त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे नत्वा शिवादीन् लोकेशान् जग्मुः स्वं स्वं निवेशनम् । विद्यागीता मयैषा ते प्रोक्ता पापौघनाशिनी ॥ १३६ ॥ श्रुता विचारिता सम्यक् स्वात्मसाम्राज्यदायिनी । विद्यागीताऽत्युत्तमेयं साक्षाद्विद्या निरुपिता ॥ १३७ ॥ पठतां प्रत्यहं प्रीता ज्ञानं दिशति सा स्वयम् । संसारतिमिराम्भोधौ मज्जतां तरणिर्भवेत् ॥ १३८ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे विद्यागीतानाम विंशतितमोऽध्यायः । शिव आदि देवगणोंको नमस्कार कर अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ १३५-१३६ पू० ॥ यह मैंने तुम्हें सम्पूर्ण पापसमूहका नाश करनेवाली विद्यागीता सुनायी। इसका यदि अच्छी तरह श्रवण और विचार किया जाय तो वह स्वात्मानन्दरूप साम्राज्य प्रदान करनेवाली है ॥ १३६ उ०-१३७ पू० ॥ यह अति उत्तम विद्यागीता साक्षात् विद्यादेवीकी ही कही हुई है। जो लोग इसका प्रतिदिन पाठ करते हैं उन्हें प्रसन्न होकर वह स्वयं ज्ञान प्रदान कर देती हैं। इस संसाररूप अन्धकारके समुद्रमें डूबने- वालोंके लिये यह सूर्य या नौकाके समान है ॥ १३७ उ०-१३८ ॥ विंश अध्याय समाप्त । १. यहाँ मूलमें 'तरणि' शब्द है। इसका अर्थ 'सूर्य' भी है और 'नौका' भी। अन्धकारसे पार होनेसे सूर्य और समुद्रसे पार होनेमें नौका उपयोगी है। अतः इसके दोनों ही अर्थ सार्थक हैं। शब्दश्लेषका यह सुन्दर उदाहरण है।