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त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

३२० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे नास्त्येव मोक्ष इत्याद्यो भवेदत्र विपर्ययः । एतद् द्वयन्तु तात्पर्ये मुख्यं स्यात् प्रतिबन्धकम् ॥ ८५ ॥ विपरीतनिश्चयेन नश्येदेतद् द्वयं क्रमात् । अत्रोपायो मुख्यतमो मूलोच्छेदो न चापरः ॥ ८६ ॥ अनाश्वासस्य मूलन्तु विरुद्धतर्कचिन्तनम् । तत्परित्यज्य सत्तर्कावर्धनस्य प्रसाधने ॥ ८७ ॥ विपरीतो निश्चयः स्यान्मूलोच्छेदनपूर्वकः । ततः श्रद्धासमुदयादनाश्वासः प्रणश्यति ॥ ८८ ॥ कामादिवासना बुद्धेः श्रवणे प्रतिबन्धिका । कामादिवासनाविष्टा बुद्धिर्नैव प्रवर्त्तते ॥ ८९ ॥ लोकेऽपि कामी काम्यस्य सदा ध्यानैकतत्परः । पुरःस्थितं न पश्येच्च श्रोत्रोक्तं शृणुयान्न च ॥ ९० ॥ मोक्ष है ही नहीं—यह मुख्य विपर्यय दोष है। ये दोनों दोष तत्परताके प्रधान प्रतिबन्धक हैं ॥ ८५ ॥ इससे विपरीत निश्चय करनेसे क्रमशः ये दोनों दोष निवृत्त हो जाते हैं। किन्तु इनकी निवृत्तिका मुख्यतम उपाय तो इनके मूलका नाश कर देना ही है, कोई अन्य नहीं ॥ ८६ ॥ अनाश्वासका मूल है शास्त्रविरुद्ध तर्कोंका चिन्तन करना। उसे त्यागकर यदि शास्त्रानुसारी तर्कोंका आश्रय लिया जाय तो विपरीत निश्चय मूलोच्छेदनपूर्वक नष्ट हो जायगा। तब श्रद्धाका उदय होगा और अनाश्वास नष्ट हो जायगा ॥ ८७-८८ ॥ कामादि वासनाएँ बुद्धिके श्रवणमें प्रतिबन्ध डालने वाली हैं; क्योंकि जो बुद्धि कामादि वासनाओंसे भरी होती है वह तात्त्विक विषयको ग्रहण नहीं कर पाती ॥ ८९ ॥ लोकमें भी देखा जाता है कि कामनायुक्त पुरुष सर्वदा अपने काम्य विषयके चिन्तनमें ही लगा रहता है। वह सामने रखी वस्तु-को भी देख नहीं पाता और कानमें कही हुई बातको भी सुन नहीं पाता ॥ ९० ॥

विंशोऽध्यायः । ३२१ कामादिवासितस्यैवं श्रुतं चाश्रुतसम्मितम् । कामादिवासनां तस्माज्जयेद्वैराग्यसम्पदा ॥ ९१ ॥ सन्ति कामक्रोधमुखा वासनास्तु सहस्रशः । तत्र कामो मूलभूतस्तन्नाशे न हि किञ्चन ॥ ९२ ॥ ततो वैराग्यसंयोगान्नाशयेत् कामवासनाम् । आशा हि कामः संप्रोक्त एतन्मे स्यादिति स्थिता ॥ ९३ ॥ शक्येषु स्थूलभूता सा सूक्ष्माऽशक्येषु संस्थिता । दृढवैराग्ययोगेन सर्वां तां प्रविनाशयेत् ॥ ९४ ॥ तत्र मूलं काम्यदोषपरामर्शः प्रतिक्षणम् । वैमुख्यं विषयेभ्यश्च वासना नाशयेदिति ॥ ९५ ॥ यस्तृतीयो बुद्धिदोषो जाड्यरूपो व्यवस्थितः । असाध्यः सोऽभ्यासमुखैः सर्वथा ऋषिसत्तमाः ॥ ९६ ॥ येन तात्पर्यतश्चापि श्रुतं बुद्धिमनारुहेत् । अतः जिसका चित्त कामादि वासनाओंसे भरा है उसका शास्त्र- श्रवण तो न सुननेके ही समान है। अतः वैराग्यरूप सम्पत्तिसे कामादि वासनाओंको वशमें करे ॥ ६१ ॥ काम-क्रोधादि वासनाएँ तो हजारों हैं। उनमें काम सबका मूल है। उसका नाश होनेपर कोई वासना नहीं रहती ॥ ६२ ॥ अतः वैराग्यकी सहायतासे कामवासनाको नष्ट करे। आशा ही काम कही जाती है, जो 'मुझे यह मिल जाय' इस रूपमें रहती है॥६३॥ जो पदार्थ प्राप्त हो सकते हैं उनमें वह स्थूल रूपमें रहती है और जिनकी प्राप्ति नहीं हो सकती उनमें सूक्ष्म रूपसे । उस सभी प्रकारकी आशाको दृढ वैराग्यके द्वारा नष्ट कर देना चाहिये ॥ ६४ ॥ उसका मूल साधन है प्रतिक्षण काम्य · वस्तुओंका दोषचि- न्तन। विषयोंसे विमुखता रहेगी तो वह उनकी वासनाओंको नष्ट कर देगी ॥ ६५ ॥ बुद्धिका जडतारूप जो तीसरा दोष है, मुनिवरो ! उसे अभ्या- सादिके द्वारा निवृत्त करना तो सर्वथा असम्भव है ॥ ६६ ॥ जिसके कारण तत्परतापूर्वक सुनीहुई बात भी बुद्धिमें नहीं

३२२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तज्जाड्यं हि महान् दोषः पुरुषार्थविनाशनः ॥ ९७ ॥ तत्रात्मदेवतासेवामृते नान्यद्धि कारणम् । सेवायास्तारतम्येन जाड्यं तस्य हराम्यहम् ॥ ९८ ॥ जाड्याल्पानल्पभावेन सद्यो वा परजन्मनि । भवेत्तस्य फलप्राप्तिर्जाड्यसंयुक्तचेतसः ॥ ९९ ॥ सर्वसाधनसम्पत्तिर्ममैव प्रणिधानतः । उपयाति च यो भक्त्या सर्वदा मामकैटवात् ॥ १०० ॥ स साधनप्रत्यनीकं विधूयाशु कृती भवेत् । यस्तु मामीश्वरीं सर्वबुद्धिप्रसरकारिणीम् ॥ १०१ ॥ अनादृत्य साधनैकपरः स्यान्मूढभावतः । पदे पदे विहन्येत फलं प्राप्येत वा न वा ॥ १०२ ॥ तस्मात्तु ऋषयो मुख्यं तात्पर्यं साधनं भवेत् । एवं तात्पर्यवानेव साधकः परमः स्मृतः ॥ १०३ ॥

