त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविशोऽध्यायः। ३१६ अपूर्णे तत्परत्वे तु किं सहस्रसुसाधनैः । तस्मात्तात्पर्यमेव स्यान्मुख्यं मोक्षस्य साधनम् ॥ ७९ ॥ तात्पर्यं सर्वथैतत्तु साधयामीति संस्थितिः । यस्तात्पर्येण संयुक्तः सर्वथा मुक्त एव सः ॥ ८० ॥ दिनैर्मासैर्वत्सरैर्वा मुक्तः स्याद्वाऽन्यजन्मनि । बुद्धिनैर्मल्यभेदेन चिरशीघ्रव्यवस्थितिः ॥ ८१ ॥ बुद्धौ तु बहवो दोषाः सन्ति सर्वार्थनाशनाः । यैर्जनाः सततन्त्वेवं पच्यन्ते घोरसंसृतौ ॥ ८२ ॥ तत्राद्यः स्यादनाश्वासो द्वितीयः कामवासना । तृतीयो जाड्यता प्रोक्ता त्रिधैवं दोषसंग्रहः ॥ ८३ ॥ द्विविधः स्यादनाश्वासः संशयश्च विपर्ययः । मोक्षोऽस्ति नास्ति वेत्याद्यः संशयः समुदाहृतः ॥ ८४ ॥ यदि तत्परता पूरी न हो तो अन्य हजारों साधनोंसे भी क्या लाभ ? अतः तत्परता ही मोक्षका मुख्य साधन है ॥ ७९ ॥ ‘जैसे भी होगा इस कार्यको अवश्य पूर्ण करूँगा’ इस स्थितिका नाम ही तत्परता है। जो तत्परतासे युक्त है वह तो सब प्रकार मुक्त ही है ॥ ८० ॥ वह कुछ दिनोंमें, महीनोंमें, वर्षोंमें अथवा दूसरे जन्ममें मुक्त हो ही जायगा। बुद्धिकी निर्मलताके भेदसे ही उसके शीघ्र या देरीसे मुक्त होनेकी व्यवस्था समझनी चाहिये ॥ ८१ ॥ बुद्धिमें तो सब प्रकारके पुरुषार्थको विफल कर देनेवाले अनेकों दोष होते हैं, जिनके कारण लोग निरन्तर इसी तरह जन्ममरण- रूप भयंकर संसाराग्निमें जलते रहते हैं ॥ ८२ ॥ उनमें पहला दोष है अनाश्वास (अविश्वास), दूसरी है काम- वासना और तीसरी है जडता। इस प्रकार संक्षेपसे तीन प्रकारके दोष हैं ॥ ८३ ॥ अनाश्वास दो प्रकारका है—संशय और विपर्यय। मोक्ष है भी या नहीं—यह पहला संशय दोष कहा गया है ॥ ८४ ॥