त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशतितमोऽध्यायः श्रुत्वेत्थं भार्गवो रामो दत्तात्रेयमुनेरितम् । अविद्याजालविभ्रान्तेर्मुक्तप्रायो बभूव ह ॥ १ ॥ पुनः पप्रच्छाऽत्रिसुतं किञ्चिन्नत्वा सुभक्तितः । भगवन् ब्रूहि विज्ञानसाधनं सुनिश्चितम् ॥ २ ॥ सारभूतञ्च सुलभं यत् साक्षात् फलदायकम् । ज्ञानिनां लक्षणञ्चापि येन ज्ञास्यामि तान् द्रुतम् ॥ ३ ॥ ज्ञानिनां देहसंयोगे वियोगे च स्थितिं यथा । व्यवहारं कुर्वतां चाप्यनासक्तं मनः कथम् ॥ ४ ॥ एतत् सर्वं सुकृपया स्पष्टं मे वक्तुमर्हसि । एवमत्रिसुतः पृष्टो जमदग्निसुतेन वै ॥ ५ ॥ सन्तुष्टः प्राह करुणासिन्धुः सम्बोध्य भार्गवम् । शृणु राम प्रवक्ष्यामि रहस्यं ज्ञानसाधनम् ॥ ६ ॥ एकविंशतितमोऽध्यायः ॥ २१ ॥ ज्ञानके मुख्य साधन, ज्ञानियोंके लक्षण तथा हेमाङ्गद और ब्रह्मराक्षसका संवाद इस प्रकार भृगुनन्दन परशुराम दत्तात्रेयजीका उपदेश सुनकर अवि- द्याजालरूप भ्रमसे प्रायः मुक्त हो गये ॥ १ ॥ फिर अत्यन्त भक्तिपूर्वक नमस्कार कर उन्होंने अत्रिनन्दन दत्ता- त्रेयजीसे इस प्रकार कुछ प्रश्न किया, "भगवन् ! ज्ञानप्राप्तिके अत्यन्त निश्चित और सारभूत साधन बताइये, जो सुलभ भी हों और साक्षात् मोक्षरूप फल प्रदान करनेवाले हों । साथ ही ज्ञानियों के लक्षण भी बतलाइये, जिनसे मैं उन्हें तत्काल पहचान सकूँ ॥ २-३ ॥ देहका अनुसन्धान रहने और न रहनेके समय उनकी जैसी स्थिति रहती है तथा व्यवहार करते समय भी किस प्रकार उनका मन उसमें आसक्त नहीं होता—कृपया ये सभी बातें मुझे स्पष्टतया बतलाइये" ॥ ४-५ पू० ॥ परशुरामके इस प्रकार प्रश्न करनेपर करुणासागर दत्तात्रेयजी बड़े प्रसन्न हुए और उन्हें सम्बोधन करके कहने लगे—"परशुराम ! सुनो, मैं तुम्हें ज्ञानके गुप्त साधन बतलाता हूँ ॥ ५ उ०-६ ॥