बैठती वह जडतारूप महान् दोष सभी पुरुषार्थोंको व्यर्थ कर देने- वाला है ॥ ९७ ॥ उसकी निवृत्तिका उपाय तो परमात्मदेवकी उपासनाके सिवा और कोई नहीं है। साधककी उपासनाकी न्यूनाधिकताके अनुसार मैं उसकी जडता दूर कर देती हूँ ॥ ९८ ॥ उस जडचित्तवाले साधकको उसकी जडताकी न्यूनता या अधिकताके अनुसार उसी अथवा अगले जन्ममें फलकी प्राप्ति हो जाती है ॥ ९९ ॥ सब प्रकारके साधनोंकी पूर्णता मेरी उपासनासे ही होती है। जो सर्वदा निश्छल भावसे भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करता है वह साध- नके सभी विघ्नोंको पार करके कृतकृत्य हो जाता है ॥१००-१०१ पू०॥ जो सभीकी बुद्धियोंको प्रवृत्त करनेवाली मुझ भगवतीका अनादर करके मूढ चित्तसे केवल साधनमें लगा रहता है वह पद-पदमें ठोकर खाता है और उसे फल की प्राप्ति हो भी सकती है और नहीं भी ॥ १०१ उ०-१०२ ॥ इसलिये ऋषियो ! मुख्य साधन तो तत्परता ही है। इस प्रकार जो तत्परता-सम्पन्न है वही श्रेष्ठ साधक माना जाता है। उनमें भी

विंशोऽध्यायः । ३२३ तत्र मद्भक्तियुक्तस्तु साधकः सर्वपूजितः । सिद्धिरात्मव्यवस्थितिर्देहानात्मत्वभावना ॥ १०४ ॥ आत्मत्वभावनं नूनं शरीरादिषु संस्थितम् । तदभावनमात्रन्तु सिद्धिमौढ्यविवर्जितम् ॥ १०५ ॥ आत्मा व्यवसितः सर्वैरपि नो केवलात्मना । अतएव तु सम्प्राप्ता महानर्थपरम्परा ॥ १०६ ॥ तस्मात् केवलचिन्मात्रं यद्देहाद्यवभासकम् । तन्मात्रात्मव्यवस्थितिः सर्वसंशयनाशिनी ॥ १०७ ॥ सिद्धिरित्युच्यते प्राज्ञैर्नान्तः सिद्धिरनन्तरा । सिद्धयः खेचरत्वाद्या अणिमाद्यास्तथैव च ॥ १०८ ॥ आत्मविज्ञानसिद्धेस्तु कलां नार्हन्ति षोडशीम् । ताः सर्वास्तु परिच्छिन्नाः सिद्धयो देशकालतः ॥ १०९ ॥ इयं स्यादपरिच्छिन्ना स्वात्मविद्या शिवात्मिका । जो साधक मेरी भक्तिसे युक्त होता है वह तो सभी का आदरणीय होता है ॥ १०३-१०४ पू० ॥ देहमें अनात्मत्वकी भावना और आत्मामें स्थिति—इसका नाम ही सिद्धि है । शरीरादिमें जो आत्मत्व-भावना हो रही है उसका अभाव हो जाना ही अज्ञानसे रहित सिद्धि है ॥ १०४ उ०-१०५ ॥ सभी लोगोंसे आत्माका शुद्धरूपसे निश्चय किया हुआ नहीं है । इसीसे यह जन्म-मरणरूप महान् अनर्थ-परम्परा प्राप्त हुई है ॥ १०६ ॥ अतः जो शुद्ध चिन्मात्र देहादि दृश्यवर्गोंको प्रकाशित करने- वाला है केवल तद्रूपसे ही स्थित रहना—इस सम्पूर्ण संशयों- को नष्ट कर देनेवाली स्थितिको ही विज्ञजनोंने सिद्धि कहा है । इससे भिन्न आकाशगमनादि और अणिमादि सिद्धियाँ वास्तविक सिद्धि नहीं हैं ॥ १०७-१०८ ॥ वे सब सिद्धियाँ तो देश और कालसे परिच्छिन्न हैं । अतः वे आत्म- ज्ञानरूपा सिद्धिके तो सोलहवें अंशके बराबर भी नहीं हैं ॥ १०६ ॥ यह शिवस्वरूपा आत्मविद्या तो अपरिच्छिन्न है । वे सब तो

३२४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे स्वात्मविद्यासाधनेषु ताः सर्वाः सुप्रतिष्ठिताः ॥ ११० ॥ आत्मविद्याविधावेतास्त्वन्तरायप्रयोजकाः । किं ताभिरिन्द्रजालात्मसिद्धितुल्याभिरीहितम् ॥ १११ ॥ यस्य साक्षाद् ब्रह्मपदमपि स्यात्तृणसम्मितम् । कियन्त्येताः सिद्धयो वै कालक्षेपणहेतवः ॥ ११२ ॥ तस्मात् सिद्धिर्नेतरा स्यादात्मविज्ञानसिद्धितः । ययाऽत्यन्तशोकनाशो भवेदानन्दसान्द्रता ॥ ११३ ॥ सैव सिद्धिर्नेतरा तु मृत्युग्रासविमोचिनी । इयमात्मज्ञानसिद्धिर्विविधाऽभ्यासभेदतः ॥ ११४ ॥ बुद्धिर्नैर्मल्यभेदाच्च परिपाकविभेदतः । संक्षेपतस्तु त्रिविधा चोत्तमा मध्यमाऽधमा ॥ ११५ ॥ लोके द्विजानामृषयः पठिता श्रुतिसम्मिता । मेधया च महाभ्यासाद्व्यापारशतसङ्कुला ॥ ११६ ॥ आत्मज्ञानके साधनोंमें ही प्रतिष्ठित हैं। [ अर्थात् साधन करते-करते वे स्वयं ही आ जाती हैं ] ॥ ११० ॥ किन्तु वे आत्मज्ञानकी प्राप्तिमें तो विघ्न करनेवाली हैं, भला जिज्ञासुको इन्द्रजालिकके चमत्कारों-जैसी उन सिद्धियोंसे क्या लेना है ॥ १११ ॥ जिसकी दृष्टिमें साक्षात् ब्रह्माका पद भी तृणके समान है उसके लिये केवल समय काटनेमें उपयोगी इन सिद्धियोंका क्या मूल्य है ? ॥ ११२ ॥ अतः आत्मविज्ञानरूपा सिद्धिसे बढ़कर और कोई सिद्धि नहीं है, जिससे कि शोकका सर्वथा नाश और आनन्दघनताकी प्राप्ति हो जाती है ॥ ११३ ॥ कालके गालसे बचानेवाली भी केवल वही सिद्धि है, कोई अन्य नहीं। अभ्यास, बुद्धिकी शुद्धि और ज्ञानकी पुष्टिके तारतम्यसे यह आत्म- ज्ञानरूपा सिद्धि अनेक प्रकारकी है। किन्तु ऋषियो ! लोकमें ब्राह्मण द्वारा पढ़ी हुई श्रुतिके समान यह तीन प्रकार की है—उत्तम, मध्यम और अधम ॥ ११४-११६ पू० ॥ बुद्धिकी प्रखरता और अत्यन्त अभ्यासके कारण जिस श्रुतिके

