भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 334

३२० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे नास्त्येव मोक्ष इत्याद्यो भवेदत्र विपर्ययः । एतद् द्वयन्तु तात्पर्ये मुख्यं स्यात् प्रतिबन्धकम् ॥ ८५ ॥ विपरीतनिश्चयेन नश्येदेतद् द्वयं क्रमात् । अत्रोपायो मुख्यतमो मूलोच्छेदो न चापरः ॥ ८६ ॥ अनाश्वासस्य मूलन्तु विरुद्धतर्कचिन्तनम् । तत्परित्यज्य सत्तर्कावर्धनस्य प्रसाधने ॥ ८७ ॥ विपरीतो निश्चयः स्यान्मूलोच्छेदनपूर्वकः । ततः श्रद्धासमुदयादनाश्वासः प्रणश्यति ॥ ८८ ॥ कामादिवासना बुद्धेः श्रवणे प्रतिबन्धिका । कामादिवासनाविष्टा बुद्धिर्नैव प्रवर्त्तते ॥ ८९ ॥ लोकेऽपि कामी काम्यस्य सदा ध्यानैकतत्परः । पुरःस्थितं न पश्येच्च श्रोत्रोक्तं शृणुयान्न च ॥ ९० ॥ मोक्ष है ही नहीं—यह मुख्य विपर्यय दोष है। ये दोनों दोष तत्परताके प्रधान प्रतिबन्धक हैं ॥ ८५ ॥ इससे विपरीत निश्चय करनेसे क्रमशः ये दोनों दोष निवृत्त हो जाते हैं। किन्तु इनकी निवृत्तिका मुख्यतम उपाय तो इनके मूलका नाश कर देना ही है, कोई अन्य नहीं ॥ ८६ ॥ अनाश्वासका मूल है शास्त्रविरुद्ध तर्कोंका चिन्तन करना। उसे त्यागकर यदि शास्त्रानुसारी तर्कोंका आश्रय लिया जाय तो विपरीत निश्चय मूलोच्छेदनपूर्वक नष्ट हो जायगा। तब श्रद्धाका उदय होगा और अनाश्वास नष्ट हो जायगा ॥ ८७-८८ ॥ कामादि वासनाएँ बुद्धिके श्रवणमें प्रतिबन्ध डालने वाली हैं; क्योंकि जो बुद्धि कामादि वासनाओंसे भरी होती है वह तात्त्विक विषयको ग्रहण नहीं कर पाती ॥ ८९ ॥ लोकमें भी देखा जाता है कि कामनायुक्त पुरुष सर्वदा अपने काम्य विषयके चिन्तनमें ही लगा रहता है। वह सामने रखी वस्तु-को भी देख नहीं पाता और कानमें कही हुई बातको भी सुन नहीं पाता ॥ ९० ॥