यावद्भाति भवेत्तावत् संसारो ह्यचलोपमः ॥ ७६ ॥ यथा कथञ्चिदेतत्तु भायाद्भेदविवर्जितम् । संसारो विलयं यायाच्छिन्नाभ्रमिव वायुना ॥ ७७ ॥ एवंविधमहामोक्षे तत्परत्वं हि साधनम् । तत्परत्वे तु संपूर्गे नान्यत् साधनमिष्यते ॥ ७८ ॥ और ज्ञेयका भेद भासता है तबतक तो वास्तवमें वे ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय हैं ही नहीं। जिस समय इन ज्ञाता आदिका पारस्परिक भेद गलित हो जाता है तभी वास्तवमें वे ज्ञाता आदि होते हैं। और यही इस ज्ञानका फल भी माना गया है ॥ ७३-७४ पू० ॥ वास्तवमें ज्ञातासे लेकर फलपर्यन्त१ कोई भेद है ही नहीं, केवल व्यवहारकी सिद्धिके लिये ही इनमें भेद-कल्पना कर लिया गया है। अतः इस भेदकल्पनासे पूर्व यहाँ प्राप्त करने योग्य कोई फल भी नहीं है ॥ ७४ उ०-७५ ॥ जबतक मायासे यह आत्मा ही ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय और फल- रूपसे भास रहा है, तब तक तो यह संसार पर्वतके समान खड़ा हुआ है ॥ ७६ ॥ किन्तु किसी भी प्रकार यदि यह भेदहीन भासने लगे तो वायुसे छिन्न-भिन्न हुए बादलकी तरह सारा 'संसार लीन हो जाता है ॥ ७७ ॥ इस प्रकारका महामोक्ष प्राप्त करनेके लिये तत्परता ही मुख्य साधन है। यदि पूरी तत्परता हो तो फिर किसी अन्य साधनकी अपेक्षा नहीं होती ॥ ७८ ॥ १. अर्थात् ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय और फलमें।