विंशोऽध्यायः। १२५ अप्यस्खलितवर्णा या पठिता श्रुतिरुत्तमा । समाहितस्य व्यापारेऽसमाहितस्य चान्यदा ॥ ११७ ॥ पूर्ववद्याऽप्यस्खलिता पठिता मध्यमा श्रुतिः । या सदा ह्यनुसन्धानयोगादेव भवेत्तथा ॥ ११८ ॥ पठिता श्रुतिरत्यन्तास्खलिता मध्यमा हि सा । एवमेवात्मविज्ञानसिद्धिरुक्ता त्रिधर्षयः ॥ ११९ ॥ या महाव्यवहारेषु प्रतिसन्धानवर्जने । अन्यदा तद्वर्जने वा सर्वदा प्रतिसन्धितः ॥ १२० ॥ अन्यूनाधिकभावा स्यात् सोत्तमा मध्यमाऽधमा । अत्रोत्तमैव संसिद्धेः पराकाष्ठा निरूपिता ॥ १२१ ॥ स्वप्नादिष्वप्यवस्थासु यदा स्यात् परमा स्थितिः । विचारक्षणतुल्येव सिद्धिः सा परमोत्तमा ॥ १२२ ॥


पाठमें सैकड़ों व्यापारोंके रहते हुए भी वर्ण या स्वरमें अन्तर नहीं आता वह उत्तम श्रुति है ॥ ११६ उ०-११७ पू० ॥ व्यापारके समय समाहित ( सावधान ) रहनेपर और अन्य समय ( व्यापारका झंझट न होनेपर ) समाहित न रहनेपर भी जो पहले ही की तरह अस्खलितरूपसे पढ़ी जा सकती है वह मध्यम श्रुति है ॥ ११७ उ०-११८ पू० ॥ जो सर्वदा अनुसन्धानपूर्वक ही पढ़ी जाती है और जिसमें बहुत-सी भूलें भी रहती हैं वह अधमा श्रुति है ॥ ११८ उ०-११९ पू० ॥ ऋषियो ! उसी प्रकार आत्मविज्ञानकी सिद्धि भी तीन प्रकारकी कही गयी है । जो बहुत अधिक व्यवहार होनेपर अथवा अनुसन्धान न करनेपर भी रहती है वह उत्तम, जो व्यापार न रहनेपर ही स्वभावसिद्ध है वह मध्यम और जो सर्वदा आत्मानुसन्धान करते रहनेपर ही न्यूनाधिक भावसे रहित रहती है वह अधम सिद्धि है । इनमें उत्तम ही सिद्धिकी पराकाष्ठा कही गयी है ॥ ११९ उ०-१२१ ॥ जिस समय स्वप्नादि अवस्थाओंमें भी विचारकालकी तरह ही उत्तम स्थिति रहे वह सिद्धि परम उत्तम मानी गयी है ॥ १२२ ॥

३२६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सर्वत्र व्यवहारेषु यत्नात् संस्कारबोधतः । यदा प्रवृत्तिस्सिद्धेः सा पराकाष्ठा समीरिता ॥ १२३ ॥ अयत्नेनैव परमे स्थितिः संवेदनात्मनि । अव्याहता यदा सिद्धिस्तदा काष्ठां समागता ॥ १२४ ॥ व्यवहारपरो भावान् पश्यन्नपि न पश्यति । द्वैतं तदा हि सा सिद्धिः पूर्णतामभिसङ्गता ॥ १२५ ॥ जागरादौ व्यवहरन्नपि निद्रितवद्यदा । स्थितिस्तदा हि सा सिद्धिः पूर्णतामभिसङ्गता ॥ १२६ ॥ एवं सिद्धिमनुप्राप्तः सिद्धेषूत्तम उच्यते । व्यवहारपरो नित्यं न समाधिं विमुञ्चति ॥ १२७ ॥ कदाचिदपि मेधावी स सिद्धेषूत्तमो मतः । ज्ञानिनां विविधानां च स्थितिं जानाति सर्वदा ॥ १२८ ॥ स्वानुभूत्या स्वान्तरेव स सिद्धेषूत्तमो मतः । संशयो वापि कामो वा यस्य नास्त्येव लेशतः ॥ १२९ ॥ जिस समय पूर्व-संस्कार उदित होनेपर सब व्यवहारोंमें प्रयत्न करनेपर प्रवृत्ति हो उसे सिद्धिकी पराकाष्ठा कहा है ॥ १२३ ॥ तथा बिना प्रयत्न ही ज्ञानस्वरूप परमतत्त्वमें निरन्तर स्थिति रहे तब सिद्धिकी पराकाष्ठा हो जाती है ॥ १२४ ॥ जिस समय व्यवहारमें लगे रहनेपर भी विभिन्न वस्तुओंको और द्वैतको देखते हुए भी नहीं देखता तो उस समय वह उत्तमा सिद्धि पूर्णताको प्राप्त हो जाती है। जब जाग्रत आदि अवस्थाओंमें व्यवहार करते हुए भी सोये हुएके समान रहे तब ही वह सिद्धि पूर्णताको प्राप्त होती है। इस प्रकारकी सिद्धिको प्राप्त हुआ पुरुष सिद्धोंमें श्रेष्ठ कहा जाता है ॥ १२५-१२७ पू० ॥ जो निरन्तर व्यवहारमें लगा रहनेपर भी कभी समाधिको नहीं छोड़ता वह सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ १२७ उ०-१२८ पू० ॥ जो अपने अनुभवके द्वारा अपनी ही तरह अन्य ज्ञानियोंकी विभिन्न स्थितियोंको भी सर्वदा जान लेता है वह सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ १२८ उ०-१२६ पू० ॥ जिसे लेशमात्र भी संशय या कामना नहीं है तथा व्यव-

विंशोऽध्यायः । ३२७ निर्भयो व्यवहारेषु स सिद्धेषूत्तमो मतः । सर्वं सुखञ्च दुःखञ्च व्यवहारञ्च जागतम् ॥ १३० ॥ स्वात्मन्येवाभिजानाति स सिद्धेषूत्तमो मतः । अत्यन्तं बद्धमात्मानं मुक्तञ्चापि प्रपश्यति ॥ १३१ ॥ यः स्वात्मनि तु सर्वात्मा स सिद्धेषूत्तमो मतः । यः पश्यन् बन्धजालानि सर्वदा स्वात्मनि स्फुटम् ॥ १३२ ॥ मोक्षं नापेक्षते क्वापि स सिद्धेषूत्तमो मतः । सिद्धोत्तमोऽहमेवेह न भेदस्त्वावयोः क्वचित् ॥ १३३ ॥ एतद्वो ऋषयः प्रोक्तं सुस्पष्टमनुयुक्त्या । एतन्मयोक्तं विज्ञाय न क्वचित् परिमुह्यते ॥ १३४ ॥ इत्युक्ता सा परा विद्या विरराम भृगूद्वह । श्रुत्वैतदृषयः सर्वे सन्देहमपहाय च ॥ १३५ ॥ हारमें किसी प्रकारका भय नहीं है वह सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ १२६ उ०-१३० पू० ॥ जो सम्पूर्ण सुख, दुःख और संसारके व्यवहारको अपने आत्मा- में ही भासमान समझता है वह सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ १३० उ०-१३१ पू० ॥ जो अत्यन्त बद्ध और मुक्त पुरुषको भी अपने स्वरूपमें ही देखता है वह सर्वात्मा सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ १३१ उ०-१३२ पू० ॥ जो सम्पूर्ण बन्धनोंको भी सर्वदा स्पष्टतया अपने आत्मस्वरूपमें ही भासमान देखनेके कारण कभी मोक्षकी भी इच्छा नहीं करता वह सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ १३२ उ०-१३३ पू० ॥ अधिक क्या वह श्रेष्ठ सिद्ध मैं ही हूँ। मेरा और उसका कभी कोई अन्तर नहीं है। ऋषियो ! यह मैंने तुम्हारे प्रश्नोंका स्पष्ट उत्तर दे दिया। मेरे इस कथन को ठीक-ठीक समझ लेनेपर फिर मोह नहीं होता ॥ १३३ उ०-१३४ ॥ भृगुनन्दन ! ऐसा कहकर वह परा विद्या मौन हो गयी। उसका उपदेश सुनकर सभी ऋषियोंका सन्देह दूर हो गया तथा वे

३२८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे नत्वा शिवादीन् लोकेशान् जग्मुः स्वं स्वं निवेशनम् । विद्यागीता मयैषा ते प्रोक्ता पापौघनाशिनी ॥ १३६ ॥ श्रुता विचारिता सम्यक् स्वात्मसाम्राज्यदायिनी । विद्यागीताऽत्युत्तमेयं साक्षाद्विद्या निरुपिता ॥ १३७ ॥ पठतां प्रत्यहं प्रीता ज्ञानं दिशति सा स्वयम् । संसारतिमिराम्भोधौ मज्जतां तरणिर्भवेत् ॥ १३८ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे विद्यागीतानाम विंशतितमोऽध्यायः । शिव आदि देवगणोंको नमस्कार कर अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ १३५-१३६ पू० ॥ यह मैंने तुम्हें सम्पूर्ण पापसमूहका नाश करनेवाली विद्यागीता सुनायी। इसका यदि अच्छी तरह श्रवण और विचार किया जाय तो वह स्वात्मानन्दरूप साम्राज्य प्रदान करनेवाली है ॥ १३६ उ०-१३७ पू० ॥ यह अति उत्तम विद्यागीता साक्षात् विद्यादेवीकी ही कही हुई है। जो लोग इसका प्रतिदिन पाठ करते हैं उन्हें प्रसन्न होकर वह स्वयं ज्ञान प्रदान कर देती हैं। इस संसाररूप अन्धकारके समुद्रमें डूबने- वालोंके लिये यह सूर्य या नौकाके समान है ॥ १३७ उ०-१३८ ॥ विंश अध्याय समाप्त । १. यहाँ मूलमें 'तरणि' शब्द है। इसका अर्थ 'सूर्य' भी है और 'नौका' भी। अन्धकारसे पार होनेसे सूर्य और समुद्रसे पार होनेमें नौका उपयोगी है। अतः इसके दोनों ही अर्थ सार्थक हैं। शब्दश्लेषका यह सुन्दर उदाहरण है।

एकविंशतितमोऽध्यायः श्रुत्वेत्थं भार्गवो रामो दत्तात्रेयमुनेरितम् । अविद्याजालविभ्रान्तेर्मुक्तप्रायो बभूव ह ॥ १ ॥ पुनः पप्रच्छाऽत्रिसुतं किञ्चिन्नत्वा सुभक्तितः । भगवन् ब्रूहि विज्ञानसाधनं सुनिश्चितम् ॥ २ ॥ सारभूतञ्च सुलभं यत् साक्षात् फलदायकम् । ज्ञानिनां लक्षणञ्चापि येन ज्ञास्यामि तान् द्रुतम् ॥ ३ ॥ ज्ञानिनां देहसंयोगे वियोगे च स्थितिं यथा । व्यवहारं कुर्वतां चाप्यनासक्तं मनः कथम् ॥ ४ ॥ एतत् सर्वं सुकृपया स्पष्टं मे वक्तुमर्हसि । एवमत्रिसुतः पृष्टो जमदग्निसुतेन वै ॥ ५ ॥ सन्तुष्टः प्राह करुणासिन्धुः सम्बोध्य भार्गवम् । शृणु राम प्रवक्ष्यामि रहस्यं ज्ञानसाधनम् ॥ ६ ॥ एकविंशतितमोऽध्यायः ॥ २१ ॥ ज्ञानके मुख्य साधन, ज्ञानियोंके लक्षण तथा हेमाङ्गद और ब्रह्मराक्षसका संवाद इस प्रकार भृगुनन्दन परशुराम दत्तात्रेयजीका उपदेश सुनकर अवि- द्याजालरूप भ्रमसे प्रायः मुक्त हो गये ॥ १ ॥ फिर अत्यन्त भक्तिपूर्वक नमस्कार कर उन्होंने अत्रिनन्दन दत्ता- त्रेयजीसे इस प्रकार कुछ प्रश्न किया, "भगवन् ! ज्ञानप्राप्तिके अत्यन्त निश्चित और सारभूत साधन बताइये, जो सुलभ भी हों और साक्षात् मोक्षरूप फल प्रदान करनेवाले हों । साथ ही ज्ञानियों के लक्षण भी बतलाइये, जिनसे मैं उन्हें तत्काल पहचान सकूँ ॥ २-३ ॥ देहका अनुसन्धान रहने और न रहनेके समय उनकी जैसी स्थिति रहती है तथा व्यवहार करते समय भी किस प्रकार उनका मन उसमें आसक्त नहीं होता—कृपया ये सभी बातें मुझे स्पष्टतया बतलाइये" ॥ ४-५ पू० ॥ परशुरामके इस प्रकार प्रश्न करनेपर करुणासागर दत्तात्रेयजी बड़े प्रसन्न हुए और उन्हें सम्बोधन करके कहने लगे—"परशुराम ! सुनो, मैं तुम्हें ज्ञानके गुप्त साधन बतलाता हूँ ॥ ५ उ०-६ ॥

३३० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्ड ज्ञानस्य साधनं मुख्यं देवतानुग्रहः परः । यः सर्वभावतः स्वात्मदेवतामुपसङ्गतः ॥ ७ ॥ तस्य ज्ञानं सुसुलभं भवतीति विनिश्चयः । एतत् सर्वोत्तमं राम प्रोक्तं ज्ञानस्य साधनम् ॥ ८ ॥ अन्यानपेक्षमेतत्तु फलसंसाधने क्षमम् । एतद्विहायान्यदत्र न सम्यक् फलदं भवेत् ॥ ९ ॥ शृण्वत्र कारणं राम सकारणमिदं भवेत् । विज्ञानं केवलचितिर्या सर्वस्यावभासिका ॥ १० ॥ तस्यावभासरूपायाः कल्पितावरणन्तु यत् । विचारात्तदपोहेन तत् स्वरूपोपलक्षणम् ॥ ११ ॥ तच्चान्येषां बहिर्भावतत्पराणां सुदुर्लभम् । भक्तानामन्यपरताहानेन तत्परत्वतः ॥ १२ ॥ सुलभं शीघ्रसम्प्राप्यं भवत्येव सुनिश्चितम् । परमात्मदेवका परम अनुग्रह ज्ञानका मुख्य साधन है। जो पुरुष सम्पूर्ण भावसे परमात्मदेवकी शरण ग्रहण करता है उसे ज्ञान सुलभ हो जाता है—यह बात निश्चित है। अतः परशुराम ! यही ज्ञानका सर्वोत्तम साधन कहा है ॥ ७-८ ॥ यह साधन किसी अन्य साधनकी सहायताके बिना ही ज्ञानका फल प्राप्त करानेमें समर्थ है। और यदि यह न हो तो अन्य कोई साधन ठीक-ठीक फल प्रदान नहीं कर सकता ॥ ६ ॥ इसका जो कारण है वह सुनो, क्योंकि यह बात सकारण है। वास्तवमें ज्ञान शुद्ध चेतन ही है, जो सभीका प्रकाशक है ॥ १० ॥ उस प्रकाशरूप चेतनका जो कल्पित आवरण है, विचार द्वारा उसकी निवृत्ति हो जानेपर उसका स्वरूप लक्षित हो जाता है ॥ ११ ॥ किन्तु अन्य साधकोंको, जो कि बाह्य व्यापारोंमें लगे रहते हैं, ऐसा होना बहुत कठिन है। भक्तोंमें तो अन्यपरायणता होती नहीं और वे भगवत्परायण भी होते ही हैं, इसलिये उनको वह शीघ्र और सुगमतासे प्राप्त हो सकता है—यह बात सर्वथा निश्चित है ॥ १२-१३ पू० ॥

एकविंशतितमोऽध्यायः । ३३१ देवतातत्परस्त्वेव भूत्वा स्वल्पान्यसाधनः ॥ १३ ॥ ज्ञात्वा कथञ्चिदात्मानमन्यान् प्रति निरूपयेत् । निरूपयन् सदा राम समावेशं समाप्नुयात् ॥ १४ ॥ एवं निरूपणाद्यैस्तु समावेशे दृढे सति । शिवतामाप्य तच्चित्तं हर्षोद्वेगविवर्जितम् ॥ १५ ॥ यत्र यत्र व्रजति तत् सर्वं तच्छिवसात्कृतम् । करोत्युत्तमविज्ञानी जीवन्मुक्तपदस्थितः ॥ १६ ॥ तस्मात् सुभक्तियोगेनान्येभ्यो भूयो निरूपणम् । श्रेष्ठं साधनमेतत्तु नान्यदेतत्समं भवेत् ॥ १७ ॥ भक्त्या निरूपणसमं न भवेदन्यसाधनम् । ज्ञानिनां लक्षणं राम दुर्विज्ञेयं भवेत् खलु ॥ १८ ॥ यतः सर्वान्तरं तत्तु नेत्रवागाद्यगोचरम् । न निरूपयितुं शक्यं लक्षितुं वा परैः क्वचित् ॥ १९ ॥ पर जो ईश्वरपरायण है वह यदि वैराग्यादि अन्य साधनोंका भी थोड़ा आश्रय ले और किसी प्रकार उस तत्त्वको जानकर फिर अन्य साधकोंके प्रति सर्वदा उसका निरूपण करता रहे तो उसके साथ तदाकारता प्राप्त कर लेता है ॥ १३ उ०-१४ ॥ इस प्रकारके निरूपण आदिसे जब उसकी तद्रूपता सुदृढ हो जाय तो वह शिवत्व प्राप्त करके हर्ष-शोकादिसे रहित हो उसीमें चित्त रखकर जहाँ-जहाँ भी जाता है उस सबको वह शिवसे अभिन्न ही कर लेता है । इस प्रकार उत्तम ज्ञानी हो वह जीवन्मुक्त पदपर स्थित हो जाता है ॥ १५-१६ ॥ अतः अत्यन्त भक्तिपूर्वक अन्य जिज्ञासुओंके प्रति बार-बार आत्म- तत्त्वका निरूपण करना—यही श्रेष्ठ साधन है, इसके समान और कोई साधन नहीं है । सचमुच भक्तिपूर्वक निरूपण करनेसे बढ़कर और कोई साधन नहीं है ॥ १७-१८ पू० ॥ परशुराम ! ज्ञानियोंके लक्षणों को जानना तो निश्चय ही अत्यन्त कठिन है, क्योंकि उनका वास्तविक स्वरूप तो सभीसे आन्तर तथा नेत्र और वाणी आदि इन्द्रियोंका अविषय होता है । दूसरोंके द्वारा उसका निरूपण एवं दर्शन होना कभी सम्भव नहीं है ॥ १८ उ०-१९ ॥

३३२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यथा शास्त्रज्ञता लोके त्वन्यैर्न ज्ञायते क्वचित् । देहवस्त्रभूषणाद्यैरेवमन्यैर्न वेद्यते ॥ २० ॥ विद्वत्ता हि स्वसंवित्तिमात्रवेद्या न चान्यथा । यथा संस्वादितरसरसज्ञत्वं हि भार्गव ॥ २१ ॥ तथापि चतुरैर्विद्यावद्भिस्तद्भाषणादिभिः । वेद्यते हि यथा स्वस्य मार्गः सूक्ष्मपिपीलिकैः ॥ २२ ॥ सन्ति स्थूललक्षणानि त्वनेकान्तानि तानि तु । सूक्ष्मलक्ष्मणि चान्यानि दुर्विज्ञेयानि वै परैः ॥ २३ ॥ निरूपणं भाषणञ्च साधनाभिनयस्तथा । ज्ञानिनामिव चान्यैस्तु कर्तुं शक्यो हि लक्ष्यते ॥ २४ ॥ अनिर्मलान्तःकरणैरभ्यस्तं ज्ञानसाधनम् । स्थिरीभवति यत्तेषां लक्षणं तत् प्रकीर्तितम् ॥ २५ ॥ जिस प्रकार लोकमें किसीका शास्त्र-ज्ञान भी देह, वस्त्र या आभूषणादिके द्वारा दूसरोंको कभी मालूम नहीं होता, उसी प्रकार ज्ञानका भी दूसरोंको पता नहीं लगता ॥ २० ॥ परशुराम ! जिसने मधुरादि रसका आस्वादन किया है उसका रसका ज्ञान जैसे उसे ही होता है, वैसे ही तत्त्वज्ञता भी केवल आत्मानुभवसे ही जानी जा सकती है, और किसी प्रकार नहीं ॥ २१ ॥ तो भी जिस प्रकार नन्हीं-नन्हीं चीटियाँ अपने रास्तेका पता लगा लेती हैं उसी प्रकार चतुर और विद्वान् पुरुष ज्ञानियोंके भाषण आदिसे उनको पहचान लेते हैं ॥ २२ ॥ यों तो शास्त्रोंमें उनके शान्ति आदि अनेकों स्थूल लक्षण बतलाये गये हैं, परन्तु वे केवल उन्हीं में पाये जायें—ऐसी बात नहीं है। इसी प्रकार अनेकों सूक्ष्म लक्षण भी हैं, किन्तु उन्हें दूसरे लोग जान नहीं सकते ॥ २३ ॥ यह देखा जाता है कि ज्ञानियोंका-सा निरूपण, भाषण और साधनोंका-सा अभिनय दूसरे लोग भी कर सकते हैं ॥ २४ ॥ जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं है वे भी यदि ज्ञानके किसी साधनका अभ्यास करते हैं तो वह उनमें स्थिर हो जाता है और वही उनका लक्षण कहा जाता है ॥ २५ ॥

एकविंशतितमोऽध्यायः। ३३३ यस्य मानापमानौ च लाभालाभौ जयाजयौ। नैपद्विशेषितुं शक्तौ विद्यात्तं ज्ञानिपृत्तमम् ॥ २६ ॥ स्वात्मानुभववार्त्तासु पृष्टो गूढार्थमप्युत । असन्दिग्धः प्रतिवदेज्झटिति ज्ञानिपूत्तमः ॥ २७ ॥ यस्योत्साहो भवेज्ज्ञानं वार्त्तास्ववितरां किल । निरूपणे ह्यवैमुख्यं ज्ञानिनो लक्षणं हि तत् ॥ २८ ॥ अनारम्भः स्वभावेन सन्तोषः शुचिचित्तता । महापत्स्वपि शान्तात्मा स भवेज्ज्ञानिपूत्तमः ॥ २९ ॥ एतदादीनि लक्ष्माणि भार्गवोत्तमज्ञानिनाम् । स्वात्मनस्तु परीक्षायां सुस्थिराणि न संशयः ॥ ३० ॥ साधकस्तु सदा स्वात्मपरीक्षातत्परो भवेत् । यथा परीक्षणेऽन्यस्य निपुणः संप्रवर्त्तते ॥ ३१ ॥ तथा परीक्षन् स्वात्मानं सिद्धिं न कथमाप्नुयात् । मान, अपमान, लाभ-हानि और जय-पराजय जिसके चित्तमें कोई अन्तर नहीं डाल पाते उसे ज्ञानियोंमें उत्तम समझना चाहिये ॥ २६ ॥ यदि आत्मानुभवके विषयमें कोई गूढ प्रश्न किया जाय और वह निःसन्देह होकर तत्काल उसका उत्तर दे दे तो वह ज्ञानियोंमें उत्तम है ॥ २७ ॥ ज्ञानचर्चामें जिसे अत्यन्त उत्साह हो और उसका निरूपण करनेसे जो पीछे न हटे—यह भी उसके ज्ञानी होनेका ही लक्षण है ॥ २८ ॥ जिसमें स्वभावसे ही कोई प्रवृत्ति आरम्भ करनेकी रुचि न हो, सन्तोष और पवित्र-चित्तता हो तथा अत्यन्त आपत्तिके समय भी जो शान्तचित्त रहे, वह ज्ञानियोंमें उत्तम है ॥ २९ ॥ भृगुश्रेष्ठ ! इसी प्रकार ज्ञानियोंके और भी कुछ लक्षण हैं। किन्तु यह निश्चय है कि वे अपनी परीक्षामें ही सुस्थिर (अन्यभि- चारी) हैं ॥ ३० ॥ साधकको तो सर्वदा अपने चित्तकी परीक्षामें ही तत्पर रहना चाहिये। वह जिस प्रकार दूसरों की परीक्षामें बड़ा निपुण होकर लगा रहता है उसी प्रकार यदि अपनी परीक्षा करता रहे तो कैसे सिद्धि प्राप्त न करेगा ॥ ३१-३२ पू० ॥

३३४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यदान्यगुणदोषाणामविचारणतत्परः ॥ ३२ ॥ स्वीयानां गुणदोषाणां विचारपरमो भवेत् । तदा सर्वसाधनानां प्राप्त्या सिद्धिमुपेष्यति ॥ ३३ ॥ एवं प्रोक्तानि लक्ष्माणि ज्ञानिनां भृगुनन्दन । स्वात्मनस्तु परीक्षायामुपयुक्तानि सर्वथा ॥ ३४ ॥ अन्येषान्तु परीक्षायामनेकान्तान्यमूनि तु । यतो ये ज्ञानिनोऽत्यन्तशुद्धस्वान्ता भृगूद्वह ॥ ३५ ॥ तेषामापातसंसिद्धसाधनैः सिद्धिरास्थिता । अतः पूर्ववासनानुरोधव्यापारतत्पराः ॥ ३६ ॥ कथं परीक्षणीयास्ते सामान्यव्यवहारिणः । ज्ञानिनस्तु तत्परीक्षां कुर्युरभ्यासवैभवात् ॥ ३७ ॥ आपातदर्शनादेव यथा रत्नपरीक्षकाः । मन्दज्ञानवतां देहसंस्था मूढसमैव हि ॥ ३८ ॥ जिस समय वह दूसरोंके गुण-दोषोंके विचारमें न लगकर अपने ही गुणदोषोंकी छान-बीनमें लग जायगा, उस समय वह सभी साधनोंको प्राप्त करके सिद्धि प्राप्त कर लेगा ॥ ३२ उ०-३३ ॥ भृगुनन्दन ! इस प्रकार यहाँ जो ज्ञानियोंके लक्षण कहे हैं वे सर्वथा अपने चित्तकी परीक्षामें ही उपयोगी हैं ॥ ३४ ॥ किन्तु दूसरोंकी परीक्षामें तो वे व्यभिचारी ( सर्वदा उपयोगी न होनेवाले ) ही हैं, क्योंकि भृगुनन्दन ! जो ज्ञानी अत्यन्त शुद्ध चित्तवाले होते हैं उन्हें आरम्भिक अवस्थावाले साधनोंसे ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥ ३५-३६ पू० ॥ अतः वे अपनी पूर्व-वासनाओंके अनुसार व्यापारमें लगे रहते हैं। उन सामान्य व्यवहारियोंकी परीक्षा तुम कैसे कर सकोगे ? उनकी परीक्षा तो अपने अभ्यासके सामर्थ्यसे ज्ञानी लोग ही करेंगे, जिस प्रकारकी रत्नोंकी परीक्षा करनेवाले उसे देखते ही पहचान लेते हैं ॥ ३६ उ०-३८ पू० ॥ मन्द ज्ञानियोंके देहकी स्थिति तो अज्ञानियोंके समान ही होती

एकविंशतितमोऽध्यायः । ३३५ यतो न तेषां सहजसमाधिप्राप्तिरस्ति हि । यावद्विमर्शनपरास्तावत्ते पूर्णरूपिणः ॥ ३९ ॥ यदा विचारविमुखास्तदा देहमयत्वतः । सुखदुःखजुषोऽत्यन्तं पशुतुल्यतया स्थिताः ॥ ४० ॥ मध्ये मध्ये पूर्णदशासादनान्निर्वृता अपि । तेषां या सा पशुदशा सद्विमर्शान्तरालगा ॥ ४१ ॥ न बन्धनाय भवति दग्धरज्जुरिव स्थिता । लाक्षारसैर्यदा वस्त्रप्रान्तयुग्मं सुरञ्जितम् ॥ ४२ ॥ व्याप्या वासोमध्यमपि सर्वं लाक्षारुणं भवेत् । एवं तस्य व्यवहृतिश्चिद्विमर्शनमध्यगा ॥ ४३ ॥ चिद्रूपात्मैकतां याता न ततो बन्धनाय सा । मध्यविज्ञानिनां देहसंयोगो नास्ति सर्वथा ॥ ४४ ॥ है, क्योंकि उन्हें सहज-समाधि प्राप्त नहीं होती ॥ ३८ उ०--३९ पू० ॥ जबतक वे विचारमें लगे रहते हैं तबतक तो पूर्णस्वरूप ही होते हैं, किन्तु जब विचारोन्मुख नहीं होते तो देहाध्यासयुक्त रहनेके कारण अत्यन्त सुख-दुःख अनुभव करनेके कारण पशुके समान रहते हैं ॥ ३९ उ०-४० ॥ बीच-बीचमें पूर्णदशा आते रहनेसे शान्तिका अनुभव करते रहनेपर भी उस सद्विचारके मध्यमें उन्हें जो पशुदशा प्राप्त होती है वह जली हुई रस्सीके समान होनेके कारण उनके बन्धनका कारण नहीं होती ॥ ४१--४२ पू० ॥ जब कि वस्त्रके दोनों सिरे लाखके रससे रँग दिये जाते हैं तो रंगके फैल जानेसे वस्त्रका सारा मध्य भाग भी लाखकी लालीसे व्याप्त हो जाता है ॥ ४२ उ०--४३ पू० ॥ इसी प्रकार चित्स्वरूप परमात्माका चिन्तन करते हुए बीचमें उसका जो व्यवहार होता है वह भी चित्स्वरूपसे अभिन्न हो जाता है, इसलिये उसके बन्धन का कारण नहीं बनता ॥ ४३ उ०--४४ पू० ॥ मध्यम ज्ञानियोंको देहका संयोग बिलकुल नहीं रहता । बुद्धिमान् पुरुष देहमें आत्मबुद्धिको ही देहका संयोग कहते हैं ॥ ४४ उ०--४५ पू०॥ परशुरामजी ! वह देहसंयोग मध्यम विज्ञानीको कभी नहीं होता,

३३६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे देहात्मत्वग्रहो देहसंयोगः प्रोच्यते बुधैः । स नास्ति मध्यविज्ञानवतो राम कदाचन ॥ ४५ ॥ अभ्यासातिशयात्तस्य मनो लीनं हि सर्वदा । सदा समाहितस्वान्तो व्यवहारो न तस्य हि ॥ ४६ ॥ यो देहयात्रानिर्वाहः सोऽपि तस्य सुषुप्तिवत् । यथा कश्चित् सुषुप्तिस्थो वासनामात्रतः क्वचित् ॥ ४७ ॥ किञ्चिदुक्त्वा च कृत्वा च न पश्चाद्वेद किञ्चन । यथा च मदिरामत्तो वदन् कुर्वन्न वेद वै ॥ ४८ ॥ एवमेष महायोगी लोकयात्राबहिर्गतः । किञ्चित् कदाचित् कुर्वंश्च न विजानाति तत् पुनः ॥ ४९ ॥ प्रारब्धवासनाभ्यां तु स देहो निर्वहेत् सदा । यस्तूत्तमः स विज्ञानी देहस्तस्यापि नास्ति हि ॥ ५० ॥ व्यवहारं करोत्येष रथसारथिवत् स्थितः । क्योंकि अभ्यासकी अधिकताके कारण उसका मन सर्वदा लीन रहता है ॥ ४५ उ०--४६ पू० ॥ जिस समय उसका अन्तःकरण समाधिस्थ रहता है उस समय उसका कोई व्यवहार ही नहीं रहता । उसकी जो देहयात्राका निर्वाह होता है वह भी उसकी सुषुप्तिके समान ही है ॥ ४६ उ०--४७ पू० ॥ जिस प्रकार कोई सोया हुआ पुरुष पूर्ववासनाओंके अनुसार कभी कुछ बोल या कर बैठता है तो भी पीछे उसे कुछ पता नहीं रहता ॥ ४७ उ०--४८ पू० ॥ जिस तरह मदिरासे उन्मत्त हुआ पुरुष कुछ बोले या करे तो उसे उसका पता नहीं चलता, उसी तरह लौकिक व्यवहारसे दूर रहनेवाला यह महायोगी कभी कुछ करता भी है तो पीछे उसका पता नहीं रहता ॥ ४८ उ०--४९ ॥ वह प्रारब्ध और वासनाओं (पूर्वाभ्यासों) के कारण ही सर्वदा शरीरका निर्वाह करता है । किन्तु जो उत्तम ज्ञानी होता है देह तो उसकी दृष्टिमें भी नहीं होता, किन्तु वह रथके सारथीकी तरह स्थित होकर सारा व्यवहार करता है ॥ ५०--५१ पू० ॥

एकविंशतितमोऽध्यायः ३३७ यथा रथेन व्यापारं कुर्वन्न रथदेहकः ॥ ५१ ॥ सारथिः स्यादेवमेव देहव्यापारतत्परः । न देही नापि व्यापारी शुद्धसंवेदनात्मकः ॥ ५२ ॥ अन्तरत्यच्छसुस्वान्तो बहिर्व्यवहरत्यसौ । यथा स्त्रीवेषितो नाट्ये द्वैरूप्यमुपसङ्गतः ॥ ५३ ॥ यथा क्रीडन् कुमारेण प्रौढस्तदोषवर्जितः । एवमेष जगत्क्रीडातत्परो निर्मलाश्यः ॥ ५४ ॥ मध्यज्ञानी निरोधस्य प्रकर्षेणाचलस्थितिः । अचलस्थितिरेतस्य विचारस्य प्रकर्षतः ॥ ५५ ॥ बुद्धेस्तु परिपाकेन मध्यमोत्तमयोर्भिदा । अत्र ते शृणु वक्ष्यामि संवादं ज्ञानिनोर्मिथः ॥ ५६ ॥ पुरा हि पर्वतेशोऽभूद्राजा रत्नाङ्गदाह्वयः । जिस प्रकार सारथी रथके द्वारा व्यापार करनेपर भी रथरूप नहीं होता, उसी प्रकार उत्तम ज्ञानी देहसम्बन्धी व्यापारोंमें लगा रहनेपर भी न तो देही होता है और न व्यापार करनेवाला, बस, शुद्ध ज्ञान- स्वरूप ही रहता है ॥ ५१ उ०-५२ ॥ वह भीतरसे अत्यन्त निर्मल और स्वस्वरूपमें स्थित रहते हुए ही ऊपरसे व्यवहार करता है, जिस प्रकार नाटकमें स्त्री-वेश धारण करनेवाला पुरुष दो रूपोंमें स्थित रहता है ॥ ५३ ॥ अथवा जैसे बालकके साथ खेलनेवाला प्रौढ पुरुष उस खेलके हार-जीत आदि दोषोंसे मुक्त रहता है, उसी प्रकार यह उत्तम ज्ञानी लोकलीलामें लगा रहनेपर भी निर्मलचित्त रहता है ॥ ५४ ॥ मध्यम ज्ञानीकी तो निरोधकी अधिकताके कारण अविचल स्थिति रहती है, किन्तु इस उत्तम ज्ञानीकी अचल स्थिति विचारकी उत्कृष्टताके कारण होती है ॥ ५५ ॥ इस प्रकार बुद्धिकी परिपक्वताके तारतम्यसे ही उत्तम और मध्यम ज्ञानियोंका अन्तर रहता है। इस विषयमें मैं तुम्हें दो ज्ञानियों- का पारस्परिक संवाद सुनाता हूँ, श्रवण करो ॥ ५६ ॥ पूर्वकालमें पार्वत्य प्रदेशका रत्नांगद नामक एक राजा हुआ है

३३८ त्रिपुरा रहस्ये ज्ञानखण्डे स विपाशामनु पुरीमध्यासीदमृताभिधाम् ॥ ५७ ॥ तस्य पुत्रौ महात्मानौ स्थितावतिमनीषिणौ । रुक्माङ्गदहेमाङ्गदौ जनकस्यातिवल्लभौ ॥ ५८ ॥ तत्र रुक्माङ्गदो ह्यासीच्छास्त्राणां पारदर्शनः । हेमाङ्गदोऽतिविज्ञानी ज्ञानिनामुत्तमोऽभवत् ॥ ५९ ॥ तावुभौ निर्गतौ सर्वसेनाभिः परिवारितौ । मृगयार्थं वसन्तेषु ययतुर्गहनं वनम् ॥ ६० ॥ तत्रानेकान् मृगान् व्याघ्रान् शशकान् महिषानपि । हत्वाऽत्यन्तपरिश्रान्तावासाद्य ह्रदमास्थितौ ॥ ६१ ॥ तद्ध्रदस्य परे पारे न्यग्रोधे ब्रह्मराक्षसः । समस्तशास्त्रपारज्ञो विद्वद्भिर्विवदत्यलम् ॥ ६२ ॥ निर्जितान् भक्षयन्नास्ते चिरकालाद्धि भार्गव । रुक्माङ्गदश्चारमुखाग्निशम्य वादकौतुकी ॥ ६३ ॥ गत्वा तत्र आहूतस्तेन वादपङ्गेऽभवत् । वह विपाशा नदीके तीरपर अमृता नामकी पुरीमें रहता था ॥ ५७ ॥ उसके रुक्मांगद और हेमांगद नामक दो उदारचित्त एवं अत्यन्त बुद्धिमान् पुत्र थे। वे अपने पिताको अत्यन्त प्रिय थे ॥ ५८ ॥ उनमें रुक्माङ्गद तो सम्पूर्ण शास्त्रोंमें अत्यन्त निपुण था और हेमाङ्गद ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ और आत्मदर्शी था ॥ ५९ ॥ वे दोनों सम्पूर्ण सेना के साथ नगरसे निकले और वसन्त ऋतुमें मृगयाके लिये सघन वनमें चले गये ॥ ६० ॥ वहाँ उन्होंने अनेकों मृगों, व्याघ्रों, खरहों और भैंसोंका वध किया तथा थककर एक सरोवरके तटपर आकर बैठ गये ॥ ६१ ॥ उस सरोवरके दूसरे तटपर वटवृक्षके ऊपर एक ब्रह्मराक्षस रहता था। वह सम्पूर्ण शास्त्रोंमें पारंगत था और विद्वानोंके साथ बहुत विवाद किया करता था ॥ ६२ ॥ भृगुनन्दन ! वह जिन्हें विवादमें जीत लेता था उन्हें खा जाता था। बहुत दिनोंसे उसका यही क्रम था। रुक्माङ्गदको भी वाद-विवादका बड़ा कुतूहल रहता था। उसने जब जनोंके मुखसे यह समाचार सुना तो

एकविंशतितमोऽध्यायः। ३३६ निर्जितस्तेन वादेषु गृहीतो ब्रह्मरक्षसा ॥ ६४ ॥ रुक्माङ्गदोऽथ तं दृष्ट्वा प्राह हेमाङ्गदस्तु तम्। भो ब्रह्मराक्षसैनं त्वं न भक्षयितुमर्हसि ॥ ६५ ॥ मां जित्वाऽवरजं ह्यस्य ततो नौ सह भक्षय। हेमाङ्गदवचः श्रुत्वा प्रोवाच ब्रह्मराक्षसः ॥ ६६ ॥ चिराय लब्धो ह्याहारो बुभुक्षा मां प्रबाधते। एतेन पारणां कृत्वा विवदामि त्वया सह ॥ ६७ ॥ ततस्त्वामपि निर्जित्य भक्षितेन त्वया ततः। अत्यन्तं तर्पितो भूयामिति मे नृप निश्चयः ॥ ६८ ॥ चिरादेष वरः प्राप्तो वसिष्ठात्तु महात्मनः। कदाचिदागतः शिष्यो वसिष्ठस्य तु भक्षितः ॥ ६९ ॥ देवराताभिधस्तेन शप्तस्तेन महात्मना। इतः परं भक्षयित्वा मनुष्यं ब्रह्मराक्षसः ॥ ७० ॥ दग्धं भवेत्तव मुखमिति पश्चान्मया मुनिः।

वह भाईके सहित वहाँ जाकर उससे विवाद करने लगा ॥ ६३--६४ पू०॥ वादमें जीत लिये जानेपर रुक्माङ्गदको ब्रह्मराक्षसने पकड़ लिया। यह देखकर हेमाङ्गदने उससे कहा, "ओ ब्रह्मराक्षस ! तुम इन्हें मत खाओ। मैं इनका छोटा भाई हूँ। मुझे भी जीतकर फिर हम दोनों हीको खा लेना" ॥ ६४ उ०-६६ पू० ॥ हेमाङ्गदकी बात सुनकर ब्रह्मराक्षसने कहा, "मुझे भूख सता रही है। बहुत दिनोंमें यह आहार मिला है। अतः इसके द्वारा पारण करके फिर तुम्हारे साथ विवाद करूँगा ॥ ६६ उ०-६७ ॥ फिर तुमको भी जीतकर जब खा लूँगा तो अत्यन्त तृप्त हो जाऊँगा। राजन् ! ऐसा मेरा विचार है ॥ ६८ ॥ बहुत दिनोंसे महात्मा वसिष्ठसे मुझे ऐसा ही वर मिला हुआ है। एक बार उनका देवरात नामक शिष्य यहाँ आया था, उसे मैं खा गया तो उन्होंने मुझे शाप दिया—॥ ६६-७० पू० ॥ "ब्रह्मराक्षस ! अब आगे यदि तू किसी मनुष्यको खायगा तो तेरा